ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 267, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय मुण्डक
प्रथम खण्ड
द्व्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वन्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १ ॥ *
सयुजा=एक साथ रहनेवाले (तथा); सखाया=परस्पर सखाभाव रखनेवाले; द्व्वा=दो; सुपर्णा=पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा); समानम् वृक्षम् परिषस्वजाते=एक ही वृक्ष (शरीर)-का आश्रय लेकर रहते हैं; तयोः=उन दोनोंमेंसे; अन्यः=एक तो; पिप्पलम्=उस वृक्षके सुख-दुःखरूप कर्मफलोंका; स्वादु=स्वाद ले-लेकर; अन्ति=उपभोग करता है (किंतु); अन्यः=दूसरा; अनश्नन्=न खाता हुआ; अभिचाकशीति=केवल देखता रहता है ॥ १ ॥
व्याख्या—जिस प्रकार गीतामें जगत्का अश्रुस्थ (पीपल) वृक्षके रूपमें वर्णन किया गया है, उसी प्रकार इस मन्त्रमें शरीरको पीपलके वृक्षका और जीवात्मा तथा परमात्माको पक्षियोंका रूप देकर वर्णन किया गया है। इसी तरहका वर्णन कठोपनिषद्में भी गुहामें प्रविष्ट छाया और धूपके नामसे आया है। भाव दोनों जगह प्रायः एक ही है। मन्त्रका सारांश यह है कि यह मनुष्यशरीर मानो एक वृक्ष है। ईश्वर और जीव—ये सदा साथ रहनेवाले दो मित्र पक्षी हैं। ये इस शरीररूपवृक्षमें एक साथ ही हृदयरूप घोंसलेमें निवास करते हैं। इन दोनोंमें एक—जीवात्मा तो उस वृक्षके फलरूप अपने कर्मफलोंको अर्थात् प्रारब्धानुसार प्राप्त हुए सुख-दुःखोंको आसक्ति एवं द्वेषपूर्वक भोगता है और दूसरा—ईश्वर उन कर्मफलोंसे किसी प्रकारका किञ्चित् भी सम्बन्ध न जोड़कर केवल देखता रहता है ॥ १ ॥
- ऋग् ० १।१६४।२०, अथर्व० ९।१४।२० में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है।