ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 548 में से
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मुण्डकोपनिषद्
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इष्टापूर्तम्=इष्ट और पूर्त* (सकाम) कर्मोंको ही; वरिष्ठम्=श्रेष्ठ; मन्वमानाः=माननेवाले; प्रमूढाः=अत्यन्त मूर्खलोग; अन्यत्=उससे भिन्न; श्रेयः=वास्तविक श्रेयको; न वेदयन्ते=नहीं जानते; ते=वे; सुकृते=पुण्यकर्मके फलस्वरूप; नाकस्य पुष्टे=स्वर्गके उच्चतम स्थानमें; अनुभूत्वा=(जाकर श्रेष्ठ कर्मके फलस्वरूप) वहाँके भोगोंका अनुभव करके; इमम् लोकम्=इस मनुष्यलोकमें; वा=अथवा; हीनतरम्=इससे भी अत्यन्त हीन योनियोंमें; विशन्ति=प्रवेश करते हैं ॥१०॥
व्याख्या—वे अतिशय मूर्ख भोगासक्त मनुष्य इष्ट और पूर्तको अर्थात् वेद और स्मृति आदि शास्त्रोंमें सांसारिक सुखोंकी प्राप्तिके जितने भी साधन बताये गये हैं, उन्हींको सर्वश्रेष्ठ कल्याण-साधन मानते हैं। इसलिये उनसे भिन्न अर्थात् परमेश्वरका भजन, ध्यान और निष्कामभावसे कर्तव्यपालन करना एवं परमपुरुष परमात्माको जाननेके लिये तीव्र जिज्ञासापूर्वक चेष्टा करना आदि जितने भी परम कल्याणके साधन हैं, उन्हें वे नहीं जानते, उन कल्याण-साधनोंकी ओर लक्ष्यतक नहीं करते। अतः वे अपने पुण्यकर्मके फलरूप स्वर्गलोकतकके सुखोंको भोगकर पुण्य क्षय होनेपर पुनः इस मनुष्यलोकमें अथवा इससे भी नीची शूकर-कूकर, कीट-पतङ्ग आदि योनियोंमें या रौरवादि घोर नरकोंमें चले जाते हैं। (गीता ९।२०-२१) ॥१०॥
सम्बन्ध—ऊपर बतलाये हुए सांसारिक भोगोंसे विरक्त मनुष्योंके आचार-व्यवहार और उनके फलका वर्णन करते हैं—
तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वान्सो भैक्ष्यचर्या चरन्तः। सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥११॥
- यज्ञ-यागादि श्रौतकर्मोंको 'इष्ट' तथा बावली, कुआँ खुदवाना और बगीचे आदि लगाना स्मृतिविहित कर्मको 'पूर्त' कहते हैं।