भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

खण्ड २ ]

मुण्डकोपनिषद्

२४५

इष्टापूर्तम्=इष्ट और पूर्त* (सकाम) कर्मोंको ही; वरिष्ठम्=श्रेष्ठ; मन्वमानाः=माननेवाले; प्रमूढाः=अत्यन्त मूर्खलोग; अन्यत्=उससे भिन्न; श्रेयः=वास्तविक श्रेयको; न वेदयन्ते=नहीं जानते; ते=वे; सुकृते=पुण्यकर्मके फलस्वरूप; नाकस्य पुष्टे=स्वर्गके उच्चतम स्थानमें; अनुभूत्वा=(जाकर श्रेष्ठ कर्मके फलस्वरूप) वहाँके भोगोंका अनुभव करके; इमम् लोकम्=इस मनुष्यलोकमें; वा=अथवा; हीनतरम्=इससे भी अत्यन्त हीन योनियोंमें; विशन्ति=प्रवेश करते हैं ॥१०॥

व्याख्या—वे अतिशय मूर्ख भोगासक्त मनुष्य इष्ट और पूर्तको अर्थात् वेद और स्मृति आदि शास्त्रोंमें सांसारिक सुखोंकी प्राप्तिके जितने भी साधन बताये गये हैं, उन्हींको सर्वश्रेष्ठ कल्याण-साधन मानते हैं। इसलिये उनसे भिन्न अर्थात् परमेश्वरका भजन, ध्यान और निष्कामभावसे कर्तव्यपालन करना एवं परमपुरुष परमात्माको जाननेके लिये तीव्र जिज्ञासापूर्वक चेष्टा करना आदि जितने भी परम कल्याणके साधन हैं, उन्हें वे नहीं जानते, उन कल्याण-साधनोंकी ओर लक्ष्यतक नहीं करते। अतः वे अपने पुण्यकर्मके फलरूप स्वर्गलोकतकके सुखोंको भोगकर पुण्य क्षय होनेपर पुनः इस मनुष्यलोकमें अथवा इससे भी नीची शूकर-कूकर, कीट-पतङ्ग आदि योनियोंमें या रौरवादि घोर नरकोंमें चले जाते हैं। (गीता ९।२०-२१) ॥१०॥

सम्बन्ध—ऊपर बतलाये हुए सांसारिक भोगोंसे विरक्त मनुष्योंके आचार-व्यवहार और उनके फलका वर्णन करते हैं—

तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वान्सो भैक्ष्यचर्या चरन्तः। सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥११॥

  • यज्ञ-यागादि श्रौतकर्मोंको 'इष्ट' तथा बावली, कुआँ खुदवाना और बगीचे आदि लगाना स्मृतिविहित कर्मको 'पूर्त' कहते हैं।

२४६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मण्डक १ ]

हि=किंतु; ये=जो; अरण्ये [ स्थिताः ]=वनमें रहनेवाले; शान्ताः=शान्तस्वभाववाले; विद्वान्सः=विद्वान्; भैक्ष्यचर्याम् चरन्तः=तथा भिक्षाके लिये विचरनेवाले; तपःश्रद्धे=संयमरूप तप तथा श्रद्धाका; उपवसन्ति=सेवन करते हैं; ते=वे; विरजाः=रजोगुणरहित; सूर्यद्रारेण=सूर्यके मार्गसे; [ तत्र ] प्रयान्ति=वहाँ चले जाते हैं; यत्र हि=जहाँपर; सः=वह; अमृतः=जन्म-मृत्युसे रहित; अव्ययात्मा=नित्य, अविनाशी; पुरुषः=परम पुरुष (रहता है) ॥ ११ ॥

व्याख्या —उपर्युक्त भोगासक्त मनुष्योंसे जो सर्वथा भिन्न हैं, मनुष्य-शरीरका महत्त्व समझ लेनेके कारण जिनके अन्तःकरणमें परमात्माका तत्त्व जाननेकी और परमेश्वरको प्राप्त करनेकी इच्छा जग उठी है, वे चाहे वनमें निवास करनेवाले वानप्रस्थ हों, शान्त स्वभाववाले विद्वान् सदाचारी गृहस्थ हों या भिक्षासे निर्वाह करनेवाले ब्रह्मचारी अथवा संन्यासी हों, वे तो निरन्तर तप और श्रद्धाका ही सेवन किया करते हैं, अर्थात् अपने-अपने वर्ण, आश्रम तथा परिस्थितिके अनुसार जिस समय जो कर्तव्य होता है, उसका शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार बिना किसी प्रकारकी कामनाके पालन करते रहते हैं और संयमपूर्वक शम-दमादि साधनोंसे सम्पन्न होकर परम श्रद्धाके साथ परमेश्वरको जानने और प्राप्त करनेके साधनोंमें लगे रहते हैं। इसलिये तम और रजोगुणके विकारोंसे सर्वथा शून्य निर्मल सत्त्वगुणमें स्थित वे सज्जन सूर्यलोकमें होते हुए वहाँ चले जाते हैं, जहाँ उनके परम प्राप्त अमृतस्वरूप नित्य अविनाशी परमपुरुष पुरुषोत्तम निवास करते हैं ॥ ११ ॥

सम्बन्ध —उन परब्रह्म परमेश्वरको जानने और प्राप्त करनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो

निर्वेदमायात्रास्त्यकृतः कृतेन ।

तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्

समित्याणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२ ॥

कर्मचितान्=कर्मसे प्राप्त किये जानेवाले; लोकान् परीक्ष्य=लोकोंकी परीक्षा

खण्ड २ ]

मुण्डकोपनिषद्

२४७

करके; ब्राह्मणः=ब्राह्मण; निर्वेदम्=वैराग्यको; आयात्=प्राप्त हो जाय (यह समझ ले कि); कृतेन=किये जानेवाले कर्मोंसे; अकृतः=स्वतःसिद्ध नित्य परमेश्वर; न अस्ति=नहीं मिल सकता; सः=वह; तद्विज्ञानार्थम्=उस परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये; समित्पाणिः=हाथमें समिधा लेकर; श्रोत्रियम्=वेदको भलीभाँति जानेवाले (और); ब्रह्मनिष्ठम्=परब्रह्म परमात्मामें स्थित; गुरुम्=गुरुके पास; एव=ही; अभिगच्छेत्=विनयपूर्वक जाय ॥ १२ ॥

व्याख्या —अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको पहले बतलाये हुए सकाम कर्मके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके समस्त सांसारिक सुखोंकी भलीभाँति परीक्षा करके अर्थात् विवेकपूर्वक उनकी अनित्यता और दुःखरूपताको समझकर सब प्रकारके भोगोंसे सर्वथा विरक्त हो जाना चाहिये। यह निश्चय कर लेना चाहिये कि कर्तापनके अभिमानपूर्वक सकामभावसे किये जानेवाले कर्म अनित्य फलको देनेवाले तथा स्वयं भी अनित्य हैं। अतः जो सर्वथा अकृत है अर्थात् क्रियासाध्य नहीं है, ऐसे नित्य परमेश्वरकी प्राप्ति वे नहीं करा सकते। यह सोचकर उस जिज्ञासुको परमात्माका वास्तविक तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेके लिये हाथमें समिधा लेकर श्रद्धा और विनयभावके सहित ऐसे सदगुरुकी शरणमें जाना चाहिये, जो वेदोंके रहस्यको भलीभाँति जानते हों और परब्रह्म परमात्मामें स्थित हों ॥ १२ ॥

सम्बन्ध —ऊपर बतलाये हुए लक्षणोंवाला कोई शिष्य यदि गुरुके पास आ जाय तो गुरुको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३ ॥

सः=वह; विद्वान्=ज्ञानी महात्मा; उपसन्नाय=शरणमें आये हुए; सम्यक्प्रशान्तचित्ताय=पूर्णतया शान्तचित्तवाले; शमान्विताय=शम-दमादि साधनयुक्त; तस्मै=उस शिष्यको; ताम् ब्रह्मविद्याम्=उस ब्रह्मविद्याका; तत्त्वतः=तत्त्व-विवेचनपूर्वक;

२४८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

प्रोवाच=भलीभाँति उपदेश करे; येन [ सः ]=जिससे वह शिष्य; अक्षरम्=अविनाशी; सत्यम्=नित्य; पुरुषम्=परम पुरुषको; वेद=जान ले ॥ १३ ॥

व्याख्या —उन श्रोत्रिय ब्रह्मणिष्ठ महात्माको भी चाहिये कि अपनी शरणमें आये हुए ऐसे शिष्यको, जिसका चित्त पूर्णतया शान्त—निश्चिन्त हो चुका हो, सांसारिक भोगोंमें सर्वथा वैराग्य हो जानेके कारण जिसके चित्तमें किसी प्रकारकी चिन्ता, व्याकुलता या विकार नहीं रह गये हों, जो शम-दमादि साधनसम्पन्न हो अर्थात् जिसने अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमें कर लिया हो, उस ब्रह्मविद्याका तत्त्व-विवेचनपूर्वक भलीभाँति समझाकर उपदेश करे, जिससे वह शिष्य नित्य अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तमका ज्ञान प्राप्त कर सके ॥ १३ ॥

॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥

॥ प्रथम मुण्डक समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय मुण्डक

प्रथम खण्ड

सम्बन्ध —प्रथम मुण्डकके द्वितीय खण्डमें अपर विद्याका स्वरूप और फल बतलाया तथा उसकी तुच्छता दिखाते हुए उससे विरक्त होनेकी बात कहकर परविद्या प्राप्त करनेके लिये सदुरुकी शरणमें जानेको कहा। अब परविद्याका वर्णन करनेके लिये प्रकरण आरम्भ करते हैं—

तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद् विस्फुल्लिङ्गाः

सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।

तथाक्षराद् विविधाः सोम्य भावाः

प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥

खण्ड १ ]

मुण्डकोपनिषद्

२४९

सोम्य=हे प्रिय!; तत्=वह; सत्यम्=सत्य; एतत्=यह है; यथा=जिस प्रकार; सुदीमात् पावकात्=प्रज्वलित अग्निमेंसे; सरूपाः=उसीके समान रूपवाली; सहस्रशः=हजारों; विस्फुल्लिङ्गाः=चिनगारियाँ; प्रभवन्ते=नाना प्रकारसे प्रकट होती हैं; तथा=उसी प्रकार; अक्षरात्=अविनाशी ब्रह्मसे; विविधाः=नाना प्रकारके; भावाः=भाव; प्रजायन्ते=उत्पन्न होते हैं; च=और; तत्र एव=उसीमें; अपियन्ति=विलीन हो जाते हैं* ॥ १ ॥

व्याख्या —महर्षि अङ्गिरा कहते हैं—प्रिय शौनक! मैंने तुमको पहले परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए (पूर्व प्रकरणके पहले खण्डमें छठे मन्त्रसे नवैतक) जो रहस्य बतलाया था, वह सर्वथा सत्य है; अब उसीको पुनः समझाता हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्निमेंसे उसीके-जैसे रूप-रंगवाली हजारों चिनगारियाँ चारों ओर निकलती हैं, उसी प्रकार परमपुरुष अविनाशी ब्रह्मसे सृष्टिकालमें नाना प्रकारके भाव मूर्त-अमूर्त पदार्थ उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें पुनः उन्हींमें लीन हो जाते हैं। यहाँ भावोंके प्रकट होनेकी बात समझानेके लिये ही अग्नि और चिनगारियोंका दृष्टान्त दिया गया है। उनके विलीन होनेकी बात दृष्टान्तसे स्पष्ट नहीं होती ॥ १ ॥

सम्बन्ध —जिन परब्रह्म अविनाशी पुरुषोत्तमसे यह जगत् उत्पन्न होकर पुनः उन्हींमें विलीन हो जाता है, वे स्वयं कैसे हैं—इस जिज्ञासापर कहते हैं—

दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः।

अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥ २ ॥

हि=निश्चय ही; दिव्यः=दिव्य; पुरुषः=पूर्णपुरुष; अमूर्तः=आकाररहित; सबाह्याभ्यन्तरः हि=समस्त जगत्के बाहर और भीतर भी व्याप्त; अजः=जन्मादि विकारोंसे अतीत; अप्राणः=प्राणरहित; अमनाः=मनरहित; हि=होनेके कारण; शुभ्रः=सर्वथा विशुद्ध है (तथा); हि=इसीलिये; अक्षरात्=अविनाशी जीवात्मासे; परतः परः=अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ २ ॥

  • प्रथम मुण्डकके प्रथम खण्डके सातवें मन्त्रमें मकड़ी, पृथ्वी और मनुष्य-शरीरके दृष्टान्तसे जो बात कही थी, वही बात इस मन्त्रमें अगिके दृष्टान्तसे समझायी गयी है।

२५०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

व्याख्या —वे दिव्य पुरुष परमात्मा निःसंदेह आकाररहित और समस्त जगत्के बाहर एवं भीतर भी परिपूर्ण हैं। वे जन्म आदि विकारोंसे रहित, सर्वथा विशुद्ध हैं; क्योंकि उनके न तो प्राण हैं, न इन्द्रियाँ हैं और न मन ही है। वे इन सबके बिना ही सब कुछ करनेमें समर्थ हैं; इसीलिये वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अविनाशी जीवात्मासे अत्यन्त श्रेष्ठ—सर्वथा उत्तम हैं ॥ २ ॥

सम्बन्ध —उपर्युक्त लक्षणोंवाले निराकार परमेश्वरसे यह साकार जगत् किस प्रकार उत्पन्न हो जाता है, इस जिज्ञासापर उनकी सर्वशक्तिमताका वर्णन करते हैं—

एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च।

खं वायुज्यौतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥

एतस्मात् —इसी परमेश्वरसे; प्राणः —प्राण; जायते —उत्पन्न होता है (तथा); मनः —मन (अन्तःकरण); सर्वेन्द्रियाणि —समस्त इन्द्रियाँ, खम् —आकाश; वायुः —वायु; ज्योतिः —तेज; आपः —जल; चः —और; विश्वस्य धारिणी —सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली; पृथिवी —पृथ्वी (ये सब उत्पन्न होते हैं) ॥ ३ ॥

व्याख्या —यद्यपि वे परब्रह्म पुरुषोत्तम निराकार और मन, इन्द्रिय आदि करण-समुदायसे सर्वथा रहित हैं, तथापि सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। इन सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमसे ही सृष्टिकालमें प्राण, मन (अन्तःकरण) और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ तथा आकाश, वायु, तेज, जल और सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथ्वी—ये पाँचों महाभूत, सब-के-सब उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥

सम्बन्ध —इस प्रकार संक्षेपमें परमेश्वरसे सूक्ष्म तत्वोंकी उत्पत्तिका प्रकार बतलाकर अब इस जगत्में भगवान्का विराट् रूप देखनेका प्रकार बतलाते हैं—

अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ

दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः।

वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य

पदभ्यां पृथिवी होष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥

खण्ड १ ]

मुण्डकोपनिषद्

२५१

अस्य=इस परमेश्वरका; अग्नि =:अग्नि; मूर्धा=मस्तक है; चन्द्रसूर्यौ=चन्द्रमा और सूर्य; चक्षुषी=दोनों नेत्र हैं; दिशः=सब दिशाएँ; श्रोत्रे=दोनों कान हैं; च=और; विवृताः वेदाः=विस्तृत वेद; वाक्=वाणी हैं (तथा); वायुः प्राणः=वायु प्राण है; विश्वम् हृदयम्=जगत् हृदय है; पदभ्याम्=इसके दोनों पैरोंसे; पृथिवी=पृथ्वी (उत्पन्न हुई है); एषः हि=यही; सर्वभूतान्तरात्मा=समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा ॥ ४ ॥

व्याख्या—दूसरे मन्त्रमें जिन परमेश्वरके निराकार स्वरूपका वर्णन किया गया है, उन्हीं परब्रह्मका यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला जगत् विराट् रूप है। इन विराट्स्वरूप परमेश्वरका अग्नि अर्थात् धूलोक ही मानो मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं, समस्त दिशाएँ कान हैं, नाना छन्द और ऋचाओंके रूपमें विस्तृत चारों वेद वाणी हैं, वायु प्राण है, सम्पूर्ण चराचर जगत् हृदय है, पृथ्वी मानो उनके पैर हैं। ये ही परब्रह्म परमेश्वर समस्त प्राणियोंके अन्तर्मीमा परमात्मा हैं ॥ ४ ॥

सम्बन्ध—उन परमात्मासे इस चराचर जगत्की उत्पत्ति किस क्रमसे होती है, इस जिज्ञासापर प्रकारान्तरसे जगत्की उत्पत्तिका क्रम बतलाते हैं—

तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः सोमात्पज्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् । पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात् सम्प्रसूताः ॥ ५ ॥

तस्मात्=उससे ही; अग्निः=अग्निदेव प्रकट हुआ; यस्य समिधः=जिसकी समिधा; सूर्यः=सूर्य है; (उस अग्निसे सोम उत्पन्न हुआ) सोमात्=सोमसे; पज्जन्यः=मेघ उत्पन्न हुए (और मेघोंसे वर्षाद्वारा); पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; ओषधयः=नाना प्रकारकी ओषधियाँ (उत्पन्न हुईं); रेतः=(ओषधियोंके भक्षणसे उत्पन्न हुए) वीर्यको; पुमान्=पुरुष; योषितायाम्=स्त्रीमें; सिञ्चति=सिंचन करता है (जिससे संतान उत्पन्न होती है); [ एवम् ]=इस प्रकार; पुरुषात्=उस परम पुरुषसे ही; बह्वीः प्रजाः=नाना प्रकारके चराचर प्राणी; सम्प्रसूताः=नियमपूर्वक उत्पन्न हुए हैं ॥ ५ ॥

२५२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

व्याख्या —जब-जब परमेश्वरसे यह जगत् उत्पन्न होता है तब-तब सदैव एक प्रकारसे ही होता हो—ऐसा नियम नहीं है। वे जब जैसा संकल्प करते हैं, उसी प्रकार उसी क्रमसे जगत् उत्पन्न हो जाता है। इसी भावको प्रकट करनेके लिये यहाँ प्रकारान्तरसे सृष्टिकी उत्पत्ति बतलाई गयी है। मन्त्रका सारांश यह है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमसे सर्वप्रथम तो उनकी अचिन्त्य शक्तिका एक अंश अद्भुत अग्निात्त्व उत्पन्न हुआ, जिसकी समिधा (ईंधन) सूर्य है, अर्थात् जो सूर्यबिम्बके रूपमें प्रज्वलित रहती है; अग्रिसे चन्द्रमा उत्पन्न हुआ, चन्द्रमासे (सूर्यकी रश्मियोंमें सूक्ष्मरूपसे स्थित जलमें कुछ शीतलता आ जानेके कारण) मेघ उत्पन्न हुए। मेघोंसे वर्षाद्वारा पृथ्वीमें नाना प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। उन ओषधियोंके भक्षणसे उत्पन्न हुए वीर्यको जब पुरुष अपनी जातिकी स्त्रीमें सिंचन करता है, तब उससे संतान उत्पन्न होती है। इस प्रकार परमपुरुष परमेश्वरसे ये नाना प्रकारके चराचर प्राणी उत्पन्न हुए हैं ॥५॥

सम्बन्ध —इस प्रकार समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका क्रम बतलाकर अब यह बात बतायी जाती है कि उन सबकी रक्षाके लिये किये जानेवाले यज्ञादि, उनके साधन और फल भी उन्हीं परमेश्वरसे प्रकट होते हैं—

तस्मादृचः साम यजुषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च। संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥

तस्मात्—उस परमेश्वरसे ही; ऋचः=ऋग्वेदकी ऋचाएँ; साम=सामवेदके मन्त्र; यजुषि=यजुर्वेदकी श्रुतियाँ; (और) दीक्षा=दीक्षा; च=तथा; सर्वे=समस्त; यज्ञाः=यज्ञ; क्रतवः=क्रतु; च=एवं; दक्षिणाः=दक्षिणाएँ; च=तथा; संवत्सरः=संवत्सररूप काल; यजमानः=यजमान; च=और; लोकाः=सब लोक (उत्पन्न हुए हैं); यत्र=जहाँ; सोमः=चन्द्रमा; पवते=प्रकाश फैलाता है (और); यत्र=जहाँ; सूर्यः=सूर्य; [ पवते ]=प्रकाश देता है ॥ ६ ॥

खण्ड १ ]

मुण्डकोपनिषद्

२५३

व्याख्या —उन परमेश्वरसे ही ऋग्वेदकी ऋचाएँ, सामवेदके मन्त्र और यजुर्वेदकी श्रुतियाँ एवं यज्ञादि कर्मोंकी दीक्षा*, सब प्रकारके यज्ञ और क्रतु,† उनमें दी जानेवाली दक्षिणाएँ, जिसमें वे किये जाते हैं—वह संवत्सररूप काल, उनको करनेका अधिकारी यजमान, उनके फलस्वरूप वे सब लोक, जहाँ चन्द्रमा और सूर्य प्रकाश फैलाते हैं—ये सब उत्पन्न हुए हैं॥६॥

सम्बन्ध —अब देवादि समस्त प्राणियोंके भेद और सब प्रकारके सदाचार भी उन्हीं ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं, यह बतलाते हैं—

तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि । प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च॥७॥

च=तथा; तस्मात्=उसी परमेश्वरसे; बहुधा=अनेक भेदोंवाले; देवाः=देवतालोग; सम्प्रसूताः=उत्पन्न हुए; साध्याः=साध्यगण; मनुष्याः=मनुष्य; पशवः वयांसि=पशु-पक्षी; प्राणापानौ=प्राण-अपानवायु; व्रीहियवौ=धान, जो आदि अन्न; च=तथा; तपः=तप; श्रद्धा=श्रद्धा; सत्यम्=सत्य (और); ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्य; च=एवं; विधिः=यज्ञ आदिके अनुष्ठानकी विधि भी; [ एते सम्प्रसूताः ]=ये सब-के-सब उत्पन्न हुए हैं॥७॥

व्याख्या —उन परब्रह्म परमेश्वरसे ही वसु, रुद्र आदि अनेक भेदोंवाले देवतालोग उत्पन्न हुए हैं। उन्हींसे साध्यगण, नाना प्रकारके मनुष्य, विभिन्न जातियोंके पशु, विविध भाँतिके पक्षी और अन्य सब प्राणी उत्पन्न हुए हैं। सबके जीवनरूप प्राण और अपान तथा सब प्राणियोंके आहाररूप धान, जो आदि

  • शास्त्रविधिके अनुसार किसी यज्ञका आरम्भ करते समय यजमान जो संकल्पके साथ उसके अनुष्ठानसम्बन्धी नियमोंके पालनका व्रत लेता है, उसका नाम 'दीक्षा' है।

† यज्ञ और क्रतु—ये यज्ञके ही दो भेद हैं। जिन यज्ञोंमें यूष बनानेकी विधि है, उन्हें 'क्रतु' कहते हैं।

२५४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

अनेक प्रकारके अन्न भी उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। उन्हींसे तप, श्रद्धा, सत्य और ब्रह्मचर्य प्रकट हुए हैं तथा यज्ञादि कर्म करनेकी विधि भी उन परमेश्वरसे ही प्रकट हुई है। तात्पर्य यह कि सब कुछ उन्हींसे उत्पन्न हुआ है। वे ही सबके परम कारण हैं ॥७॥

सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तर्चिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥८॥

तस्मात्=उसी परमेश्वरसे; सप्त=सात; प्राणाः=प्राण; प्रभवन्ति=उत्पन्न होते हैं (तथा); सप्त अर्चिषः=अग्निकी (काली-कराली आदि) सात लपटें; [सप्त] समिधः=सात (विषयरूपी) समिधाएँ; सप्त= सात प्रकारके; होमाः=हवन (तथा); इमे सप्त लोकाः=ये सात लोक—इन्द्रियोंके सात द्वार (उसीसे उत्पन्न होते हैं); येषु=जिनमें; प्राणाः=प्राण; चरन्ति=विचरते हैं; गुहाशयाः=हृदयरूप गुफामें शयन करनेवाले ये; सप्त सप्त=सात-सातके समुदाय; निहिताः=(उसीके द्वारा) सब प्राणियोंमें स्थापित किये हुए हैं ॥८॥

व्याख्या—उन्हीं परमेश्वरसे सात प्राण अर्थात् जिनमें विषयोंको प्रकाशित करनेकी विशेष शक्ति है, ऐसी सात इन्द्रियाँ—कान, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण तथा वाणी एवं मन*; तथा मनसहित इन्द्रियोंकी सुनना, स्पर्श करना, देखना, स्वाद लेना, सृष्टिना, बोलना और मनन करना, इस प्रकार सात वृत्तियाँ अर्थात् विषय ग्रहण करनेवाली शक्तियाँ; उन इन्द्रियोंके विषयरूप सात समिधाएँ; सात प्रकारका हवन अर्थात् बाह्यविषयरूप समिधाओंका इन्द्रियरूप

  • ब्रह्मसूत्रमें इस विषयपर विचार किया गया है कि यहाँ इन्द्रियाँ सात ही क्यों बतलाई गयी हैं, वहाँ कहा गया है कि इन सातके अतिरिक्त हाथ, पैर, उपस्थ तथा गुदा भी इन्द्रियाँ हैं, अतः मनसहित कुल ग्यारह इन्द्रियाँ हैं, यहाँ प्रधानतासे सातका वर्णन है (ब्रह्मसूत्र २।४।२,६)।

खण्ड १ ]

मुण्डकोपनिषद्

२५५

अग्नियोंमें निक्षेपरूप क्रिया और इन इन्द्रियोंके वासस्थानरूप सात लोक, जिनमें रहकर ये इन्द्रियरूप सात प्राण अपना-अपना कार्य करते हैं—निद्राके समय मनके साथ एक होकर हृदयरूप गुफामें शयन करनेवाले ये सात-सातके समुदाय परमेश्वरके द्वारा ही समस्त प्राणियोंमें स्थापित किये हुए हैं ॥८॥

सम्बन्ध —इस प्रकार आध्यात्मिक वस्तुओंकी उत्पत्ति और स्थिति परमेश्वरसे बतलाकर अब बाह्य जगत्की उत्पत्ति भी उसीसे बताते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं—

अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे- उस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः । अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥

अतः=इसीसे; सर्वे=समस्त; समुद्राः=समुद्र; च=और; गिरयः=पर्वत (उत्पन्न हुए हैं); अस्मात्=इसीसे (प्रकट होकर); सर्वरूपाः=अनेक रूपोंवाली; सिन्धवः=नदियाँ; स्यन्दन्ते=बहती हैं; च=तथा; अतः=इसीसे; सर्वाः=सम्पूर्ण; ओषधयः=ओषधियाँ; च=और; रसः=रस (उत्पन्न हुए हैं); येन=जिस रससे (पुष्ट हुए शरीरोंमें); हि=ही; एषः=यह; अन्तरात्मा=(सबका) अन्तरात्मा (परमेश्वर); भूतैः=सब प्राणियों (की आत्मा)-के सहित; तिष्ठते=(उन-उनके हृदयमें) स्थित है ॥९॥

व्याख्या —इन्हीं परमेश्वरसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं, इन्हींसे निकलकर अनेक आकारवाली नदियाँ बह रही हैं, इन्हींसे समस्त ओषधियाँ और वह रस भी उत्पन्न हुआ है, जिससे पुष्ट हुए शरीरोंमें वे सबके अन्तरात्मा परमेश्वर उन सब प्राणियोंकी आत्माके सहित उन-उनके हृदयमें रहते हैं ॥९॥

सम्बन्ध —उन परमेश्वरसे सबकी उत्पत्ति होनेके कारण सब उन्हींका स्वरूप है, यह कहकर उनको जाननेका फल बताते हुए इस खण्डकी समाप्ति करते हैं—

२५६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥ १० ॥

तपः=तपः; कर्म=कर्म; (और) परामृतम्=परम अमृतरूपः; ब्रह्म=ब्रह्म; इदम्=यह; विश्वम्=सब कुछ; पुरुषः एव=परमपुरुष पुरुषोत्तम ही है; सोम्य=हे प्रिय!; एतत्=इस; गुहायाम्=हृदयरूप गुफामें; निहितम्=स्थित अन्तर््यामी परमपुरुषको; यः=जो; वेद=जानता है; सः=वह; इह [ एव ]=यहाँ (इस मनुष्यशरीरमें) ही; अविद्याग्रन्थिम्=अविद्याजनित गॉठको; विकिरति=खोल डालता है ॥ १० ॥

व्याख्या—तप अर्थात् संयमरूप साधन, कर्म अर्थात् बाह्य साधनोंद्वारा किये जानेवाले कृत्य तथा परम अमृत ब्रह्म—यह सब कुछ परमपुरुष पुरुषोत्तम ही है। प्रिय शौनक! हृदयरूप गुफामें छिपे हुए इन अन्तर््यामी परमेश्वरको जो जान लेता है, वह इस मनुष्यशरीरमें ही अविद्याजनित अन्तःकरणकी गॉठका भेदन कर देता है अर्थात् सब प्रकारके संशय और भ्रमसे रहित होकर परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त हो जाता है ॥ १० ॥

॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय खण्ड

आविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत्यदमत्रैतत्समर्पितम् । एजत्प्राणत्रिमिषच्च यदेतन्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वृष्टिं प्रजानाम् ॥ १ ॥*

आविः=(जो) प्रकाशस्वरूपः; संनिहितम्=अत्यन्त समीपस्थ; गुहाचरम् नाम=(हृदयरूप गुहामें स्थित होनेके कारण) गुहाचरनामसे प्रसिद्ध; महत् पदम्=(और) महान् पद (परम प्राप्य) है; यत्=जितने भी; एजत्=चेष्टा करनेवाले;

  • इस मन्त्रसे मिलता हुआ मन्त्र अथर्व० का० १०।८।६ है।

खण्ड २ ]

मुण्डकोपनिषद्

२५७

प्राणत्=श्वस लेनेवाले; च=और; निमिषत्=आँखोंको खोलने-मूँदनेवाले (प्राणी हैं); एतत्=ये (सब-के-सब); अत्र=इसीमें; समर्पितम्=समर्पित (प्रतिष्ठित) हैं; एतत्=इस परमेश्वरको; जानथ=तुमलोग जानो; यत्=जो; सत्=सत्; असत्=(और) असत् है; वरेण्यम्=सबके द्वारा वरण करनेयोग्य (और); वरिष्ठम्=अतिशय श्रेष्ठ है (तथा); प्रजानाम्=समस्त प्राणियोंकी; विज्ञानात्=बुद्धिसे; परम्=परे अर्थात् जाननेमें न आनेवाला है ॥ १ ॥

व्याख्या —सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी परमेश्वर प्रकाशस्वरूप हैं। समस्त प्राणियोंके अत्यन्त समीप उन्हींके हृदयरूप गुहामें छिपे रहनेके कारण ही ये गुहाचरनामसे प्रसिद्ध हैं। जितने भी हिलने-चलनेवाले, श्वस लेनेवाले और आँख खोलने-मूँदनेवाले प्राणी हैं, उन सबका समुदाय इन्हीं परमेश्वरमें समर्पित अर्थात् स्थित है। सबके आश्रय ये परमात्मा ही हैं। तुम इनको जानो। ये सत् और असत् अर्थात् कार्य और कारण एवं प्रकट और अप्रकट—सब कुछ हैं। सबके द्वारा वरण करनेयोग्य और अत्यन्त श्रेष्ठ हैं तथा समस्त प्राणियोंकी बुद्धिसे परे अर्थात् बुद्धिद्वारा अज्ञेय हैं ॥ १ ॥

सम्बन्ध —उन्हीं परब्रह्म परमेश्वरका तत्त्व समझानेके लिये पुनः उनके स्वरूपका दूसरे शब्दोंमें वर्णन करते हैं—

यदधिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिँल्लोका निहिता लोकिनश्च। तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः। तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्व्यं सोम्यं विद्धि ॥ २ ॥

यत्=जो; अधिमत=दीसिमान् है; च=और; यत्=जो; अणुभ्यः=सूक्ष्मोंसे भी; अणु-सूक्ष्म है; यस्मिन्=जिसमें; लोकाः=समस्त लोक; च=और; लोकिनः=उन लोकोंमें रहनेवाले प्राणी; निहिताः=स्थित हैं; तत्=वही; एतत्=यह; अक्षरम्=अविनाशी; ब्रह्म=ब्रह्म है; सः=वही; प्राणः=प्राण है; तत् उ=वही; वाक्=वाणी; मनः=(और) मन है; तत्=वही; एतत्=यह; सत्यम्=सत्य है; तत्=वह; अमृतम्=अमृत है; सोम्य=हे प्यारे!; तत्=उस; वेद्व्यम्=वेधनेयोग्य लक्ष्यको; विद्धि=तू वेध ॥ २ ॥

२५८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

व्याख्या —जो परब्रह्म परमेश्वर अतिशय देदीप्यमान प्रकाशस्वरूप हैं, जो सूक्ष्मोंसे भी अतिशय सूक्ष्म हैं, जिनमें समस्त लोक और उन लोकोंमें रहनेवाले समस्त प्राणी स्थित हैं अर्थात् ये सब जिनके आश्रित हैं, वे ही परम अक्षर ब्रह्म हैं, वे ही सबके जीवनदाता प्राण हैं, वे ही सबकी वाणी और मन अर्थात् समस्त जगत्के इन्द्रिय और अन्तःकरणरूपमें प्रकट हैं। वे ही परम सत्य और अमृत—अविनाशी तत्त्व हैं। प्रिय शौनक! उस वैधनेयोग्य लक्ष्यको तू वैध अर्थात् आगे बताये जानेवाले प्रकारसे साधन करके उसमें तन्मय हो जा॥ २ ॥

सम्बन्ध —लक्ष्यको वैधनेके लिये धनुष और बाण चाहिये; अतः इस रूपककी पूर्णताके लिये सारी सामग्रीका वर्णन करते हैं—

धनुर्गृहीत्वौपनिषदंमहास्त्रं
शरंह्युपासानिशितं
संधयीत।
आयम्य तद्भावगतेन
चेतसा
लक्ष्यंतदेवाक्षरं
सोम्यविद्धि ॥ ३ ॥

औपनिषदम्=उपनिषद्में वर्णित प्रणवरूप; महास्त्रम्=महान् अस्त्र; धनुः=धनुषको; गृहीत्वा=लेकर (उसपर); हि=निश्चय ही; उपासानिशितम्=उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ; शरम्=बाण; संधयीत=चढ़ाये; भावगतेन= (फिर) भावपूर्ण; चेतसा=चित्तके द्वारा; तत्=उस बाणको; आयम्य=खींचकर; सोम्य=हे प्रिय !; तत्=उस; अक्षरम्=परम अक्षर पुरुषोत्तमको; एव=ही; लक्ष्यम्=लक्ष्य मानकर; विद्धि=वैधे ॥ ३ ॥

व्याख्या —जिस प्रकार किसी बाणको लक्ष्यपर छोड़नेसे पहले उसकी नोकको सानपर धरकर तेज किया जाता है, उसपर चढ़े हुए मोरचे आदिको दूर करके उसे उज्ज्वल एवं चमकीला बनाया जाता है, उसी प्रकार आत्मारूपी बाणको उपासनाद्वारा निर्मल एवं शुद्ध बनाकर उसको प्रणवरूप धनुषपर भलीभाँति चढ़ाना चाहिये। अर्थात् आत्माको प्रणवके उच्चारण एवं उसके अर्थरूप परमात्माके चिन्तनमें सम्यक् प्रकारसे लगाना चाहिये। इसके अनन्तर जैसे धनुषको पूरी शक्तिसे खींचकर बाणको लक्ष्यपर छोड़ा जाता है, जिससे

खण्ड २]

मुण्डकोपनिषद्

२५९

वह पूरी तरहसे लक्ष्यको वेध सके, उसी प्रकार यहाँ भावपूर्ण चित्तसे ओंकारका अधिक-से-अधिक लम्बा उच्चारण एवं उसके अर्थका प्रगाढ़ एवं सुदीर्घ कालतक चिन्तन करनेके लिये कहा गया है, जिससे आत्मा निश्चितरूपसे अविनाशी परमात्मामें प्रवेश कर जाय, उसमें तन्मय होकर अविचल स्थिति प्राप्त कर ले। भाव यह है कि ओंकारका प्रेमपूर्वक उच्चारण एवं उसके अर्थरूप परमात्माका प्रगाढ़ चिन्तन ही उनकी प्राप्तिका सर्वोत्तम उपाय है॥ ३ ॥

सम्बन्ध— पूर्वमन्त्रमें कहे हुए रूपकको यहाँ स्पष्ट करते हैं—

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।

अप्रमत्तेन वेद्वद्व्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥ ४ ॥

प्रणवः =(यहाँ) ओंकार ही; धनुः =धनुष है; आत्मा =आत्मा; हि =ही; शरः =बाण है (और); ब्रह्म =परब्रह्म परमेश्वर ही; तल्लक्ष्यम् =उसका लक्ष्य; उच्यते =कहा जाता है; अप्रमत्तेन =(वह) प्रमादरहित मनुष्यद्वारा ही; वेद्वद्व्यम् =बीधा जानेयोग्य है (अतः); शरवत् =(उसे बेधकर) बाणकी तरह; तन्मयः =(उस लक्ष्यमें) तन्मय; भवेत् =हो जाना चाहिये॥ ४ ॥

व्याख्या— ऊपर बतलाये हुए रूपकमें परमेश्वरका वाचक प्रणव (ओंकार) ही मानो धनुष है, यह जीवात्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही उसके लक्ष्य हैं। तत्परतासे उनकी उपासना करनेवाले प्रमादरहित साधकद्वारा ही वह लक्ष्य बेधा जा सकता है; इसलिये हे सोम्य! तुझे पूर्वोक्तरूपसे उस लक्ष्यको बेधकर बाणकी ही भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिये॥ ४ ॥

सम्बन्ध— पुनः परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए प्रमादरहित और विरक्त होकर उसे जाननेके लिये श्रुति कहती है—

यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्ष-

मोतं मनः सह प्राणेश्व सर्वैः।

तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या

वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः॥ ५ ॥

२६०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

यस्मिन्=जिसमें; द्यौः=स्वर्ग; पृथिवी=पृथिवी; च=और; अन्तरिक्षम्=और उनके बीचका आकाश; च=तथा; सर्वैः प्राणैः सह=समस्त प्राणोंके सहित; मनः=मन; ओतम्=गुँथा हुआ है; तम् एव=उसी; एकम्=एक; आत्मानम्=सबके आत्मरूप परमेश्वरको; जानथ=जानो; अन्याः=दूसरी; वाचः=सब बातोंको; विमुञ्चथ=सर्वथा छोड़ दो; एषः=यही; अमृतस्य=अमृतका; सेतुः=सेतु है ॥५॥

व्याख्या —जिन परब्रह्म परमात्मामें स्वर्ग, पृथ्वी तथा उनके बीचका सम्पूर्ण आकाश एवं समस्त प्राण और इन्द्रियोंके सहित मन-बुद्धिरूप अन्तःकरण सबके-सब ओत-प्रोत हैं; उन्हीं एक सर्वात्मा परमेश्वरको तुम पूर्वोक्त उपायके द्वारा जानो; दूसरी सब बातोंको—ग्राम्यचर्चाको सर्वथा छोड़ दो। वे सब तुम्हारे साधनमें विघ्न हैं; अतः उनसे सर्वथा विरक्त होकर साधनमें तत्पर हो जाओ। यही अमृतका सेतु है, अर्थात् संसार-समुद्रसे पार होकर अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त करनेके लिये पुलके सदृश है ॥५॥

सम्बन्ध —पुनः परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए उनकी प्रासिका साधन बताते हैं—

अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः

स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः।

ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं

स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥६॥

रथनाभौ=रथकी नाभिमें (जुड़े हुए); अराः इव=अरोंकी भाँति; यत्र=जिसमें; नाड्यः=समस्त देहव्यापिनी नाड़ियाँ; संहताः=एकत्र स्थित हैं; (उसी हृदयमें) सः=वह; बहुधा=बहुत प्रकारसे; जायमानः=उत्पन्न होनेवाला; एषः=यह (अन्तर्यामी परमेश्वर); अन्तः=मध्यभागमें; चरते=रहता है; [ एनम् ]=इस; आत्मानम्=सर्वात्मा परमात्माका; ओम्=ओम्; इति एवम्=इस नामके द्वारा ही; ध्यायथ=ध्यान करो; तमसः परस्तात्=अज्ञानमय अन्धकारसे अतीत; पाराय=(तथा) भवसागरसे अन्तिम तटरूप पुरुषोत्तमकी प्राप्तिके लिये (साधन करनेमें); वः=तुमलोगोंका; स्वस्ति=कल्याण हो ॥६॥

खण्ड २ ]

मुण्डकोपनिषद्

२६१

व्याख्या—‘जिस प्रकार रथके पहियेके केन्द्रमें अरे लगे रहते हैं, उसी प्रकार शरीरकी समस्त नाड़ियाँ जिस हृदयदेशमें एकत्र स्थित हैं, उसी हृदयमें नाना रूपसे प्रकट होनेवाले परब्रह्म परमात्मा अन्तर्धामीरूपसे रहते हैं। इन सबके आत्मा पुरुषोत्तमका ‘ओम्’ इस नामके उच्चारणके साथ-साथ निरन्तर ध्यान करते रहो। इस प्रकार परमात्माके ‘ओम्’ इस नामका जप और उसके अर्थभूत परमात्माका ध्यान करते रहनेसे तुम उन परमात्माको प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाओगे, जो अज्ञानरूप अन्धकारसे सर्वथा अतीत और संसार-समुद्रके दूसरे पार हैं। तुम्हारा कल्याण हो।’ इस प्रकार आचार्य उपर्युक्त विधिसे साधन करनेवाले शिष्योंको आशीर्वाद देते हैं ॥ ६ ॥

सम्बन्ध—पुनः परमेश्वरके स्वरूपका ही वर्णन करते हैं—

यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्यैष महिमा भुवि। दिव्ये ब्रह्मपुरे होष व्योम्नात्मा प्रतिष्ठितः ॥

मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽत्रे हृदयं संनिधाय। तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद् विभाति ॥ ७ ॥

यः सर्वज्ञः=जो सर्वदा जाननेवाला (और); सर्वविद्=सब ओरसे सबको जाननेवाला है; यस्य=जिसकी; भुवि=जगत्में; एषः=यह; महिमा=महिमा है; एषः हि आत्मा=यह प्रसिद्ध सबका आत्मा परमेश्वर; दिव्ये व्योम्नि=दिव्य आकाशरूप; ब्रह्मपुरे=ब्रह्मलोकमें; प्रतिष्ठितः=स्वरूपसे स्थित है; प्राणशरीरनेता=सबके प्राण और शरीरका नेता; मनोमयः=(यह परमात्मा मनमें व्याप्त होनेके कारण) मनोमय है; हृदयं संनिधाय=(यही) हृदय-कमलका आश्रय लेकर; अत्रे=अन्नमय स्थूल शरीरमें; प्रतिष्ठितः=प्रतिष्ठित है; यत्=जो; आनन्दरूपम्=आनन्दस्वरूप; अमृतम्=अविनाशी परब्रह्म; विभाति=सर्वत्र प्रकाशित है; धीराः=बुद्धिमान् मनुष्य; विज्ञानेन=विज्ञानके द्वारा; तत्=उसको; परिपश्यन्ति=भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेते हैं ॥ ७ ॥

२६२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

व्याख्या —जो परब्रह्म परमेश्वर सर्वज्ञ—सर्वदा जाननेवाले और सब ओरसे सबको भलीभाँति जाननेवाले हैं, अर्थात् जिनकी ज्ञानशक्ति देश-कालसे बाधित नहीं है, जिनकी यह आश्चर्यमयी महिमा जगत्में प्रकट है, वे सबके आत्मा परमेश्वर परम व्योम नामसे प्रसिद्ध दिव्य आकाशरूप ब्रह्मलोकमें स्वरूपसे स्थित हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राण और शरीरका नियमन करनेवाले ये परमेश्वर मनमें व्याप्त होनेके कारण मनोमय कहलाते हैं और सब प्राणियोंके हृदयकमलका आश्रय लेकर अन्नमय स्थूलशरीरमें प्रतिष्ठित हैं। बुद्धिमान् मनुष्य विज्ञानद्वारा उन परब्रह्मको भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेते हैं जो आनन्दमय अविनाशीरूपसे सर्वत्र प्रकाशित हैं ॥ ७ ॥

सम्बन्ध —अब परमात्माके ज्ञानका फल बताते हैं—

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ८ ॥

तस्मिन् परावरे दृष्टे=कार्य-कारणस्वरूप उस परात्पर पुरुषोत्तमको तत्त्वसे जान लेनेपर; अस्य हृदयग्रन्थिः=इस (जीवात्मा) के हृदयकी गाँठ; भिद्यते=खुल जाती है; सर्वसंशयाः=सम्पूर्ण संशय; छिद्यन्ते=कट जाते हैं; च=और; कर्माणि=समस्त शुभाशुभ कर्म; क्षीयन्ते=नष्ट हो जाते हैं ॥ ८ ॥

व्याख्या —कार्य और कारणस्वरूप उन परात्पर परब्रह्म पुरुषोत्तमको तत्त्वसे जान लेनेपर इस जीवके हृदयकी अवधारूप वह गाँठ खुल जाती है, जिसके कारण इसने इस जड़ शरीरको ही अपना स्वरूप मान रखा है; इतना ही नहीं; इसके समस्त संशय सर्वथा कट जाते हैं और समस्त शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं। अर्थात् यह जीव सब बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त होकर परमानन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥

सम्बन्ध —उन परब्रह्मके स्थान, स्वरूप और उनकी महिमाका वर्णन करते हैं—

हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ ९ ॥

खण्ड २]

मुण्डकोपनिषद्

२६३

तत्=वह; विरजम्=निर्मल; निष्कलम्=अवयवरहित; ब्रह्म=परब्रह्म; हिरण्मये परे कोशे=प्रकाशमय परम कोशमें—परमधाममें (विराजमान है); तत्=वह; शुभ्रम्=सर्वथा विशुद्ध; ज्योतिषाम्=समस्त ज्योतियोंकी भी; ज्योतिः=ज्योति है; यत्=जिसको; आत्मविदः=आत्मज्ञानी; विदुः=जानते हैं ॥ ९ ॥

व्याख्या —वे निर्मल—निर्विकार और अवयवरहित—अखण्ड परमात्मा प्रकाशमय परमधाममें विराजमान हैं; वे सर्वथा विशुद्ध और समस्त प्रकाशयुक्त पदार्थोंके भी प्रकाशक हैं तथा उन्हें आत्मज्ञानी महात्माजन ही जानते हैं ॥ ९ ॥

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १० ॥*

तत्र=वहाँ; न=न (तो); सूर्यः=सूर्य; भाति=प्रकाशित होता है; न=न; चन्द्रतारकम्=चन्द्रमा और तारागण ही; न=(तथा) न; इमाः=ये; विद्युतः=बिजलियाँ ही; भान्ति=(वहाँ) चमकती हैं; अयम् अग्निः कुतः=फिर इस अग्निके लिये तो कहना ही क्या है; तम् भान्तम् एव=(क्योंकि) उसके प्रकाशित होनेपर ही; सर्वम्=सब; अनुभाति=उसके पीछे उसीके प्रकाशसे प्रकाशित होते हैं; तस्य=उसीके; भासा=प्रकाशसे; इदम् सर्वम्=यह सम्पूर्ण जगत्; विभाति=प्रकाशित होता है ॥ १० ॥

व्याख्या —उन स्वप्रकाश परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य नहीं प्रकाशित होता। जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकट होनेपर खद्योतका प्रकाश लुप्त हो जाता है, वैसे ही सूर्यका तेज भी उस असीम तेजके सामने लुप्त हो जाता है। चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ नहीं चमकते; फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है। क्योंकि प्राकृत जगत्में जो कुछ

  • यह मन्त्र कठोपनिषद् (२।२।१५) में और श्वेता० उ० (६।१४) में भी है।

२६४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक २ ]

भी तत्त्व प्रकाशशील हैं, सब उन परब्रह्म परमेश्वरकी प्रकाश-शक्तिके अंशको पाकर ही प्रकाशित हैं। वे अपने प्रकाशके समीप अपना प्रकाश कैसे फैला सकते हैं? सारांश यह कि यह सम्पूर्ण जगत् उन जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे अथवा उस प्रकाशके एक शुद्धतम अंशसे प्रकाशित हो रहा है ॥ १० ॥

ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण ।

अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ ११ ॥

इदम्=यह; अमृतम्=अमृतस्वरूप; ब्रह्म=परब्रह्म; एव=ही; पुरस्तात्=सामने हैं; ब्रह्म=ब्रह्म ही; पश्चात्=पीछे हैं; ब्रह्म=ब्रह्म ही; दक्षिणतः=दायीं ओर; च=तथा; उत्तरेण=बार्यी ओर; अधः=नीचेकी ओर; च=तथा; ऊर्ध्वम्=ऊपरकी ओर; च=भी; प्रसृतम्=फैला हुआ है; इदम् [ यत् ]=यह जो; विश्वम्=सम्पूर्ण जगत् है; इदम्=यह; वरिष्ठम्=सर्वश्रेष्ठ; ब्रह्म एव=ब्रह्म ही है ॥ ११ ॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें परमात्माकी सर्वव्यापकता और सर्वरूपताका प्रतिपादन किया गया है। सारांश यह कि ये अमृतस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही आगे-पीछे, दायें-बायें, बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे—सर्वत्र फैले हुए हैं; इस विश्वब्रह्माण्डके रूपमें ये सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही प्रत्यक्ष दिखायी दे रहे हैं ॥ ११ ॥

॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥

॥ द्वितीय मुण्डक समाप्त ॥ २ ॥

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