भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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प्रश्न ६ ]

प्रश्नोपनिषद्

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है, अलग नहीं। उस समय परमात्मामें किसी प्रकारका संकल्प नहीं रहता। अतः वे समस्त कलाओंसे रहित, अमृतस्वरूप कहे जाते हैं। इस तत्त्वको समझनेवाला मनुष्य भी उन परब्रह्मको प्राप्त होकर अकल और अमर हो जाता है। इस विषयपर आगे कहा जानेवाला मन्त्र है—॥५॥

अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन् प्रतिष्ठिताः।

तं वेदं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति॥६॥

रथनाभौ =रथ-चक्रकी नाभिके आधारपर; अराः इव=जिस प्रकार अरे स्थित होते हैं (वैसे ही); यस्मिन् =जिसमें; कलाः =ऊपर बतायी हुई सब कलाएँ; प्रतिष्ठिताः =सर्वथा स्थित हैं; तम् वेद्यम् पुरुषम् =उस जाननेयोग्य (सबके आधारभूत) परम पुरुष परमेश्वरको; वेद =जानना चाहिये; यथा =जिससे (हे मनुष्यों!); वः =तुमलोगोंको; मृत्युः =मृत्यु; मा परिव्यथा इति =दुःख न दे सके॥६॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें सर्वाधार परमेश्वरको जाननेके लिये प्रेरणा करके उसका फल जन्म-मृत्युसे रहित हो जाना बताया गया है। वेदभगवान् मनुष्योंसे कहते हैं—‘जिस प्रकार रथके पहियेमें लगे रहनेवाले सब अरे उस पहियेके मध्यस्थ नाभमें प्रविष्ट रहते हैं, उन सबका आधार नाभ है— नाभिके बिना वे टिक ही नहीं सकते, उसी प्रकार ऊपर बतायी हुई प्राण आदि सोलह कलाओंके जो आधार हैं, ये सब कलाएँ जिनके आश्रित हैं, जिनसे उत्पन्न होती हैं और जिनमें विलीन हो जाती हैं, वे ही जाननेयोग्य परब्रह्म परमेश्वर हैं। उन सर्वाधार परमात्माको जानना चाहिये। उन्हें जान लेनेके बाद तुम्हें मौतका डर नहीं रहेगा, फिर मृत्यु तुमको इस जन्म-मृत्युयुक्त संसारमें डालकर दुःखी नहीं कर सकेगी। तुमलोग सदाके लिये अमर हो जाओगे॥६॥

तान्होवाचैतावदेवाहेतत्परं ब्रह्म वेद। नातः परमस्तीति॥७॥

=(तत्पश्चात्) उन प्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने; तान् उवाच =उन सबसे कहा; एतत् =इस; परम् ब्रह्म =परम ब्रह्मको; अहम् =मैं; एतावत् =इतना; एव =ही; वेद =जानता हूँ; अतः परम् =इससे पर (उत्कृष्ट तत्त्व); =नहीं; अस्ति इति =है॥७॥