ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 197, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न ३ ] प्रश्नोपनिषद् १९५
तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥
तस्मै सः ह उवाच = उससे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; अतिप्रश्नान् पृच्छसि = तू बड़े कठिन प्रश्न पूछ रहा है (किंतु); ब्रह्मिष्ठः असि इति = वेदोंको अच्छी तरह जाननेवाला है; तस्मात् = अतः; अहम् = मैं; ते = तेरे; ब्रवीमि = प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ ॥ २ ॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें महर्षि पिप्पलादने आश्वलायन मुनिके प्रश्नोंको कठिन बतलाकर उनकी बुद्धिमत्ता और तर्कशीलताकी प्रशंसा की है और साथ ही यह भाव भी दिखलाया है कि 'तू जिस ढंगसे पूछ रहा है, उसे देखते हुए तो मुझे तेरे प्रश्नोंका उत्तर नहीं देना चाहिये। परंतु मैं जानता हूँ कि तू तर्कबुद्धिसे नहीं पूछ रहा है, तू श्रद्धालु है, वेदोंमें निष्णात है; अतः मैं तेरे प्रश्नोंका उत्तर दे रहा हूँ' ॥ २ ॥
आत्मन एष प्राणो जायते यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ॥ ३ ॥
एषः प्राणः = यह प्राण; आत्मनः = परमात्मासे; जायते = उत्पन्न होता है; यथा = जिस प्रकार; एषा छाया = यह छाया; पुरुषे = पुरुषके होनेपर (ही होती है); [ तथा ] = उसी प्रकार; एतत् = यह (प्राण); एतस्मिन् = इस (परमात्मा) के ही; आततम् = आश्रित है (और); अस्मिन् शरीरे = इस शरीरमें; मनोकृतेन = मनके किये हुए (संकल्प) से; आयाति = आता है ॥ ३ ॥
व्याख्या—यहाँ महर्षि पिप्पलादने क्रमसे आश्वलायन ऋषिके दो प्रश्नोंका उत्तर दिया है। पहले प्रश्नका उत्तर तो यह है कि जिसका प्रकरण चल रहा है, वह सर्वश्रेष्ठ प्राण परमात्मासे उत्पन्न हुआ है। (मु० उ० २। ३) वह परब्रह्म परमेश्वर ही इसका उपादानकारण है और वही इसकी रचना करनेवाला है; अतः इसकी स्थिति उस सर्वात्मा महेश्वरके अधीन—उसीके आश्रित है—ठीक उसी प्रकार जैसे किसी मनुष्यकी छाया उसके अधीन रहती है। दूसरे प्रश्नका उत्तर यह है कि मनद्वारा किये हुए संकल्पसे वह शरीरमें प्रवेश करता है। भाव