भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 198

१९६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ प्रश्न ३ ]

यह है कि मरते समय प्राणीके मनमें उसके कर्मानुसार जैसा संकल्प होता है, उसे वैसा ही शरीर मिलता है, अतः प्राणोंका शरीरमें प्रवेश मनके संकल्पसे ही होता है॥ ३ ॥

सम्बन्ध— अब आश्लायनके तीसरे प्रश्नका उत्तर विस्तारपूर्वक आरम्भ किया जाता है—

यथा सप्तम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते एतान्नामानेता- न्नामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥

यथा=जिस प्रकार; सप्तम्राद एव=चक्रवर्ती महाराज स्वयं ही; एतान् ग्रामान् एतान् ग्रामान् अधितिष्ठस्व=इन गाँवोंमें तुम रहो, इन गाँवोंमें तुम रहो; इति=इस प्रकार; अधिकृतान्=अधिकारियोंको; विनियुङ्क्ते=अलग-अलग नियुक्त करता है; एवम् एव=उसी प्रकार; एषः प्राणः=यह मुख्य प्राण; इतरान्=दूसरे; प्राणान्=प्राणोंको; पृथक् पृथक् एव=पृथक्-पृथक् ही; संनिधत्ते=स्थापित करता है॥ ४ ॥

व्याख्या— यहाँ महर्षि उदाहरणद्वारा तीसरे प्रश्नका समाधान करते हुए कहते हैं—‘जिस प्रकार भूमण्डलका चक्रवर्ती सप्तम्राद भिन्न-भिन्न ग्राम, मण्डल और जनपद आदिमें पृथक्-पृथक् अधिकारियोंकी नियुक्ति करता है और उनका कार्य बाँट देता है, उसी प्रकार यह सर्वश्रेष्ठ प्राण भी अपने अङ्गस्वरूप अपान, व्यान आदि दूसरे प्राणोंको शरीरके पृथक्-पृथक् स्थानोंमें पृथक्-पृथक् कार्यके लिये नियुक्त कर देता है॥ ४ ॥

सम्बन्ध— अब मुख्य प्राण, अपान और समान—इन तीनोंका वासस्थान और कार्य बतलाया जाता है—

प्रायूपस्थेऽपानं चक्षुः श्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः । एष होतद्भुतमत्रं समं नयति तस्मादेताः समाधिषो भवन्ति ॥ ५ ॥