भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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प्रश्न ३ ] प्रश्नोपनिषद् १९९

है। पापकर्मोंसे युक्त मनुष्यको शूकर-कूकर आदि पाप-योनियोंमें और रौरवादि नरकोंमें ले जाता है तथा जो पाप और पुण्य—दोनों प्रकारके कर्मोंका मिश्रित फल भोगनेके लिये अभिमुख हुए रहते हैं, उनको मनुष्य-शरीरमें ले जाता है*॥७॥ **सम्बन्ध—**अब दो मन्त्रोंमें आश्वलायनके पाँचवें और छठे प्रश्नका उत्तर देते हुए जीवात्माके प्राण और इन्द्रियोंसहित एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी बात भी स्पष्ट करते हैं—

**आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः।**

पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः॥८॥

**ह=**यह निश्चय है कि; **आदित्यः वै=**सूर्य ही; **बाह्यः प्राणः=**बाह्य प्राण है; **एषः**

**हि=**यही; **एनम् चाक्षुषम्=**इस नेत्रसम्बन्धी; **प्राणम्=**प्राणपर; **अनुगृह्णानः=**अनुग्रह करता हुआ; **उदयति=**उदित होता है; **पृथिव्याम्=**पृथ्वीमें; **या देवता=**जो (अपानवायुकी शक्तिरूप) देवता है; **सा एषा=**वही यह; **पुरुषस्य=**मनुष्यके; **अपानम्=**अपान वायुको; **अवष्टभ्य=**स्थिर किये; [वर्तते]=रहता है; **अन्तरा=**पृथ्वी और स्वर्गके बीच; **यत् आकाशः=**जो आकाश (अन्तरिक्षलोक) है; **सः समानः=**वह समान है; **वायुः व्यानः=**वायु ही व्यान है॥८॥ **व्याख्या—**यह निश्चयपूर्वक समझना चाहिये कि सूर्य ही सबका बाह्य प्राण है। यह मुख्य प्राण सूर्यरूपसे उदय होकर इस शरीरके बाह्य अङ्ग- प्रत्यङ्गोंको पुष्ट करता है और नेत्र-इन्द्रियरूप आध्यात्मिक शरीरपर अनुग्रह


* एक शरीरसे निकलकर जब मुख्य प्राण उदानको साथ लेकर उसके द्वारा दूसरे शरीरमें जाता है, तब अपने अङ्गभूत समान आदि प्राणोंको तथा इन्द्रिय और मनको तो साथ ले ही जाता है, इन सबका स्वामी जीवात्मा भी उसीके साथ जाता है (गीता १५।८) यह बात यहाँ कहनी थी; इसीलिये पूर्व मन्त्रमें जीवात्माका स्थान हृदय बतलाया गया है एवं इसका स्पष्टीकरण १० वें मन्त्रमें किया गया है।