ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें१९८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ३
एक सौ (शाखाएँ) हैं (प्रत्येक शाखा-नाडीकी); द्वासप्ततिः द्वासप्ततिः = बहत्तर-बहत्तर; प्रतिशाखानाडीसहस्राणि = हजार प्रतिशाखानाडियाँ; भवन्ति = होती हैं; आसु = इनमें; व्यानः = व्यानवायु; चरति = विचरण करता है॥ ६॥
व्याख्या— इस शरीरमें जो हृदयप्रदेश है, जो जीवात्माका निवासस्थान है, उसमें एक सौ मूलभूत नाडियाँ हैं; उनमेंसे प्रत्येक नाडीकी एक-एक सौ शाखा-नाडियाँ हैं और प्रत्येक शाखा-नाडीकी बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखा-नाडियाँ हैं। इस प्रकार इस शरीरमें कुल बहत्तर करोड़ नाडियाँ हैं; इन सबमें व्यानवायु विचरण करता है॥ ६॥
सम्बन्ध— अब उदानका स्थान और कार्य बतलाते हैं, साथ ही आश्वलायनके चौथे प्रश्नका उत्तर भी देते हैं—
अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७॥
अथ = तथा; एकया = जो एक नाडी और है, उसके द्वारा; उदानः ऊर्ध्वः = उदानवायु ऊपरकी ओर; [ चरति ] = विचरता है; [ सः ] पुण्येन = वह पुण्यकर्मोंके द्वारा; [ मनुष्यम् ] = मनुष्यको; पुण्यम् लोकम् = पुण्यलोकोंमें; नयति = ले जाता है; पापेन = पापकर्मोंके कारण (उसे); पापम् [ नयति ] = पापयोनियोंमें ले जाता है (तथा); उभाभ्याम् एव = पाप और पुण्य दोनों प्रकारके कर्मोंद्वारा (जीवको); मनुष्यलोकम् = मनुष्य-शरीरमें; [ नयति ] = ले जाता है॥ ७॥
व्याख्या— इन ऊपर बतलायी हुई बहत्तर करोड़ नाड़ियोंसे भिन्न एक नाडी और है जिसको ‘सुषुम्णा’ कहते हैं, जो हृदयसे निकलकर ऊपर मस्तकमें गयी है। उसके द्वारा उदानवायु शरीरमें ऊपरकी ओर विचरण करता है। (इस प्रकार आश्वलायनके तीसरे प्रश्नका समाधान करके अब महर्षि उसके चौथे प्रश्नका उत्तर संक्षेपमें देते हैं—) जो मनुष्य पुण्यशील होता है, जिसके शुभकर्मोंके भोग उदय हो जाते हैं, उसे यह उदानवायु ही अन्य सब प्राण और इन्द्रियोंके सहित वर्तमान शरीरसे निकालकर पुण्यलोकोंमें अर्थात् स्वर्गादि उच्च लोकोंमें ले जाता