ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 176, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें१७४ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न १
ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए; (और) तपसा=तपस्यापूर्वक; संवत्सरम्=एक वर्षतक (यहाँ); संवत्स्यथ=भलीभाँति निवास करो; यथाकामम्=(उसके बाद) अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार; प्रश्नान् पृच्छत=प्रश्न पूछना; यदि विज्ञास्यामः=यदि (तुम्हारी पूछी हुई बातोंको) मैं जानता होऊँगा; ह सर्वम्=तो निःसंदेह वे सब बातें; वः वक्ष्यामः इति=तुमलोगोंको बताऊँगा॥ २॥
**व्याख्या—**उपर्युक्त छहों ऋषियोंको परब्रह्मकी जिज्ञासासे अपने पास आया देखकर महर्षि पिप्पलादने उनसे कहा—तुमलोग तपस्वी हो, तुमने ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़े हैं; तथापि मेरे आश्रममें रहकर पुनः एक वर्षतक श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए तपश्चर्या करो। उसके बाद तुमलोग जो चाहो, मुझसे प्रश्न करना। यदि तुम्हारे पूछे हुए विषयका मुझे ज्ञान होगा तो निस्संदेह तुम्हें सब बातें भलीभाँति समझाकर बताऊँगा॥ २॥
**सम्बन्ध—**ऋषिके आज्ञानुसार सबने श्रद्धा, ब्रह्मचर्य और तपस्याके साथ विधिपूर्वक एक वर्षतक वहाँ निवास किया।
अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ।
भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति॥ ३॥
अथ=तदनन्तर (उनमेंसे); कात्यायनः कबन्धी=कत्य ऋषिके प्रपौत्र कबन्धीने; उपेत्य=(पिप्पलाद ऋषिके) पास जाकर; पप्रच्छ=पूछा—; भगवन्=भगवन्!; कुतः ह वै=किस प्रसिद्ध और सुनिश्चित कारणविशेषसे; इमाः प्रजाः=यह सम्पूर्ण प्रजा; प्रजायन्ते=नाना रूपोंमें उत्पन्न होती है; इति=यह मेरा प्रश्न है॥ ३॥
**व्याख्या—**महर्षि पिप्पलादकी आज्ञा पाकर वे लोग श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वहीं तपश्चर्या करने लगे। महर्षिकी देख-रेखमें संयमपूर्वक रहकर एक वर्षतक उन्होंने त्यागमय जीवन बिताया। उसके बाद वे सब पुनः पिप्पलाद ऋषिके पास गये तथा उनमेंसे सर्वप्रथम कत्य ऋषिके प्रपौत्र कबन्धीने श्रद्धा और विनयपूर्वक पूछा—'भगवन्! जिससे ये सम्पूर्ण चराचर जीव नाना रूपोंमें उत्पन्न होते हैं, जो इनका सुनिश्चित परम कारण है, वह कौन है?'॥ ३॥