भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १७३


ॐ=ॐ इस परमात्माके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं; भारद्वाजः सुकेशा=भरद्वाज-पुत्र सुकेशा; च शैब्यः सत्यकामः=और शिविकुमार सत्यकाम; च गार्ग्यः सौर्यायणी=तथा गर्गगोत्रमें उत्पन्न सौर्यायणी; च कौसल्यः आश्वलायनः=एवं कोसलदेशीय आश्वलायन; च वैदर्भिः भार्गवः=तथा विदर्भनिवासी भार्गव; [ ] कात्यायनः कबन्धी=और कत्य ऋषिका प्रपौत्र कबन्धी; ते एते ह ब्रह्मपराः=वे ये छः प्रसिद्ध ऋषि, जो वेदपरायण (और); ब्रह्मनिष्ठाः=वेदमें निष्ठा रखनेवाले थे; ते ह=वे सब-के-सब; परम् ब्रह्म=परब्रह्मकी; अन्वेषमाणाः=खोज करते हुए; एषः ह वै तत् सर्वम् वक्ष्यति इति=यह समझकर कि ये (पिप्पलाद ऋषि) निश्चय ही उस ब्रह्मके विषयमें सारी बातें बतायेंगे; समित्पाणयः=हाथमें समिधा लिये हुए; भगवन्तम् पिप्पलादम् उपसन्नाः=भगवान् पिप्पलाद ऋषिके पास गये॥ १॥

व्याख्या—ओंकारस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्माका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है। प्रसिद्ध है कि भरद्वाजके पुत्र सुकेशा, शिविकुमार सत्यकाम, गर्गगोत्रमें उत्पन्न सौर्यायणी, कोसलदेश-निवासी आश्वलायन, विदर्भदेशीय भार्गव और कत्यके प्रपौत्र कबन्धी—ये वेदाभ्यासके परायण और ब्रह्मनिष्ठ अर्थात् श्रद्धापूर्वक वेदानुकूल आचरण करनेवाले थे। एक बार ये छहों ऋषि परब्रह्म परमेश्वरकी जिज्ञासासे एक साथ बाहर निकले। इन्होंने सुना था कि पिप्पलाद ऋषि इस विषयको विशेषरूपसे जानते हैं; अतः यह सोचकर कि ‘परब्रह्मके सम्बन्धमें हम जो कुछ जानना चाहते हैं, वह सब वे हमें बता देंगे’ वे लोग जिज्ञासुके वेशमें हाथमें समिधा लिये हुए महर्षि पिप्पलादके पास गये॥ १॥

तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥

तान् सः ह=उन सुकेशा आदि ऋषियोंसे वे प्रसिद्ध; ऋषिः उवाच=(पिप्पलाद) ऋषि बोले—; भूयः एव=तुमलोग पुनः; श्रद्धया=श्रद्धाके साथ;