ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न १
ह=यह निश्चय है कि; आदित्यः वै=सूर्य ही; प्राणः=प्राण है (और); चन्द्रमाः एव=चन्द्रमा ही; रयिः=रयि है; यत् मूर्तम् च=जो कुछ आकारवाला है (पृथ्वी, जल और तेज); अमूर्तम् च=और जो आकाररहित है (आकाश और वायु); एतत् सर्वम् वै=यह सभी कुछ; रयिः=रयि है; तस्मात्=इसलिये; मूर्तिः एव=मूर्तमात्र ही अर्थात् देखने तथा जाननेमें आनेवाली सभी वस्तुएँ; रयिः=रयि हैं॥ ५॥
व्याख्या— इस मन्त्रमें उपर्युक्त प्राण और रयिका स्वरूप समझाया गया है। पिप्पलाद कहते हैं कि यह दीखनेवाला सम्पूर्ण जगत् प्राण और रयि—इन दोनों तत्त्वोंके संयोग या सम्मिश्रणसे बना है; इसलिये यद्यपि इन्हें पृथक्-पृथक् करके नहीं बताया जा सकता, तथापि तुम इस प्रकार समझो—यह सूर्य, जो हमें प्रत्यक्ष दिखलायी देता है, यही प्राण है; क्योंकि इसीमें सबको जीवन प्रदान करनेवाली चेतना-शक्तिकी प्रधानता और अधिकता है। यह सूर्य उस सूक्ष्म जीवनी शक्तिका घनीभूत स्वरूप है। उसी प्रकार यह चन्द्रमा ही ‘रयि’ है; क्योंकि इसमें स्थूल तत्त्वोंको पुष्ट करनेवाली भूत तन्मात्राओंकी ही अधिकता है। समस्त प्राणियोंके स्थूल शरीरोंका पोषण इस चन्द्रमाकी शक्तिको पाकर ही होता है। हमारे शरीरोंमें ये दोनों शक्तियाँ प्रत्येक अङ्ग-प्रत्यङ्गमें व्याप्त हैं। उनमें जीवनी शक्तिका सम्बन्ध सूर्यसे है और मांस, मेद आदि स्थूल तत्त्वोंका सम्बन्ध चन्द्रमासे है॥ ५॥
अथादित्य उदयन्त्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते। यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६॥
अथ=रात्रिके अनन्तर; उदयन्=उदय होता हुआ; आदित्यः=सूर्य; यत् प्राचीम् दिशम्=जो पूर्व दिशामें; प्रविशति=प्रवेश करता है; तेन प्राच्यान् प्राणान्=उससे पूर्व दिशाके प्राणोंको; रश्मिषु=अपनी किरणोंमें; संनिधत्ते=धारण करता है (उसी