भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १७७

प्रकार); यत् दक्षिणाम्=जो दक्षिण दिशाको; यत् प्रतीचीम्=जो पश्चिम दिशाको; यत् उदीचीम्=जो उत्तर दिशाको; यत् अधः=जो नीचेके लोकोंको; यत् ऊर्ध्वम्=जो ऊपरके लोकोंको; यत् अन्तरा दिशः=जो दिशाओंके बीचके भागों (कोणों) को (और); यत् सर्वम्=जो अन्य सबको; प्रकाशयति=प्रकाशित करता है; तेन सर्वान् प्राणान्=उससे समस्त प्राणोंको अर्थात् सम्पूर्ण जगत्के प्राणोंको; रश्मिषु संनिधत्ते=अपनी किरणोंमें धारण करता है॥ ६॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंमें जो जीवनी शक्ति है, उसके साथ सूर्यका सम्बन्ध दिखलाया गया है। भाव यह है कि रात्रिके बाद जब सूर्य उदय होकर पूर्वदिशामें अपना प्रकाश फैलाता है, उस समय वहाँके प्राणियोंके प्राणोंको अपनी किरणोंमें धारण करता है अर्थात् उनकी जीवनी शक्तिका सूर्यकी किरणोंसे सम्बन्ध होकर उसमें नवीन स्फूर्ति आ जाती है। उसी प्रकार जिस समय जिस दिशामें जहाँ-जहाँ सूर्य अपना प्रकाश फैलाता है, वहाँ-वहाँके प्राणियोंको स्फूर्ति देता रहता है; अतः सूर्य ही समस्त प्राणियोंका प्राण है॥ ६॥

स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते। तदेतदृचाभ्युक्तम्॥ ७॥

सः एषः=वह यह सूर्य ही; उदयते=उदय होता है; वैश्वानरः अग्निः=(जो कि) वैश्वानर अग्नि (जठराग्नि) (और); विश्वरूपः प्राणः=विश्वरूप प्राण है; तत् एतत्=वही यह बात; ऋचा=ऋचाद्वारा; अभ्युक्तम्=आगे कही गयी है॥ ७॥

**व्याख्या—**प्राणियोंके शरीरमें जो वैश्वानर नामसे कही जानेवाली जठराग्नि है, जिससे अन्नका पाचन होता है (गीता १५। १४), वह सूर्यका ही अंश है; अतः सूर्य ही है। तथा जो प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—इन पाँच रूपोंमें विभक्त प्राण है, वह भी इस उदय होनेवाले सूर्यका ही अंश है; अतः सूर्य ही है। यही बात अगली ऋचाद्वारा समझायी गयी है॥ ७॥