ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 548 में से
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कठोपनिषद्
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अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च। यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥८॥*
तु=परंतु; अव्यक्तात्=अव्यक्तसे (भी वह); व्यापकः=व्यापक; च=और; अलिङ्गः एव=सर्वथा आकाररहित; पुरुषः=परमपुरुष; परः=श्रेष्ठ है; यम्=जिसको; ज्ञात्वा=जानकर; जन्तुः=जीवात्मा; मुच्यते=मुक्त हो जाता है; च=और; अमृतत्वम्=अमृतस्वरूप आनन्दमय ब्रह्मको; गच्छति=प्राप्त हो जाता है ॥८॥
व्याख्या—परंतु इस प्रकृतिसे भी इसके स्वामी परमपुरुष परमात्मा श्रेष्ठ हैं, जो निराकाररूपसे सर्वत्र व्यापक हैं (गीता १।४)। जिनको जानकर यह जीवात्मा प्रकृतिके बन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जाता है और अमृतस्वरूप परमानन्दको पा लेता है। अतः मनुष्यको चाहिये कि वह इस प्रकृतिके बन्धनसे छूटनेके लिये इसके स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तमकी शरण ग्रहण करे। (गीता ७।१४) परमात्मा जब इस जीवपर दया करके मायाके परदेको हटा लेते हैं, तभी इसको उनकी प्राप्ति होती है। नहीं तो यह मूढ़ जीव सर्वदा अपने समीप रहते हुए भी उन परमेश्वरको पहचान नहीं पाता ॥८॥
न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्। हदा मनीषा मनसाभिवलूसो य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥९॥†
अस्य=इस परमेश्वरका; रूपम्=वास्तविक स्वरूप; संदृशे=अपने सामने प्रत्यक्ष विषयके रूपमें; न तिष्ठति=नहीं ठहरता; एनम्=इसको; कश्चन=कोई भी; चक्षुषा=चर्मचक्षुओंद्वारा; न पश्यति=नहीं देख पाता; मनसा=मनसे; अभिवलूसः=बारम्बार चिन्तन करके ध्यानमें लाया हुआ (वह परमात्मा); हदा=निर्मल और निश्चल
- इसका विस्तार इसी उपनिषद्के १।३।१०,११ में देखना चाहिये।
† इससे मिलता-जुलता मन्त्र श्वेता० उ० ४।२० है।