ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 164, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
च=और; [ यत् ]=जो उनका; उदयास्तमयौ=उदय और लय हो जानारूप स्वभाव है; [ तत् ]=उसे; मत्वा=जानकर; धीरः=(आत्माका स्वरूप उनसे विलक्षण समझनेवाला) धीर पुरुष; न शोचति=शोक नहीं करता ॥ ६ ॥
व्याख्या —शब्द-स्पर्शादि विषयोंके अनुभवरूप पृथक्-पृथक् कार्य करनेके लिये भिन्न-भिन्न रूपमें उत्पन्न हुई इन्द्रियोंके जो पृथक्-पृथक् भाव हैं तथा जाग्रत्-अवस्थामें कार्यशील हो जाना और सुषुप्तिकालमें लय हो जानारूप जो उनकी परिवर्तनशीलता है, इनपर विचार करके जब बुद्धिमान् मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है कि 'ये इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि या इनका संघातरूप यह शरीर मैं नहीं हूँ, मैं इनसे सर्वथा विलक्षण नित्य चेतन हूँ, सर्वथा विशुद्ध एवं सदा एकरस हूँ,' तब वह किसी प्रकारका शोक नहीं करता, सदाके लिये दुःख और शोकसे रहित हो जाता है ॥ ६ ॥
सम्बन्ध —अगले दो मन्त्रोंमें तत्त्वविचार करते हैं—
इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् ।
सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥
इन्द्रियेभ्यः =इन्द्रियोंसे (तो); मनः =मन; परम् =श्रेष्ठ है; मनसः =मनसे; सत्त्वम् =बुद्धि; उत्तमम् =उत्तम है; सत्त्वात् =बुद्धिसे; महान् आत्मा =उसका स्वामी जीवात्मा; अधि =ऊँचा है (और); महतः =जीवात्मासे; अव्यक्तम् =अव्यक्त शक्ति; उत्तमम् =उत्तम है ॥ ७ ॥
व्याख्या —इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि उत्तम है, बुद्धिसे इनका स्वामी जीवात्मा ऊँचा है; क्योंकि उन सबपर इसका अधिकार है। वे सभी इसकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं और यह उनका शासक है, अतः उनसे सर्वथा विलक्षण है। इस जीवात्मासे भी इसका अव्यक्त (कारण) शरीर प्रबल है, जो कि भगवान्की उस प्रकृतिका अंश है, जिसने इसको बन्धनमें डाल रखा है। तुलसीदासजीने भी कहा है 'जैहि बस कीन्हें जीव निकाया'। गीतामें भी प्रकृतिजनित तीनों गुणोंके द्वारा जीवात्माके बाँधे जानेकी बात कही गयी है (१४।५) ॥ ७ ॥