ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें| १५२ | ईशादि नौ उपनिषद् | [ अध्याय २ |
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जिसका ज्ञान सदैव एकरस रहता है, कभी अधिक, न्यून या लुप्त नहीं होता, वही परम विशुद्ध दिव्य तत्त्व है, वही परब्रह्म है; उसीको ज्ञानी महापुरुषोंके द्वारा प्राप्य परम अमृतस्वरूप परमानन्द कहा जाता है। ये सम्पूर्ण लोक उसीके आश्रित हैं। उसे कोई भी नहीं लाँघ सकता—कोई भी उसके नियमोंका अतिक्रमण नहीं कर सकता। सभी सदा सर्वदा एकमात्र उसीके शासनमें रहनेवाले और उसीके अधीन हैं। कोई भी उसकी महिमाका पार नहीं पा सकता। यही है वह ब्रह्म-तत्त्व जिसके विषयमें तुमने पूछा था॥ ८॥
**सम्बन्ध—**अब अग्निके दृष्टान्तसे उस परब्रह्म परमेश्वरकी व्यापकता और निर्लेपताका वर्णन करते हैं—
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥ ९॥
यथा=जिस प्रकार; भुवनम्=समस्त ब्रह्माण्डमें; प्रविष्टः=प्रविष्ट; एकः अग्निः=एक ही अग्नि; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूपः=उनके समान रूपवाला-सा; बभूव=हो रहा है; तथा=वैसे (ही); सर्वभूतान्तरात्मा=समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा परब्रह्म; एकः [सन् अपि]=एक होते हुए भी; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूपः=उन्हींके जैसे रूपवाला (हो रहा है); च बहिः=और उनके बाहर भी है॥ ९॥
**व्याख्या—**एक ही अग्नि निराकाररूपसे सारे ब्रह्माण्डमें व्याप्त है, उसमें कोई भेद नहीं है, परंतु जब वह साकाररूपसे प्रज्वलित होता है, तब उन आधारभूत वस्तुओंका जैसा आकार होता है, वैसा ही आकार अग्निका भी दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी परमेश्वर एक हैं और सबमें समभावसे व्याप्त हैं, उनमें किसी प्रकारका कोई भेद नहीं है, तथापि वे भिन्न-भिन्न प्राणियोंमें उन-उन प्राणियोंके अनुरूप नाना रूपोंमें प्रकाशित होते हैं। भाव यह कि आधारभूत वस्तुके अनुरूप ही उनकी महिमाका प्राकट्य होता