ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली २ ] कठोपनिषद् १५३
है। वास्तवमें उन परमेश्वरकी महत्ता इतनी ही नहीं है, इससे बहुत अधिक विलक्षण है। उनकी अनन्त शक्तिके एक क्षुद्रतम अंशसे ही यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नाना प्रकारकी आश्चर्यमय शक्तियोंसे सम्पन्न हो रहा है॥ ९॥
सम्बन्ध— वही बात वायुके दृष्टान्तसे कहते हैं—
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १०॥
यथा=जिस प्रकार; भुवनम्=समस्त ब्रह्माण्डमें; प्रविष्टः=प्रविष्ट; एकः वायुः= एक (ही) वायु; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूपः=उनके समान रूपवाला- सा; बभूव=हो रहा है; तथा=वैसे (ही); सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तरात्मा परब्रह्म; एकः [ सन् अपि ]=एक होते हुए भी; रूपम् रूपम्= नाना रूपोंमें; प्रतिरूपः=उन्हींके जैसे रूपवाला (हो रहा है); च बहिः=और उनके बाहर भी है ॥ १०॥
व्याख्या— एक ही वायु अव्यक्तरूपसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें व्याप्त है, तथापि व्यक्तमें भिन्न-भिन्न वस्तुओंके संयोगसे उन-उन वस्तुओंके अनुरूप गति और शक्तिवाला दिखायी देता है। उसी प्रकार समस्त प्राणियोंका अन्तर्यामी परमेश्वर एक होते हुए भी उन-उन प्राणियोंके सम्बन्धसे पृथक्-पृथक् शक्ति और गतिवाला दीखता है, किंतु वह उतना ही नहीं है, उन सबके बाहर भी अनन्त— असीम एवं विलक्षण रूपसे स्थित है (नवम मन्त्रकी व्याख्याके अनुसार इसे भी समझ लेना चाहिये) ॥ १०॥
सम्बन्ध— इस मन्त्रमें सूर्यके दृष्टान्तसे परमात्माकी निर्लेपता दिखलाते हैं—
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षु- र्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११॥