ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 156, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय २
यथा=जिस प्रकार; सर्वलोकस्य=समस्त ब्रह्माण्डका; चक्षुः सूर्यः=प्रकाशक सूर्य देवता; चाक्षुषैः=(लोगोंकी) आँखोंसे होनेवाले; बाह्यदोषैः=बाहरके दोषोंसे; न लिप्यते=लिप्त नहीं होता; तथा=उसी प्रकार; सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तरात्मा; एकः=एक परब्रह्म परमात्मा; लोकदुःखेन=लोगोंके दुःखोंसे; न लिप्यते=लिप्त नहीं होता; [यतः]=क्योंकि; बाह्यः=सबमें रहता हुआ भी वह सबसे अलग है॥ ११॥
व्याख्या—एक ही सूर्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता है। उसका प्रकाश प्राणिमात्रकी आँखोंका सहायक है। उस प्रकाशकी ही सहायता लेकर लोग नाना प्रकारके गुणदोषमय कर्म करते हैं, परंतु सूर्य उनके नेत्रोंद्वारा किये जानेवाले नाना प्रकारके बाह्य कर्मरूप दोषोंसे तनिक भी लिप्त नहीं होता। इसी प्रकार सबके अन्तर्यामी भगवान् परब्रह्म पुरुषोत्तम एक हैं, उन्हींकी शक्तिसे शक्तियुक्त होकर मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा मनुष्य नाना प्रकारके शुभाशुभ कर्म करते हैं तथा उनका फलरूप सुख-दुःखादि भोगते हैं। परंतु वे परमेश्वर उनके कर्म और दुःखोंसे लिप्त नहीं होते, क्योंकि वे सबमें रहते हुए भी सबसे पृथक् और सर्वथा असङ्ग हैं (गीता १३। ३१)॥ ११॥
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२॥*
यः=जो; सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तर्यामी; एकः वशी=अद्वितीय एवं सबको वशमें रखनेवाला (परमात्मा); एकम् रूपम्=(अपने) एक ही रूपको; बहुधा=बहुत प्रकारसे; करोति=बना लेता है, तम् आत्मस्थम्=उस अपने अंदर रहनेवाले (परमात्मा) को; ये धीराः=जो ज्ञानी पुरुष; अनुपश्यन्ति=निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम्=उन्हींको; शाश्वतम् सुखम्=सदा अटल
* यह मन्त्र श्वेताश्वतरोपनिषद् ६। १२ से मिलता-जुलता है।