ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली २ ] कठोपनिषद् १५५
रहनेवाला परमानन्दस्वरूप वास्तविक सुख (मिलता है); इतरेषाम् न=दूसरोंको नहीं ॥ १२ ॥
व्याख्या—जो परमात्मा सदा सबके अन्तरात्मारूपसे स्थित हैं, जो अद्वितीय और सर्वथा स्वतन्त्र हैं, सम्पूर्ण जगत्में देव-मनुष्यादि सभीको सदा अपने वशमें रखते हैं, वे ही सर्वशक्तिमान् सर्वभुवनसमर्थ परमेश्वर अपने एक ही रूपको अपनी लीलासे बहुत प्रकारका बना लेते हैं। उन परमात्माको जो ज्ञानी महापुरुष निरन्तर अपने अंदर स्थित देखते हैं, उन्हींको सदा स्थिर रहनेवाला—सनातन परमानन्द मिलता है, दूसरोंको नहीं ॥ १२ ॥
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्* ॥ १३ ॥
यः=जो; नित्यानाम्=नित्योंका (भी); नित्यः=नित्य (है); चेतनानाम्=चेतनोंका (भी); चेतनः=चेतन है (और); एकः बहूनाम्=अकेला ही इन अनेक (जीवों) के; कामान्=कर्मफलभोगोंका; विदधाति=विधान करता है; तम् आत्मस्थम्=उस अपने अंदर रहनेवाले (पुरुषोत्तम)-को; ये धीराः=जो ज्ञानी; अनुपश्यन्ति=निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम्=उन्हींको; शाश्वती शान्तिः=सदा अटल रहनेवाली शान्ति (प्राप्त होती है); इतरेषाम् न=दूसरोंको नहीं ॥ १३ ॥
व्याख्या—जो समस्त नित्य चेतन आत्माओंके भी नित्य चेतन आत्मा हैं और जो स्वयं अकेले ही अनन्त जीवोंके भोगोंका उन-उनके कर्मानुसार विधान करते हैं, उन अपने अंदर रहनेवाले सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमको जो ज्ञानी महापुरुष निरन्तर देखते हैं, उन्हींको सदा स्थिर रहनेवाली सनातनी परम शान्ति मिलती है, दूसरोंको नहीं ॥ १३ ॥
* इसका पूर्वार्ध श्वेताश्वतरोपनिषद् ६। १३ में ठीक इसी प्रकार है और उत्तरार्ध ६। १२ से मिलता है।