ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 158, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें| १५६ | ईशादि नौ उपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
सम्बन्ध— जिज्ञासु नचिकेता इस प्रकार उस ब्रह्मप्राप्तिके आनन्द और शान्तिकी महिमा सुनकर मन-ही-मन विचार करने लगा—
तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम्।
कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा॥ १४॥
तत्=वह; अनिर्देश्यम्=अनिर्वचनीय; परमम्=परम; सुखम्=सुख; एतत्=यह (परमात्मा ही है); इति=यों; मन्यन्ते=(ज्ञानीजन) मानते हैं; तत्=उसको; कथम् नु=किस प्रकारसे; विजानीयाम्=मैं भलीभाँति समझूँ; किमु=क्या (वह); भाति=प्रकाशित होता है; वा=या; विभाति=अनुभवमें आता है॥ १४॥
व्याख्या— उस सनातन परम आनन्द और परम शान्तिको प्राप्त ज्ञानी महात्माजन ऐसा मानते हैं कि परब्रह्म पुरुषोत्तम ही वह अलौकिक सर्वोपरि आनन्द है, जिसका निर्देश मन-वाणीसे नहीं किया जा सकता। उस परमानन्दस्वरूप परमेश्वरको मैं अपरोक्षरूपसे किस प्रकार जानूँ? क्या वह प्रत्यक्ष प्रकट होता है या अनुभवमें आता है? उसका ज्ञान किस प्रकारसे होता है?॥ १४॥
सम्बन्ध— नचिकेताके आन्तरिक भावको समझकर यमराजने कहा—
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥ १५॥*
तत्र=वहाँ; न सूर्यः भाति=न (तो) सूर्य प्रकाशित होता है; न चन्द्रतारकम्=न चन्द्रमा और तारोंका समुदाय (ही प्रकाशित होता है); न इमाः विद्युत: भान्ति=(और) न ये बिजलियाँ ही (वहाँ) प्रकाशित होती हैं; अयम् अग्निः कुतः=फिर यह (लौकिक) अग्नि कैसे (प्रकाशित हो सकता है क्योंकि);
* यह मन्त्र ठीक इसी प्रकार मु० उ० २। २। १० और श्वेता० उ० ६। १४ में है।