ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 548 में से
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कठोपनिषद्
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तम्=उसके; भान्तम् एव=प्रकाशित होनेपर ही (उसीके प्रकाशसे); सर्वम्= (ऊपर बतलाये हुए सूर्यादि) सब; अनुभाति=प्रकाशित होते हैं; तस्य भासा=उसीके प्रकाशसे; इदम् सर्वम्=यह सम्पूर्ण जगत्; विभाति=प्रकाशित होता है ॥ १५ ॥
व्याख्या—उस स्वप्रकाश परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य नहीं प्रकाशित होता। जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकट होनेपर खद्योतका प्रकाश लुप्त हो जाता है, वैसे ही सूर्यका तेज भी उस असीम तेजके सामने लुप्त हो जाता है। चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ नहीं चमकते; फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है; क्योंकि प्राकृत जगत्में जो कुछ भी तत्त्व प्रकाशशील हैं, सब उस परब्रह्म परमेश्वरकी प्रकाशशक्तिके अंशको पाकर ही प्रकाशित हैं। वे अपने प्रकाशकके समीप अपना प्रकाश कैसे फैला सकते हैं। सारांश यह कि यह सम्पूर्ण जगत् उस जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे अथवा उस प्रकाशके एक क्षुद्रतम अंशसे प्रकाशित हो रहा है ॥ १५ ॥
द्वितीय वल्ली समाप्त ॥ २ ॥ (५)
तृतीय वल्ली
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्रुस्थः सनातनः ।
तदेव शुक्ं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नार्येति कश्चन ॥
एतद्वै तत् ॥ १ ॥
ऊर्ध्वमूलः=ऊपरकी ओर मूलवाला; अवाक्शाखः=नीचेकी ओर शाखावाला; एषः=यह (प्रत्यक्ष जगत्); सनातनः अश्रुस्थः=सनातन पीपलका वृक्ष है; [ तन्मूलम् ]=इसका मूलभूत; तत् एव शुक्म=वह (परमेश्वर) ही विशुद्ध तत्त्व है;