ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
तत् ब्रह्म=वही ब्रह्म है (और); तत् एव=वही; अमृतम् उच्यते=अमृत कहलाता है; सर्वे लोकाः=सब लोक; तस्मिन्=उसीके; श्रिताः=आश्रित हैं; कश्चन उ=कोई भी; तत्=उसको; न अत्येति=लाँघ नहीं सकता; एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा जिसके विषयमें तुमने पूछा था)* ॥ १ ॥
व्याख्या —जिसका मूलभूत परब्रह्म पुरुषोत्तम ऊपर है अर्थात् सर्वश्रेष्ठ, सबसे सूक्ष्म और सर्वशक्तिमान् है और जिसकी प्रधान शाखा ब्रह्मा तथा अवान्तर शाखाएँ देव, पितर, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि क्रमसे नीचे हैं, ऐसा यह ब्रह्माण्डरूप पीपल-वृक्ष अनादिकालीन—सदासे है। कभी प्रकटरूपसे और कभी अप्रकटरूपसे अपने कारणरूप परब्रह्ममें नित्य स्थित रहता है, अतः सनातन है। इसका जो मूल कारण है, जिससे यह उत्पन्न होता है, जिससे सुरक्षित है और जिसमें विलीन होता है, वही विशुद्ध दिव्य तत्त्व है, वही ब्रह्म है, उसीको अमृत कहते हैं तथा सब लोक उसीके आश्रित हैं। कोई भी उसका अतिक्रमण करनेमें समर्थ नहीं है। नचिकेता! यही है वह तत्त्व, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ १ ॥
यदिदं किं च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम्।
महद्भ्यं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुर्मुतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥
निःसृतम्=(परब्रह्म परमेश्वरसे) निकला हुआ; इदम् यत् किं च=यह जो कुछ भी; सर्वम् जगत्=सम्पूर्ण जगत् है; प्राणे एजति=उस प्राणस्वरूप परमेश्वरमें ही चेष्टा करता है; एतत्=इस; उद्यतम् वज्रम्=उठे हुए वज्रके समान; महत् भयम्=महान् भयस्वरूप (सर्वशक्तिमान्) परमेश्वरको; ये विदुः=जो जानते हैं; ते=वे; अमृताः भवन्ति=अमर हो जाते हैं अर्थात् जन्म-मरणसे छूट जाते हैं ॥ २ ॥
व्याख्या —यह जो कुछ भी इन्द्रिय, मन और बुद्धिके द्वारा देखने, सुनने और समझनेमें आनेवाला सम्पूर्ण चराचर जगत् है, सब अपने परम कारण-
- इस मन्त्रके प्रथम दो पादोंको छोड़कर शेष चारों पाद २।२।८ के ही समान हैं।