ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 548 में से
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कठोपनिषद्
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रूप जिन परब्रह्म पुरुषोत्तमसे प्रकट हुआ है, उन्हीं प्राणस्वरूप परमेश्वरमें चेष्टा करता है। अर्थात् इसकी चेष्टाओंके आधार एवं नियामक भी वे परमेश्वर ही हैं। वे परमेश्वर परम दयालु होते हुए भी महान् भयरूप हैं—छोटे-बड़े सभी उनसे भय मानते हैं। साथ ही वे उठे हुए वज्रके समान हैं। जिस प्रकार हाथमें वज्र लिये हुए प्रभुको देखकर सभी सेवक यथाविधि निरन्तर आज्ञापालनमें तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार समस्त देवता सदा-सर्वदा नियमानुसार इन परमेश्वरके आज्ञापालनमें नियुक्त रहते हैं। इन परब्रह्मको जो जानते हैं, वे तत्त्वज्ञ पुरुष अमर हो जाते हैं—जन्म-मृत्युके चक्रसे छूट जाते हैं ॥ २ ॥
भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्यः ।
भयादिन्द्रश् वायुश् मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥*
अस्य भयात्=इसीके भयसे; अग्निः तपति=अग्नि तपता है; भयात्= (इसीके) भयसे; सूर्यः तपति=सूर्य तपता है; च=तथा; [ अस्य ] भयात्= इसीके भयसे; इन्द्रः वायुः=इन्द्र, वायु; च=और; पञ्चमः मृत्युः=पाँचवें मृत्यु देवता; धावति=(अपने-अपने काममें) प्रवृत्त हो रहे हैं ॥ ३ ॥
व्याख्या —सबपर शासन करनेवाले और सबको नियन्त्रणमें रखकर नियमानुसार चलानेवाले इन परमेश्वरके भयसे ही अग्नि तपता है, इन्हींके भयसे सूर्य तप रहा है, इन्हींके भयसे इन्द्र, वायु और पाँचवें मृत्यु देवता—ये सब दौड़-दौड़कर जल आदि बरसाना, प्राणियोंको जीवन-शक्ति प्रदान करना, जीवोंके शरीरोंका अन्त करना आदि अपना-अपना काम सावधानीपूर्वक कर रहे हैं। सारांश यह कि इस जगत्में देवसमुदायके द्वारा सारे कार्य जो नियमितरूपसे सम्पन्न हो रहे हैं, वे इन सर्वशक्तिमान्, सर्वेश्वर, सबके शासक एवं नियन्ता परमेश्वरके अमोघ शासनसे ही हो रहे हैं ॥ ३ ॥
- इस भावका मन्त्र तै० उ० २।८ के आरम्भमें आया है।