ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
इह चेदशकद् बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्वसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥
चेत्=यदि; शरीरस्य=शरीरका; विस्वसः=पतन होनेसे; प्राक्=पहले-पहले; इह=इस मनुष्यशरीरमें ही (साधक); बोद्धुम्=परमात्माको साक्षात्; अशक्तत्=कर सका (तब तो ठीक है); ततः=नहीं तो फिर; सर्गेषु=अनेक कल्पोंतक; लोकेषु=नाना लोक और योनियोंमें; शरीरत्वाय कल्पते=शरीर धारण करनेको विवश होता है ॥ ४ ॥
व्याख्या—इस सर्वशक्तिमान्, सबके प्रेरक और सबपर शासन करनेवाले परमेश्वरको यदि कोई साधक इस दुर्लभ मनुष्यशरीरका नाश होनेसे पहले ही जान लेता है, अर्थात् जबतक इसमें भजन-स्मरण आदि साधन करनेकी शक्ति बनी हुई है और जबतक यह मृत्युके मुखमें नहीं चला जाता, तभीतक (इसके रहते-रहते ही) सावधानीके साथ प्रयत्न करके परमात्माके तत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब तो उसका जीवन सफल हो जाता है; अनादि कालसे जन्म-मृत्युके प्रवाहमें पड़ा हुआ वह जीव उससे छुटकारा पा जाता है। नहीं तो, फिर उसे अनेक कल्पोंतक विभिन्न लोकों और योनियोंमें शरीर धारण करनेके लिये बाध्य होना पड़ता है। अतएव मनुष्यको मृत्युसे पहले-पहले ही परमात्माको जान लेना चाहिये ॥ ४ ॥
यथाऽऽदर्शं तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥
यथा आदर्शं=जैसे दर्पणमें (सामने आयी हुई वस्तु दीखती है); तथा आत्मनि=वैसे ही शुद्ध अन्तःकरणमें (ब्रह्मके दर्शन होते हैं); यथा स्वप्ने=जैसे स्वप्नमें (वस्तु स्पष्ट दिखलायी देती है); तथा पितृलोके=उसी प्रकार पितृलोकमें (परमेश्वर दीखता है); यथा अप्सु=जैसे जलमें (वस्तुके रूपकी झलक पड़ती है); तथा गन्धर्वलोके=उसी प्रकार गन्धर्वलोकमें; परि ददृशे इव=परमात्माकी झलक-सी पड़ती है (और); ब्रह्मलोके=ब्रह्मलोकमें (तो); छायातपयोः