भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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वल्ली २ ] कठोपनिषद् १५१


निर्मित अन्तःकालीन वासनाके अनुसार मरनेके पश्चात् कितने ही जीवात्मा तो दूसरा शरीर धारण करनेके लिये वीर्यके साथ माताकी योनिमें प्रवेश कर जाते हैं। इनमें जिनके पुण्य-पाप समान होते हैं, वे मनुष्यका और जिनके पुण्य कम तथा पाप अधिक होते हैं, वे पशु-पक्षीका शरीर धारण करके उत्पन्न होते हैं और कितने ही, जिनके पाप अत्यधिक होते हैं, स्थावरभावको प्राप्त होते हैं अर्थात् वृक्ष, लता, तृण, पर्वत आदि जड शरीरमें उत्पन्न होते हैं॥ ७ ॥

**सम्बन्ध—**यमराजने जीवात्माकी गति और परमात्माका स्वरूप—इन दो बातोंको बतलानेकी प्रतिज्ञा की थी; इनमें मरनेके बाद जीवात्माकी क्या गति होती है, इसको बतलाकर अब वे दूसरी बात बतलाते हैं—

य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते॥
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन।
एतद् वै तत्॥ ८॥

**यः एषः=**जो यह; कामम् कामम्=(जीवोंके कर्मानुसार) नाना प्रकारके भोगोंका; **निर्मिमाणः=**निर्माण करनेवाला; **पुरुषः=**परमपुरुष परमेश्वर; सुप्तेषु=(प्रलयकालमें सबके) सो जानेपर भी; **जागर्ति=**जागता रहता है; **तत् एव=**वही; **शुक्रम्=**परम विशुद्ध तत्त्व है; **तत् ब्रह्म=**वही ब्रह्म है; **तत् एव=**वही; **अमृतम्=**अमृत; **उच्यते=**कहलाता है; (तथा) **तस्मिन्=**उसीमें; **सर्वे=**सम्पूर्ण; **लोकाः श्रिताः=**लोक आश्रय पाये हुए हैं; **तत् कश्चन उ=**उसे कोई भी; **न अत्येति=**अतिक्रमण नहीं कर सकता; **एतत् वै=**यही है; **तत्=**वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ८ ॥

**व्याख्या—**जीवात्माओंके कर्मानुसार उनके लिये नाना प्रकारके भोगोंका निर्माण करनेवाला तथा उनकी यथायोग्य व्यवस्था करनेवाला जो यह परमपुरुष परमेश्वर समस्त जीवोंके सो जानेपर अर्थात् प्रलयकालमें सबका ज्ञान लुप्त हो जानेपर भी अपनी महिमामें नित्य जागता रहता है, जो स्वयं ज्ञानस्वरूप है,