ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें| १५० | ईशादि नौ उपनिषद् | [ अध्याय २ |
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है और); न अपानेन=न अपानसे (ही); जीवति=जीता है; तु=किंतु; यस्मिन्=जिसमें; एतौ उपाश्रितौ=(प्राण और अपान) ये दोनों आश्रय पाये हुए हैं; इतरेण=(ऐसे किसी) दूसरेसे ही; जीवन्ति=(सब) जीते हैं; गौतम=हे गौतमवंशीय; गुह्यम् सनातनम्=(वह) रहस्यमय सनातन; ब्रह्म=ब्रह्म (जैसा है); च=और; आत्मा=जीवात्मा; मरणम् प्राप्य=मरकर; यथा=जिस प्रकारसे; भवति=रहता है; इदम् ते=यह बात तुम्हें; हन्त प्रवक्ष्यामि=मैं अब फिरसे बतलाऊँगा ॥ ५-६ ॥
व्याख्या— यमराज कहते हैं—नचिकेता! एक दिन निश्चय ही मृत्युके मुखमें जानेवाले ये मनुष्यादि प्राणी न तो प्राणकी शक्तिसे जीवित रहते हैं और न अपानकी शक्तिसे ही। इन्हें जीवित रखनेवाला तो कोई दूसरा ही चेतन तत्त्व है और वह है जीवात्मा। ये प्राण-अपान दोनों उस जीवात्माके ही आश्रित हैं। जीवात्माके बिना एक क्षण भी ये नहीं रह सकते; जब जीवात्मा जाता है, तब केवल ये ही नहीं, इन्हींके साथ इन्द्रियादि सभी उसका अनुसरण करते हुए चले जाते हैं। (गीता १५। ८, ९) अब मैं तुमको यह बतलाऊँगा कि मनुष्यके मरनेके बाद इस जीवात्माका क्या होता है, यह कहाँ जाता है तथा किस प्रकार रहता है और साथ ही यह भी बतलाऊँगा कि उस परम रहस्यमय सर्वव्यापी सर्वाधार सर्वाधिपति परब्रह्म परमेश्वरका क्या स्वरूप है ॥ ५-६ ॥
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥ ७॥
यथाकर्म=जिसका जैसा कर्म होता है; यथाश्रुतम्=और शास्त्रादिके श्रवणद्वारा जिसको जैसा भाव प्राप्त हुआ है (उन्हींके अनुसार); शरीरत्वाय=शरीर धारण करनेके लिये; अन्ये=कितने ही; देहिनः=जीवात्मा तो; योनिम्=(नाना प्रकारकी जङ्गम) योनियोंको; प्रपद्यन्ते=प्राप्त हो जाते हैं (और); अन्ये=दूसरे (कितने ही); स्थाणुम्=स्थाणु (स्थावर) भावका; अनुसंयन्ति=अनुसरण करते हैं ॥ ७ ॥
व्याख्या— यमराज कहते हैं कि अपने-अपने शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार और शास्त्र, गुरु, सङ्ग, शिक्षा, व्यवसाय आदिके द्वारा देखे-सुने हुए भावोंसे