ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 151, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली २ ] कठोपनिषद् १४१
रहे हैं। इस प्रकार वे शरीरके अंदर होनेवाले सारे व्यापारोंका सुचारूरूपसे सम्पादन कर रहे हैं। उन हृदयस्थित परम भजनीय परब्रह्म पुरुषोत्तमकी सभी देवता उपासना कर रहे हैं—शरीरस्थित प्राण, मन, बुद्धि-इन्द्रियादिके सभी अधिष्ठातृदेवता उन परमेश्वरकी प्रसन्नताके लिये उन्हींकी प्रेरणाके अनुसार नित्य सावधानीके साथ समस्त कार्योंका यथाविधि सम्पादन करते रहते हैं॥ ३॥
अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ ४ ॥
अस्य= इस; शरीरस्थस्य= शरीरमें स्थित; विस्रंसमानस्य= एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवाले; देहिनः= जीवात्माके; देहात्= शरीरसे; विमुच्यमानस्य= निकल जानेपर; अत्र= यहाँ (इस शरीरमें) किम् परिशिष्यते= क्या शेष रहता है; एतत् वै= यही है; तत्= वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ४ ॥
व्याख्या— यह एक शरीरसे दूसरे शरीरमें गमन करनेके स्वभाववाला देही (जीवात्मा) जब इस वर्तमान शरीरसे निकलकर चला जाता है और उसके साथ ही जब इन्द्रिय, प्राण आदि भी चले जाते हैं, तब इस मृत-शरीरमें क्या बच रहता है। देखनेमें तो कुछ भी नहीं रहता; पर वह परब्रह्म परमेश्वर, जो सदा-सर्वदा समानभावसे सर्वत्र परिपूर्ण है, जो चेतन जीव तथा जड प्रकृति—सभीमें सदा व्याप्त है, वह रह जाता है। यही वह ब्रह्म है, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था॥ ४॥
सम्बन्ध— अब निम्नाङ्कित दो मन्त्रोंमें यमराज नचिकेताके पूछे हुए तत्त्वको पुनः दूसरे प्रकारसे वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं—
न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥
हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम्।
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥
कश्चन= कोई भी; मर्त्यः= मरणधर्मा प्राणी; न प्राणेन= न तो प्राणसे (जीता