भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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वल्ली २ ]

कठोपनिषद्

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होकर; विमुच्यते=(मरनेके बाद) विदेहमुक्त हो जाता है; एतत् वै=वही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १ ॥

व्याख्या —वह मनुष्य-शरीररूपी पुर दो आँख, दो कान, दो नासिकाके छिद्र, एक मुख, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और शिश्न—इन ग्यारह द्वारोंवाला है। यह सर्वव्यापी, अविनाशी, अजन्मा, नित्य, निर्विकार, एकरस, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परमेश्वरकी नगरी है। वे सर्वत्र समभावसे सदासे परिपूर्ण रहते हुए भी अपनी राजधानीरूप इस मनुष्य-शरीरके हृदय-प्रासादमें राजाकी भाँति विशेषरूपसे विराजित रहते हैं। इस रहस्यको समझकर मनुष्य-शरीरके रहते हुए ही—जीते-जी जो मनुष्य भजन-स्मरणादि साधन करता है, नगरके महान् स्वामी परमेश्वरका निरन्तर चिन्तन और ध्यान करता है, वह कभी शोक नहीं करता, वह शोकके कारणरूप संसार-बन्धनसे छूटकर जीवनमुक्त हो जाता है और शरीर छूटनेके पश्चात् विदेहमुक्त हो जाता है—परमात्माका साक्षात्कार करके जन्म-मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। यह जो सर्वव्यापक ब्रह्म है, यही वह है, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ १ ॥

सम्बन्ध —अब उस परमेश्वरकी सर्वरूपताका स्मृष्टीकरण करते हैं—

हंसःशुचिषद्वसुन्तरिक्षस-
द्भोतावेदिषदतिथिदुरोणसत् ।
नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा
गोजाऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् * ॥ २ ॥

शुचिषत्=जो विशुद्ध परमधाममें रहनेवाला; हंसः=स्वयं प्रकाश (पुरुषोत्तम) है (वही); अन्तरिक्षसत्=अन्तरिक्षमें निवास करनेवाला; वसुः=वसु है; दुरोणसत्=घरोंमें उपस्थित होनेवाला; अतिथिः=अतिथि है (और); वेदिषत् होता=यज्ञकी वेदीपर स्थापित अग्निस्वरूप तथा उसमें आहुति डालनेवाला 'होता' है (तथा); नृषत्=समस्त मनुष्योंमें रहनेवाला; वरसत्=मनुष्योंसे श्रेष्ठ देवताओंमें रहनेवाला;

  • यह मन्त्र यजुर्वेद १०। २४, १२। १४ और ऋग्वेद ४। ४०। ५ में है।