भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 148

१४६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिकं तादृगेव भवति। एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥

यथा=(परंतु) जिस प्रकार; शुद्धे [ उदके ]=निर्मल जलमें; आसिक्तम्=(मेघोंद्वारा) सब ओरसे बरसाया हुआ; शुद्धम्=निर्मल; उदकम्=जल; तादृक् एव=वैसा ही; भवति=हो जाता है; एवम्=उसी प्रकार; गौतम=हे गौतमवंशी नचिकेता; विजानत:=(एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है, इस प्रकार) जाननेवाले; मुनेः=मुनिका (संसारसे उपरत हुए महापुरुषका); आत्मा=आत्मा; भवति=(ब्रह्मको प्राप्त) हो जाता है ॥ १५ ॥

व्याख्या—परंतु यही वर्षाका निर्मल जल यदि निर्मल जलमें ही बरसता है तो वह उसी क्षण निर्मल जल ही हो जाता है। उसमें न तो कोई विकार उत्पन्न होता है और न वह कहीं बिखरता ही है। इसी प्रकार, हे गौतमवंशीय नचिकेता! जो इस बातको भलीभाँति जान गया है कि जो कुछ है, वह सब परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है, उस मननशील—संसारके बाहरी स्वरूपसे उपरत पुरुषका आत्मा परब्रह्ममें मिलकर उसके साथ तादात्म्यभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥

प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥ (४)

द्वितीय वल्ली

पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । अनुष्टाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ १ ॥

अवक्रचेतसः=सरल, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप; अजस्य=अजन्मा परमेश्वरका; एकादशद्वारम्=ग्यारह द्वारोंवाला (मनुष्य-शरीररूप); पुरम्=पुर (नगर); [अस्ति]=है (इसके रहते हुए ही); अनुष्टाय=(परमेश्वरका ध्यान आदि) साधन करके; न शोचति=(मनुष्य) कभी शोक नहीं करता; च=अपि तु; विमुक्तः=जीवन्युक्त