ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 548 में से
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कठोपनिषद्
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एकरसता नित्य अशुण्ण है। ये कभी न तो घटते-बढ़ते हैं और न कभी मिटते ही हैं। नचिकेता! ये परिवर्तनरहित अविनाशी परमेश्वर ही वे ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्धमें तुमने पूछा था*॥ १३॥
यथोदकं दुर्गं वृष्टं पर्वतेषु विधावति। एवं धर्मान् पृथक् पश्यन्तानेवानुविधावति॥ १४॥
यथा=जिस प्रकार; दुर्गं=ऊँचे शिखरपर; वृष्टम्=बरसा हुआ; उदकम्=जल; पर्वतेषु=पहाड़के नाना स्थलोंमें; विधावति=चारों ओर चला जाता है; एवम्=उसी प्रकार; धर्मान्=भिन्न-भिन्न धर्मों (स्वभावों) से युक्त देव, असुर, मनुष्य आदिकों; पृथक्=परमात्मासे पृथक्, पश्यन्=देखकर (उनका सेवन करनेवाला मनुष्य); तान् एव=उन्हींके; अनुविधावति=पीछे दौड़ता रहता है (उन्हींके शुभाशुभ लोकोंमें और नाना उच्च-नीच योनियोंमें भटकता रहता है)॥ १४॥
व्याख्या—वर्षाका जल एक ही है; पर वह जब ऊँचे पर्वतकी ऊबड़खाबड़ चोटीपर बरसता है तो वहाँ ठहरता नहीं, तुरंत ही नीचेकी ओर बहकर विभिन्न वर्ण, आकार और गन्धको धारण करके पर्वतमें चारों ओर बिखर जाता है। इसी प्रकार एक ही परमात्मासे उत्पन्न हुए विभिन्न स्वभाववाले देव-असुर-मनुष्यादिकों जो परमात्मासे पृथक् मानता है और पृथक् मानकर ही उनकी उपासना, पूजा आदि करता है, उसे भी बिखरे हुए जलकी भाँति ही विभिन्न देव-असुरादिके लोकोंमें एवं नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकना पड़ता है (गीता ९। २३—२५)। वह ब्रह्मको प्राप्त नहीं हो सकता॥ १४॥
- यहाँ 'अङ्गुष्ठमात्र' शब्द परमात्माका वाचक है, जीवका नहीं। प्रातःस्मरणीय आचार्यने स्पष्ट शब्दोंमें कहा है—'परमात्मैवायमङ्गुष्ठमात्रपरिमितः पुरुषो भवितुमर्हति। कस्मात्? शब्दात्—'ईशानो भूतभ्यस्य' इति। न ह्यन्यः परमेश्वराद् भूतभ्यस्य निरङ्गुष्ठीमाशिता।' अर्थात् यहा अङ्गुष्ठमात्र परिमाण पुरुष परमात्मा ही है। कैसे जाना? 'ईशानो' आदि श्रुतिसे। भूत और भव्यका निरङ्गुष्ठ नियन्ता परमेश्वरके सिवा दूसरा नहीं हो सकता (देखिये ब्रह्मसूत्र १। ३। २४) का शाङ्करभाष्य। यह बात उस प्रकरणके मूल सूत्रोंमें भी स्पष्ट है।