ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
वल्ली २ ] कठोपनिषद् १११
सम्बन्ध— यमराजके मुखसे परब्रह्म पुरुषोत्तमकी महिमा सुनकर और अपनेको उसका अधिकारी जानकर नचिकेताके मनमें परमात्मतत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी। साथ ही उसे यमराजके द्वारा अपनी प्रशंसा सुनकर साधु-सम्मत संकोच भी हुआ। इसलिये उसने यमराजसे बीचमें ही पूछा—
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद॥ १४॥
यत् तत्= जिस उस परमेश्वरको; धर्मात् अन्यत्र= धर्मसे अतीत; अधर्मात् अन्यत्र= अधर्मसे भी अतीत; च= तथा; अस्मात् कृताकृतात्= इस कार्य और कारणरूप सम्पूर्ण जगत्से भी; अन्यत्र= भिन्न; च= और; भूतात् भव्यात्= भूत, वर्तमान एवं भविष्यत्—तीनों कालोंसे तथा इनसे सम्बन्धित पदार्थोंसे भी; अन्यत्र= पृथक्; पश्यसि= (आप) जानते हैं; तत्= उसे; वद= बतलाइये॥ १४॥
व्याख्या— नचिकेता कहता है—भगवन्! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो धर्म और अधर्मके सम्बन्धसे रहित, कार्य-कारणरूप प्रकृतिसे पृथक् एवं भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन सबसे भिन्न जिस परमात्मतत्त्वको आप जानते हैं, उसे मुझको बतलाइये* ॥१४॥
सम्बन्ध— नचिकेताके इस प्रकार पूछनेपर यमराज उस ब्रह्मतत्त्वके वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं—
सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति
तपाꣳसि सर्वाणि च यद् वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥ १५॥
सर्वे वेदाः= सम्पूर्ण वेद; यत् पदम्= जिस परम पदका; आमनन्ति= बारम्बार
* भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने इस प्रकरणको भी अपने ब्रह्मसूत्रभाष्यमें परमेश्वरविषयक ही माना है (‘पृष्टं चेह ब्रह्म’—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा० ३ के २४ वें सूत्रका भाष्य)।
११२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
प्रतिपादन करते हैं; च=और; सर्वाणि तपांसि=सम्पूर्ण तप; यत्=जिस पदका; वदन्ति=लक्ष्य कराते हैं अर्थात् वे जिसके साधन हैं; यत् इच्छन्तः=जिसको चाहनेवाले साधकगण; ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्यका; चरन्ति=पालन करते हैं; तत् पदम्=वह पद; ते=तुम्हें; (मैं) संग्रहेण=संक्षेपसे; ब्रवीमि=बतलाता हूँ; (वह है) ओम्=ओम्; इति=ऐसा; एतत्=यह (एक अक्षर) ॥ १५ ॥
व्याख्या —यमराज यहाँ परब्रह्म पुरुषोत्तमको परमप्राप्य बतलाकर उसके वाचक अँकारको प्रतीकरूपसे उसका स्वरूप बतलाते हैं। वे कहते हैं कि समस्त वेद नाना प्रकार और नाना छन्दोंसे जिसका प्रतिपादन करते हैं, सम्पूर्ण तप आदि साधनोंका जो एकमात्र परम और चरम लक्ष्य है तथा जिसको प्राप्त करनेकी इच्छासे साधक निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्यका अनुष्ठान किया करते हैं, उस पुरुषोत्तमभगवान्का परमतत्त्व मैं तुम्हें संक्षेपमें बतलाता हूँ। वह है 'अँ' यह एक अक्षर ॥ १५ ॥
सम्बन्ध —नामरहित होनेपर भी परमात्मा अनेक नामोंसे पुकारे जाते हैं। उनके सब नामोंमें 'अँ' सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अतः यहाँ नाम और नामीका अभेद मानकर 'प्रणव' को परब्रह्म पुरुषोत्तमके स्थानमें वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं—
एतद्भ्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्भ्येवाक्षरं परम्।
एतद्भ्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥
एतत्=यह; अक्षरम् एव हि=अक्षर ही तो; ब्रह्म=ब्रह्म है (और); एतत्=यह; अक्षरम् एव हि=अक्षर ही; परम्=परब्रह्म है; हि=इसलिये; एतत् एव=इसी; अक्षरम्=अक्षरको; ज्ञात्वा=जानकर; यः=जो; यत्=जिसको; इच्छति=चाहता है; तस्य=उसको; तत्=वही (मिल जाता है) ॥ १६ ॥
व्याख्या —यह अविनाशी प्रणव—अँकार ही तो ब्रह्म (परमात्माका स्वरूप) है और यही परब्रह्म परमपुरुष पुरुषोत्तम है अर्थात् उस ब्रह्म और परब्रह्म दोनोंका ही नाम अँकार है; अतः इस तत्त्वको समझकर साधक इसके द्वारा दोनोंमेंसे किसी भी अभीष्ट रूपको प्राप्त कर सकता है ॥ १६ ॥
बल्ली २ ]
कठोपनिषद्
११३
एतदालम्बनः श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्। एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥
एतत्=यही; श्रेष्ठम्=अत्युत्तम; आलम्बनम्=आलम्बन है; एतत्=यही (सबका); परम् आलम्बनम्=अन्तिम आश्रय है; एतत्=इस; आलम्बनम्=आलम्बनको; ज्ञात्वा=भलीभाँति जानकर (साधक); ब्रह्मलोके=ब्रह्मलोकमें; महीयते=महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥
व्याख्या —यह ॐकार ही परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये सब प्रकारके आलम्बनोंमेंसे सबसे श्रेष्ठ आलम्बन है और यही चरम आलम्बन है। इससे परे और कोई आलम्बन नहीं है अर्थात् परमात्माके श्रेष्ठ नामकी शरण हो जाना ही उनकी प्राप्तिका सर्वोत्तम एवं अमोघ साधन है। इस रहस्यको समझकर जो साधक श्रद्धा और प्रेमपूर्वक इसपर निर्भर करता है, वह निस्संदेह परमात्माकी प्राप्तिका परम गौरव लाभ करता है ॥ १७ ॥
सम्बन्ध —इस प्रकार ॐकारको ब्रह्म और परब्रह्म—इन दोनोंका प्रतीक बताकर अब नचिकेताके प्रश्नानुसार यमराज पहले आत्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं—
न जायते म्रियते वा विपश्चि- न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥
विपश्चित्=नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा; न जायते=न तो जन्मता है; वा न म्रियते=और न मरता ही है; अयम् न=यह न तो स्वयं; कुतश्चित्=किसीसे हुआ है; [न=न] (इससे); कश्चित्=कोई भी; बभूव=हुआ है अर्थात् यह न तो किसीका कार्य है और न कारण ही है; अयम्=यह; अजः=अजन्मा; नित्यः=नित्य; शाश्वतः=सदा एकरस रहनेवाला (और); पुराणः=पुरातन है अर्थात्
११४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
क्षय और वृद्धिसे रहित है; शरीरे हन्यमाने=शरीरके नाश किये जानेपर भी (इसका); न हन्यते=नाश नहीं किया जा सकता*॥ १८॥
हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँ हतश्चेन्मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायँ हन्ति न हन्यते॥ १९॥
चेत्=यदि कोई; हन्ता=मारनेवाला व्यक्ति; हन्तुम्=अपनेको मारनेमें समर्थ; मन्यते=मानता है (और); चेत्=यदि; हतः=(कोई) मारा जानेवाला व्यक्ति; हतम्=अपनेको मारा गया; मन्यते=समझता है (तो); तौ उभौ=वे दोनों ही; न विजानीतः=(आत्मस्वरूपको) नहीं जानते (क्योंकि); अयम्=यह आत्मा; न हन्ति=न तो (किसीको) मारता है (और); न हन्यते=न मारा ही जाता है†॥१९॥
व्याख्या—यमराज यहाँ आत्माके शुद्ध स्वरूपका और उसकी नित्यताका निरूपण करते हैं; क्योंकि जबतक साधकको अपनी नित्यता और निर्विकारताका अनुभव नहीं हो जाता एवं वह जबतक अपनेको शरीर आदि अनित्य वस्तुओंसे भिन्न नहीं समझ लेता, तबतक इन अनित्य पदार्थोंसे वैराग्य होकर उसके अन्तःकरणमें नित्य तत्त्वकी अभिलाषा उत्पन्न नहीं होती। उसको यह दृढ़ अनुभूति होनी चाहिये कि जीवात्मा नित्य चेतन ज्ञानस्वरूप है; अनित्य, विनाशी
* गीतामें इस मन्त्रके भावको इस प्रकार समझाया गया है—
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
(२।२०)
‘यह आत्मा किसी भी कालमें न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।’
† गीतामें इस मन्त्रके भावको और भी स्पष्टरूपसे व्यक्त किया गया है—
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥
(२।१९)
‘जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मारा गया मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा वास्तवमें न तो किसीको मारता है न किसीके द्वारा मारा जाता है।’
वल्ली २ ] कठोपनिषद् ११५
जड शरीर और भोगोंसे वास्तवमें इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह अनादि और अनन्त है; न तो इसका कोई कारण है और न कार्य ही; अतः यह जन्म-मरणसे सर्वथा रहित, सदा एकरस, सर्वथा निर्विकार है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता। जो लोग इसको मारनेवाला या मरनेवाला मानते हैं, वे वस्तुतः आत्मस्वरूपको जानते ही नहीं, वे सर्वथा भ्रान्त हैं। उनकी बातोंपर ध्यान नहीं देना चाहिये। वस्तुतः आत्मा न तो किसीको मारता है और न इसे कोई मार ही सकता है।
साधकको शरीर और भोगोंकी अनित्यता और अपने आत्माकी नित्यतापर विचार करके, इन अनित्य भोगोंसे सुखकी आशाका त्याग करके सदा अपने साथ रहनेवाले नित्य सुखस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका अभिलाषी बनना चाहिये॥ १८-१९॥
सम्बन्ध— इस प्रकार आत्मतत्त्वके वर्णनद्वारा नचिकेताके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके यमराज अब परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं—
अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २०॥*
अस्य = इस; जन्तोः = जीवात्माके; गुहायाम् = हृदयरूप गुफामें; निहितः = रहनेवाला; आत्मा = परमात्मा; अणोः अणीयान् = सूक्ष्मसे अतिसूक्ष्म (और); महतः महीयान् = महान्से भी महान् है; आत्मनः तम् महिमानम् = परमात्माकी उस महिमाको; अक्रतुः = कामनारहित (और); वीतशोकः = चिन्तारहित (कोई विरला साधक); धातुप्रसादात् = सर्वाधार परब्रह्म परमेश्वरकी कृपासे ही; पश्यति = देख पाता है॥ २०॥
व्याख्या— इससे पहले जीवात्माके शुद्ध स्वरूपका वर्णन किया गया
* यह मन्त्र श्वेता० उ० (३। २०) में भी है।
११६ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
है, उसीको इस मन्त्रमें ‘जन्तु’ नाम देकर उसकी बद्धावस्था व्यक्त की गयी है। भाव यह कि यद्यपि परब्रह्म पुरुषोत्तम उस जीवात्माके अत्यन्त समीप जहाँ यह स्वयं रहता है, वहीं हृदयमें छिपे हुए हैं तो भी यह उनकी ओर नहीं देखता। मोहवश भोगोंमें भूला रहता है। इसी कारण यह ‘जन्तु’ है— मनुष्य-शरीर पाकर भी कीट-पतङ्ग आदि तुच्छ प्राणियोंकी भाँति अपना दुर्लभ जीवन व्यर्थ नष्ट कर रहा है। जो साधक पूर्वोक्त विवेचनके अनुसार अपने- आपको नित्य चेतनस्वरूप समझकर सब प्रकारके भोगोंकी कामनासे रहित और शोकरहित हो जाता है, वह परमात्माकी कृपासे यह अनुभव करता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम अणुसे भी अणु और महान्से भी महान्—सर्वव्यापी हैं और इस प्रकार उनकी महिमाको समझकर उनका साक्षात्कार कर लेता है। (यहाँ ‘धातुप्रसादात्’ का अर्थ ‘परमेश्वरकी कृपा’ किया गया है। ‘धातु’ शब्दका अर्थ सर्वाधार परमात्मा माना गया है। विष्णुसहस्रनाममें भी ‘अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः’—‘धातु’ को भगवान्का एक नाम माना गया है) ॥२०॥
आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः। कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥
आसीनः=(वह परमेश्वर) बैठा हुआ ही; **दूरम् व्रजति=**दूर पहुँच जाता है; **शयानः=**सोता हुआ (भी); **सर्वतः याति=**सब ओर चलता रहता है; तम् **मदामदम् देवम्=**उस ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त न होनेवाले देवको; **मदन्यः कः=**मुझसे भिन्न दूसरा कौन; **ज्ञातुम्=**जाननेमें; **अर्हति=**समर्थ है॥२१॥
**व्याख्या—**परब्रह्म परमात्मा अचिन्त्यशक्ति हैं और विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं। एक ही समयमें उनमें विरुद्ध धर्मोंकी लीला होती है। इसीसे वे एक ही साथ सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और महान्-से-महान् बताये गये हैं। यहाँ यह कहते हैं कि वे परमेश्वर अपने नित्य परमधाममें विराजमान रहते हुए ही भक्ताधीनतावश उनकी पुकार सुनते ही दूर-से-दूर चले जाते हैं। परमधाममें निवास करनेवाले पार्षद भक्तोंकी दृष्टिमें वहाँ शयन करते हुए ही वे सब
वल्ली २ ] कठोपनिषद् ११७
ओर चलते रहते हैं। अथवा वे परमात्मा सदा-सर्वदा सर्वत्र स्थित हैं। उनकी सर्वव्यापकता ऐसी है कि बैठे भी वही हैं, दूर देशमें चलते भी वही हैं, सोते भी वही हैं और सब ओर जाते-आते भी वही हैं। वे सर्वत्र सब रूपोंमें नित्य अपनी महिमामें स्थित हैं। इस प्रकार अलौकिक परमैश्वर्यस्वरूप होनेपर भी उन्हें अपने ऐश्वर्यका तनिक भी अभिमान नहीं है। उन परमदेवको जाननेका अधिकारी उनका कृपापात्र मेरे (आत्मतत्त्वज्ञ यमराजके सदृश अधिकारियोंके) सिवा दूसरा कौन हो सकता है॥ २१॥
सम्बन्ध— अब इस प्रकार उन परमेश्वरकी महिमाको समझानेवाले पुरुषकी पहचान बताते हैं—
अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्। महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥ २२॥
अनवस्थेषु=(जो) स्थिर न रहनेवाले (विनाशशील); शरीरेषु=शरीरोंमें; अशरीरम्=शरीररहित (एवं); अवस्थितम्=अविचलभावसे स्थित है; महान्तम्= (उस) महान्; विभुम्=सर्वव्यापी; आत्मानम्=परमात्माको; मत्वा=जानकर; धीरः=बुद्धिमान् महापुरुष; न शोचति=(कभी किसी भी कारणसे) शोक नहीं करता॥ २२॥
व्याख्या— प्राणियोंके शरीर अनित्य और विनाशशील हैं, इनमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। इन सबमें समभावसे स्थित परब्रह्म पुरुषोत्तम इन शरीरोंसे सर्वथा रहित, अशरीरी है। इसी कारण वे नित्य और अचल हैं। प्राकृत देश-काल-गुणादिसे अपरिच्छिन्न उन महान्, सर्वव्यापी, सबके आत्मरूप परमेश्वरको जान लेनेके बाद वह ज्ञानी महापुरुष कभी किसी भी कारणसे किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं करता। यही उसकी पहचान है॥ २२॥
सम्बन्ध— अब यह बतलाते हैं कि वे परमात्मा अपने पुरुषार्थसे नहीं मिलते, वरं उसीको मिलते हैं, जिसको वे स्वीकार कर लेते हैं—
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
११८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥ २३॥*
अयम् आत्मा = यह परब्रह्म परमात्मा; न = न तो; प्रवचनेन = प्रवचनसे; न मेधया = न बुद्धिसे (और); न बहुना श्रुतेन = न बहुत सुननेसे ही; लभ्यः = प्राप्त हो सकता है; यम् = जिसको; एषः = यह; वृणुते = स्वीकार कर लेता है; तेन एव लभ्यः = उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि); एषः आत्मा = यह परमात्मा; तस्य = उसके लिये; स्वाम् तनूम् = अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते = प्रकट कर देता है॥ २३॥
**व्याख्या—**जिन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन मैं कर रहा हूँ, वे न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ़-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्मतत्त्वका नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं, न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं, जो बुद्धिके अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं और न उनको ही मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनते रहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वयं स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है। जो उनके बिना रह नहीं सकता। जो अपनी बुद्धि या साधनापर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमायाका परदा हटाकर उसके सामने अपना स्वरूप प्रकट कर देते हैं॥ २३॥
**सम्बन्ध—**अब यह बतलाते हैं कि परमात्मा किसको प्राप्त नहीं होते—
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥ २४॥
प्रज्ञानेन = सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा; अपि = भी; एनम् = इस परमात्माको; न दुश्चरितात् अविरतः आप्नुयात् = न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो बुरे
* यह मन्त्र मुण्डकोपनिषद् (३।२।३) में भी इसी प्रकार है।
वल्ली २ ] कठोपनिषद् १११
आचरणोंसे निवृत्त नहीं हुआ है; **न अशान्तः=**न वह प्राप्त कर सकता है, जो अशान्त है; **न असमाहितः=**न वह कि जिसके मन, इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं; **वा=**और; **न अशान्तमानसः [ आप्नुयात् ]=**न वही प्राप्त करता है, जिसका मन शान्त नहीं है॥ २४॥
**व्याख्या—**जो मनुष्य बुरे आचरणोंसे विरक्त होकर उनका त्याग नहीं कर देता, जिसका मन परमात्माको छोड़कर दिन-रात सांसारिक भोगोंमें भटकता रहता है, परमात्मापर विश्वास न होनेके कारण जो सदा अशान्त रहता है, जिसका मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ वशमें की हुई नहीं हैं, ऐसा मनुष्य सूक्ष्म बुद्धिद्वारा आत्मविचार करते रहनेपर भी परमात्माको नहीं पा सकता, क्योंकि वह परमात्माकी असीम कृपाका आदर नहीं करता, उसकी अवहेलना करता रहता है; अतः वह उनकी कृपाका अधिकारी नहीं होता॥ २४॥
**सम्बन्ध—**उस परब्रह्म परमेश्वरके तत्त्वको सुनकर और बुद्धिद्वारा विचार करके भी मनुष्य उसे क्यों नहीं जान सकता? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः॥ २५॥
यस्य=(संहारकालमें) जिस परमेश्वरके; **ब्रह्म च क्षत्रम् च उभे=**ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण प्राणिमात्र; **ओदनः=**भोजन; **भवतः=**बन जाते हैं (तथा); **मृत्युः यस्य=**सबका संहार करनेवाली मृत्यु (भी) जिसका; **उपसेचनम्=**उपसेचन (भोज्य वस्तुके साथ लगाकर खानेका व्यञ्जन, तरकारी आदि); **[ भवति ]=**बन जाता है; **सः यत्र=**वह परमेश्वर जहाँ (और); **इत्था=**जैसा है, यह ठीक-ठीक; **कः वेद=**कौन जानता है॥ २५॥
**व्याख्या—**मनुष्य-शरीरमें भी धर्मशील ब्राह्मण और धर्मरक्षक क्षत्रियका शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये अधिक उत्तम माना गया है; किंतु वे भी उन कालस्वरूप परमेश्वरके भोजन बन जाते हैं, फिर अन्य साधारण मनुष्य-शरीरोंकी तो बात ही क्या है। जो सबको मारनेवाले मृत्युदेव हैं, वे भी
१२०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
उन परमेश्वरके उपसेचन अर्थात् भोजनके साथ लगाकर खाये जानेवाले व्यञ्जन—चटनी—तरकारी आदिकी भाँति हैं। ऐसे ब्राह्मण-क्षत्रियादि समस्त प्राणियोंके और स्वयं मृत्युके संहारक अथवा आश्रयदाता परमेश्वरको भला, कोई भी मनुष्य इन अनित्य मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अन्य ज्ञेय वस्तुओंकी भाँति कैसे जान सकता है। किसकी सामर्थ्य है, जो सबके जाननेवालेको जान ले। अतः (पूर्वीक २३ वें मन्त्रके अनुसार) जिसको परमात्मा अपनी कृपाका पात्र बनाकर अपना तत्त्व समझाना चाहते हैं, वही उनको जान सकता है। अपनी शक्तिसे उन्हें कोई भी यथार्थ रूपमें नहीं जान सकता; क्योंकि वे लौकिक ज्ञेय वस्तुओंकी भाँति बुद्धिके द्वारा जाननेमें आनेवाले नहीं हैं ॥ २५ ॥
॥ द्वितीय वल्ली समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय वल्ली
सम्बन्ध —द्वितीय वल्लीमें जीवात्मा और परमात्माके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया और उनको जानकर परब्रह्मको प्राप्त कर लेनेका फल भी बतलाया गया। संक्षेपमें यह बात भी कही गयी कि जिसको वे परमात्मा स्वीकार करते हैं, वही उन्हें जान सकता है, परंतु परमात्माको प्राप्त करनेके साधनोंका वहाँ स्पष्टरूपसे वर्णन नहीं हुआ; अतः साधनोंका वर्णन करनेके लिये तृतीय वल्लीका आरम्भ करते हुए यमराज पहले मन्त्रमें जीवात्मा और परमात्माका नित्य सम्बन्ध और निवास-स्थान बतलाते हैं—
| ऋतं | पिबन्तौ | सुकृतस्य | लोकं |
|---|---|---|---|
| गुहां | प्रविष्टौ | परमे परार्धे। | |
| छायातपौ | ब्रह्मविदो | वदन्ति | |
| पञ्चाग्रयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥ |
वल्ल्बी ३ ]
कठोपनिषद्
१२१
सुकृतस्य लोके=शुभ कर्मोंके फलस्वरूप मनुष्य-शरीरमें; परमे परार्धे=परब्रह्मके उत्तम निवास-स्थान (हृदय-आकाश)-में; गुह्यम् प्रविष्टौ=बुद्धिरूप गुफामें छिपे हुए; ऋतम् पिबन्तौ=सत्यका पान करनेवाले (दो हैं); छायातपो=(वे) छाया और धूपकी भाँति परस्पर भिन्न हैं; (यह बात) ब्रह्मविदः=ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महापुरुष; वदन्ति=कहते हैं; च ये=तथा जो; त्रिणाचिकेताः=तीन बार नाचिकेत-अग्निका चयन कर लेनेवाले; (और) पञ्चाग्रयः=पञ्चाग्निसम्पन्न गृहस्थ हैं; [ ते वदन्ति ]=वे भी यही बात कहते हैं॥१॥
व्याख्या —यमराजने यहाँ जीवात्मा और परमात्माके नित्य सम्बन्धका परिचय देते हुए कहा कि ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महानुभाव तथा यज्ञादि शुभकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले आस्तिक सज्जन—सभी एक स्वरसे यही कहते हैं कि यह मनुष्य-शरीर बहुत ही दुर्लभ है। पूर्वजन्माजित अनेकों पुण्यकर्मोंको निमित्त बनाकर परम कृपालु परमात्मा कृपापरवश हो जीवको उसके कल्याण-सम्पादनके लिये यह श्रेष्ठ शरीर प्रदान करते हैं और फिर उस जीवात्माके साथ ही स्वयं भी उसीके हृदयके अन्तस्तलमें—परब्रह्मके निवासस्वरूप श्रेष्ठ स्थानमें अन्तर्धामीरूपसे प्रविष्ट हो रहते हैं (छा० ३० ६। ३। २) इतना ही नहीं, वे दोनों साथ-ही-साथ वहाँ सत्यका पान करते हैं—शुभकर्मोंके अवश्यम्भावी सत्फलका भोग करते हैं (गीता ५। २९)। अवश्य ही दोनोंके भोगमें बड़ा अन्तर है। (परमात्मा असङ्ग और अभोक्ता हैं) उनका प्रत्येक प्राणीके हृदयमें निवास करके उसके शुभकर्मोंके फलका उपभोग करना उनकी वैसी ही लीला है, जैसी अजन्मा होकर जन्म ग्रहण करना। इसलिये यह कहा जाता है कि वे भोगते हुए भी वस्तुतः नहीं भोगते। अथवा यह भी कहा जा सकता है कि परमात्मा सत्यको पिलाते हैं—शुभ-कर्मका फल भुगताते हैं और जीवात्मा पीता है—फल भोगता है। परंतु जीवात्मा फलभोगके समय असङ्ग नहीं रहता। वह अभिमानवश उसमें सुखका उपभोग करता है। इस प्रकार साथ रहनेपर भी जीवात्मा और परमात्मा दोनों छाया और धूपकी
१२२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
भाँति परस्पर भिन्न हैं। जीवात्मा छायाकी भाँति अल्प प्रकाश—अल्पज्ञ है और परमात्मा धूपकी भाँति पूर्णप्रकाश—सर्वज्ञ! परंतु जीवात्मामें जो कुछ अल्पज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है, जैसे छायामें अल्प-प्रकाश पूर्णप्रकाशरूप धूपका ही होता है।*
इस रहस्यको समझकर मनुष्यको अपनेमें किसी प्रकारकी भी शक्ति-सामर्थ्यका अभिमान नहीं करना चाहिये और अन्तर्धामीरूपसे सदा-सर्वदा अपने हृदयमें रहनेवाले परम आत्मीय परम कृपालु परमात्माका नित्य-निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिये ॥ १ ॥
सम्बन्ध— परमात्माको जानने और प्राप्त करनेका जो सर्वोत्तम साधन 'उन्हें जानने और पानेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये उन्हींसे प्रार्थना करना है' इस बातको यमराज स्वयं प्रार्थना करते हुए बतलाते हैं—
यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम्। अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतः शकेमहि ॥ २ ॥
ईजानानाम्=यज्ञ करनेवालोंके लिये; यः सेतुः=जो दुःखसमुद्रसे पार पहुँचा देनेयोग्य सेतु है; [तम्] नाचिकेतम्=उस नाचिकेत-अग्रिको (और); पारम् तितीर्षताम्=संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये; यत् अभयम्=जो भयरहित पद है; [तत्] अक्षरम्=उस अविनाशी; परम् ब्रह्म=परब्रह्म पुरुषोत्तमको; शकेमहि=जानने और प्राप्त करनेमें भी हम समर्थ हों ॥ २ ॥
व्याख्या— यमराज कहते हैं कि हे परमात्मन्! आप हमें वह सामर्थ्य दीजिये, जिससे हम निष्कामभावसे यज्ञादि शुभकर्म करनेकी विधिको भलीभाँति जान सकें और आपके आज्ञापालनार्थ उनका अनुष्ठान करके आपकी प्रसन्नता प्राप्त कर सकें तथा जो संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावाले विरक्त पुरुषोंके
- इस मन्त्रमें 'जीवात्मा' और 'परमात्मा'को ही गुहामें प्रविष्ट बतलाया गया है, 'बुद्धि' और 'जीव' को नहीं। 'गुहाहितत्वं तु परमात्मन एव दृश्यते' (देखिये—ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पाद २ सू० ११ का शाङ्करभाष्य)।
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कठोपनिषद्
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लिये निर्भय पद है, उस परम अविनाशी आप परब्रह्म पुरुषोत्तमभगवान्को भी जानने और प्राप्त करनेके योग्य बन जायँ।
इस मन्त्रमें यमराजने परमात्मासे उन्हें जाननेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये प्रार्थना करके यह भाव दिखलाया है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमको जानने और प्राप्त करनेका सबसे उत्तम और सरल साधन उनसे प्रार्थना करना ही है॥२॥
सम्बन्ध— अब, उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके परमधाममें किन साधनोंसे सम्पन्न मनुष्य पहुँच सकता है, यह बात रथ और रथीके रूपककी कल्पना करके समझायी जाती है—
आत्मानः रथिनं विद्धि शरीरः रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥३॥
आत्मानम्=(हे नचिकेता! तुम) जीवात्माको तो; रथिनम्=रथका स्वामी (उसमें बैठकर चलनेवाला); विद्धि=समझो; तु=और; शरीरम् एव=शरीरको ही; रथम्=रथ (समझो); तु बुद्धिम्=तथा बुद्धिको; सारथिम्=सारथि (रथको चलानेवाला); विद्धि=समझो; च मनः एव=और मनको ही; प्रग्रहम्=लगाम (समझो) ॥३॥
इन्द्रियाणि हयानाहूर्विषयाः स्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहूर्मनीषिणः॥४॥
मनीषिणः=ज्ञानीजन (इस रूपकमें); इन्द्रियाणि=इन्द्रियोंको; हयान्=घोड़े; आहुः=बतलाते हैं (और); विषयान्=विषयोंको; तेषु गोचरान्=उन घोड़ोंके विचरनेका मार्ग (बतलाते हैं); आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्=(तथा) शरीर, इन्द्रिय और मन—इन सबके साथ रहनेवाला जीवात्मा ही; भोक्ता=भोक्ता है; इति आहुः=यों कहते हैं॥४॥
व्याख्या— जीवात्मा परमात्मासे बिछुड़ा हुआ है, अनन्त कालसे वह अनवरत संसाररूपी बीहड़ वनमें इधर-उधर सुखकी खोजमें भटक रहा है। सुख समझकर जहाँ भी जाता है, वहाँ धोखा खाता है। सर्वथा साधनहीन और दयनीय है। जबतक वह परम सुखस्वरूप परमात्माके समीप नहीं पहुँच जाता, तबतक
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
उसे सुख-शान्ति कभी नहीं मिल सकती। उसकी इस दयनीय दशाको देखकर दयामय परमात्माने उसे मानव-शरीररूपी सुन्दर सर्वसाधनसम्पन्न रथ दिया। इन्द्रियरूप बलवान् घोड़े दिये। उनके मनरूपी लगाम लगाकर उसे बुद्धिरूपी सारथिके हाथोंमें सौंप दिया और जीवात्माको उस रथमें बैठाकर—उसका स्वामी बनाकर यह बतला दिया कि वह निरन्तर बुद्धिकी प्रेरणा करता रहे और परमात्माकी ओर ले जानेवाले भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाम आदिके श्रवण, कीर्तन, मननादि विषयरूप प्रशस्त और सहज मार्गपर चलकर शीघ्र परमात्माके धाममें पहुँच जाय।
जीवात्मा यदि ऐसा करता तो वह शीघ्र ही परमात्मातक पहुँच जाता; परंतु वह अपने परमानन्दमय भगवत्प्रासरूप इस महान् लक्ष्यको मोहवश भूल गया। उसने बुद्धिकी प्रेरणा देना बंद कर दिया, जिससे बुद्धिरूपी सारथि असावधान हो गया, उसने मनरूपी लगामको इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़ोंकी इच्छापर छोड़ दिया। परिणाम यह हुआ कि जीवात्मा विषयप्रवण इन्द्रियोंके अधीन होकर सतत संसारचक्रमें डालनेवाले लौकिक शब्द-स्पर्शादि विषयोंमें भटकने लगा। अर्थात् वह जिन शरीर, इन्द्रिय, मनके सहयोगसे भगवान्को प्राप्त कर सकता, उन्हींके साथ युक्त होकर वह विषय-विषके उपभोगमें लग गया ॥ ३-४ ॥
सम्बन्ध —परमात्माकी ओर न जाकर उसकी इन्द्रियाँ लौकिक विषयोंमें क्यों लग गयीं, इसका कारण बतलाते हैं—
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्चा इव सारथेः ॥ ५ ॥
यः सदा=जो सदा; अविज्ञानवान्=विवेकहीन बुद्धिवाला; तु=और; अयुक्तेन=अवशीभूत (चञ्चल); मनसा=मनसे (युक्त); भवति=रहता है; तस्य=उसकी; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; सारथेः=असावधान सारथिके; दुष्टाश्चाः इव=दुष्ट घोड़ोंकी भाँति; अवश्यानि=वशमें न रहनेवाली; [ भवन्ति ]=हो जाती हैं ॥ ५ ॥
व्याख्या —रथको घोड़े ही चलाते हैं, परंतु उन घोड़ोंको चाहे जिस ओर, चाहे जिस मार्गपर ले जाना—लगाम हाथमें थामे हुए बुद्धिमान् सारथिका काम
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कठोपनिषद्
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है। इन्द्रियरूपी बलवान् और दुर्धर्ष घोड़े स्वाभाविक ही आपातरमणीय विषयोंसे भरे संसाररूप हरी-हरी घासके जंगलकी ओर मनमाना दौड़ना चाहते हैं; परंतु यदि बुद्धिरूप सारथि मनरूपी लगामको जोरसे खींचकर उन्हें अपने वशमें कर लेता है तो फिर घोड़े मनरूपी लगामके सहारे बिना चाहे जिस ओर नहीं जा सकते। यह सभी जानते हैं कि इन्द्रियाँ विषयोंका ग्रहण तभी कर सकती हैं, जब मन उनके साथ होता है। घोड़े उसी ओर दौड़ते हैं, जिस ओर लगामका सहारा होता है; पर इस लगामको ठीक रखना सारथिकी बलबुद्धिपर निर्भर करता है। यदि बुद्धिरूपी सारथि विवेकयुक्त स्वामीका आज्ञाकारी, लक्ष्यपर सदा स्थिर, बलवान्, मार्गके ज्ञानसे सम्पन्न और इन्द्रियरूपी घोड़ोंको चलानेमें दक्ष नहीं होता तो इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़े उसके वशमें न रहकर लगामके सहारे सम्पूर्ण रथको ही अपने वशमें कर लेते हैं और फलस्वरूप रथी और सारथिसमेत उस रथको लिये हुए गहरे गड्ढेमें जा पड़ते हैं। बुद्धिके नियन्त्रणसे रहित इन्द्रियाँ उत्तरोत्तर उसी प्रकार उच्छृङ्खल होती चली जाती हैं जैसे असावधान सारथिके दुष्ट घोड़े॥५॥
सम्बन्ध —अब स्वयं सावधान रहकर अपनी बुद्धिको विवेकशील बनानेका लाभ बतलाते हैं—
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्चा इव सारथेः॥६॥
तु यः सदा=परंतु जो सदा; विज्ञानवान्=विवेकयुक्त बुद्धिवाला (और); युक्तेन=वशमें किये हुए; मनसा=मनसे सम्पन्न; भवति=रहता है; तस्य=उसकी; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; सारथेः=सावधान सारथिके; सदश्चाः इव=अच्छे घोड़ोंकी भाँति; वश्यानि=वशमें; [ भवन्ति ]=रहती हैं॥६॥
व्याख्या —जो जीवात्मा अपनी बुद्धिको विवेकसम्पन्न बना लेता है—जिसकी बुद्धि अपने लक्ष्यकी ओर ध्यान रखती हुई नित्य-निरन्तर निपुणताके साथ इन्द्रियोंको सन्मार्गपर चलानेके लिये मनको बाध्य किये रहती है, उसका
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
मन भी लक्ष्यकी ओर लगा रहता है एवं उसकी इन्द्रियाँ निश्श्यात्मिका बुद्धिके अधीन रहकर भगवत्सम्बन्धी पवित्र विषयोंके सेवनमें उसी प्रकार संलग्न रहती हैं, जैसे श्रेष्ठ अश्व सावधान सारथिके अधीन रहकर उसके निर्दिष्ट मार्गपर चलते रहते हैं ॥ ६ ॥
सम्बन्ध— पाँचवें मन्त्रके अनुसार जिसके बुद्धि और मन आदि विवेक और संयमसे हीन होते हैं, उसकी क्या गति होती है—इसे बतलाते हैं—
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाशुचिः ।
न स तत्पदमाजोति सः सारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥
यः तु सदा= जो कोई सदा; अविज्ञानवान्= विवेकहीन बुद्धिवाला; अमनस्कः= असंयतचित्त (और); अशुचिः= अपवित्र; भवति= रहता है; सः तत्पदम्= वह उस परमपदको; न आजोति= नहीं पा सकता; च= अपि तु; संसारम् अधिगच्छति= बार-बार जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्रमें ही भटकता रहता है ॥ ७ ॥
व्याख्या— जिसकी बुद्धि सदा ही विवेकसे—कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे रहित और मनको वशमें रखनेमें असमर्थ रहती है, जिसका मन निग्रहरहित—असंयत है और जिसका विचार दूषित रहता है तथा जिसकी इन्द्रियाँ निरन्तर दुःखाचारमें प्रवृत्त रहती हैं—ऐसे बुद्धिशक्तिसे रहित मन-इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले मनुष्यका जीवन कभी पवित्र नहीं रह पाता और इसलिये वह मानव-शरीरसे प्राप्त होनेयोग्य परमपदको नहीं पा सकता, वरं अपने दुष्कर्मोंके परिणामस्वरूप अनवरत इस संसार-चक्रमें ही भटकता रहता है—कूकर-शूकरादि विभिन्न योनियोंमें जन्मता एवं मरता रहता है ॥ ७ ॥
यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः ।
स तु तत्पदमाजोति यस्माद् भूयो न जायते ॥ ८ ॥
तु यः सदा= परंतु जो सदा; विज्ञानवान्= विवेकशील बुद्धिसे युक्त; समनस्कः= संयतचित्त (और); शुचिः= पवित्र; भवति= रहता है; सः तु= वह तो; तत्पदम्= उस परमपदको; आजोति= प्राप्त कर लेता है; यस्मात् भूयः= जहाँसे (लौटकर) पुनः; न जायते= जन्म नहीं लेता ॥ ८ ॥
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व्याख्या —इसके विपरीत जो छठे मन्त्रके अनुसार स्वयं सावधान होकर अपनी बुद्धिको निरन्तर विवेकशील बनाये रखता है और उसके द्वारा मनको रोककर पवित्रभावमें स्थित रहता है अर्थात् इन्द्रियोंके द्वारा भगवान्की आज्ञाके अनुसार पवित्र कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करता है तथा भगवान्को अर्पण किये हुए भोगोंका राग-द्वेषसे रहित हो निष्कामभावसे शरीर-निर्वाहके लिये उपभोग करता रहता है, वह परमेश्वरके उस परमधामको प्राप्त कर लेता है, जहाँसे फिर लौटना नहीं होता ॥ ८ ॥
सम्बन्ध —आठवें मन्त्रमें कही हुई बातको फिरसे स्पष्ट करते हुए रथके रूपकका उपसंहार करते हैं—
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान् नरः । सोऽध्वनः पारमाज्जोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥
यः नरः=जो (कोई) मनुष्य; विज्ञानसारथिः तु=विवेकशील बुद्धिरूप सारथिसे सम्पन्न (और); मनःप्रग्रहवान्=मनरूप लगामको वशमें रखनेवाला है; सः=वह; अध्वनः=संसारमार्गिके; पारम्=पार पहुँचकर; विष्णोः=सर्वव्यापी परब्रह्म पुरुषोत्तमभगवान्के; तत् परमम् पदम्=उस सुप्रसिद्ध परमपदको; आज्जोति=प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
व्याख्या —तृतीय मन्त्रसे नवम मन्त्रतक—सात मन्त्रोंमें रथके रूपकसे यह बात समझायी गयी है कि यह अति दुर्लभ मनुष्य-शरीर जिस जीवात्माको परमात्माकी कृपासे मिल गया है, उसे शीघ्र सचेत होकर भगवत्प्राप्तिके मार्गमें लग जाना चाहिये। शरीर अनित्य है, प्रतिक्षण इसका ह्रास हो रहा है। यदि अपने जीवनके इस अमूल्य समयको पशुओंकी भाँति सांसारिक भोगोंके भोगनेमें ही नष्ट कर दिया गया तो फिर बारम्बार जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्रमें घूमनेको बाध्य होना पड़ेगा। जिस महान् कार्यकी सिद्धिके लिये यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर मिला था, वह पूरा नहीं होगा। अतः मनुष्यको भगवान्की कृपासे मिली हुई विवेकशक्तिका सदुपयोग करना चाहिये। संसारकी अनित्यताको और इन
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
आपातरमणीय विषय-जन्ति सुखोंकी यथार्थ दुःखरूपताको समझकर इनके चिन्तन और उपभोगसे सर्वथा उपरत हो जाना चाहिये। केवल शरीरनिर्वाहके उपयुक्त कर्तव्यकर्माका निष्कामभावसे भगवान्की आज्ञा समझकर अनुष्ठान करते हुए अपनी बुद्धिमें भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाम तथा उनकी अलौकिक शक्ति और अहैंतुकी दयापर दृढ़ विश्वास उत्पन्न करना चाहिये और सर्वतोभावसे भगवान्पर ही निर्भर हो जाना चाहिये। अपने मनको भगवान्के तत्त्व-चिन्तनमें, वाणीको उनके गुण-वर्णनमें, नेत्रोंको उनके दर्शनमें तथा कानोंको उनके महिमा-श्रवणमें लगाना चाहिये। इस प्रकार सारी इन्द्रियोंका सम्बन्ध भगवान्से जोड़ देना चाहिये। जीवनका एक क्षण भी भगवान्की मधुर स्मृतिके बिना न बीतने पाये। इसीमें मनुष्य-जीवनकी सार्थकता है। जो ऐसा करता है, वह निश्चय ही परब्रह्म पुरुषोत्तमके अचिन्त्य परमपदको प्राप्त होकर सदाके लिये कृतकृत्य हो जाता है॥ १॥
सम्बन्ध— उपर्युक्त वर्णनमें रथके रूपककी कल्पना करके भगवत्प्राप्तिके लिये जो साधन बतलाया गया, उसमें विवेकशील बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके, इन्द्रियोंको विपरीत मार्गसे हटाकर, भगवत्प्राप्तिके मार्गमें लगानेकी बात कही गयी। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि स्वभावसे ही दुष्ट और बलवान् इन्द्रियोंको उनके प्रिय और अभ्यस्त असत्-मार्गसे किस प्रकार हटाया जाय; अतः इस बातका तात्त्विक विवेचन करके इन्द्रियोंको असत्-मार्गसे रोककर भगवान्की ओर लगानेका प्रकार बतलाते हैं—
इन्द्रियेभ्यः परा हार्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेशात्मा महान् परः॥ १०॥
हि इन्द्रियेभ्यः=क्योंकि इन्द्रियोंसे; अर्थाः=शब्दादि विषय; पराः=बलवान् हैं; च=और; अर्थेभ्यः=शब्दादि विषयोंसे; मनः=मन; परम्=पर (प्रबल) है; तु मनसः=और मनसे भी; बुद्धिः=बुद्धि; परा=पर (बलवती) है; बुद्धेः=(तथा) बुद्धिसे; महान् आत्मा=महान् आत्मा (उन सबका स्वामी होनेके कारण); परः=अत्यन्त श्रेष्ठ और बलवान् है॥ १०॥
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व्याख्या —इस मन्त्रमें ‘पर’ शब्दका प्रयोग बलवान्के अर्थमें हुआ है, यह बात समझ लेनी चाहिये; क्योंकि कार्य-कारणभावसे या सूक्ष्मताकी दृष्टिसे इन्द्रियोंको अपेक्षा शब्दादि विषयोंको श्रेष्ठ बतलाना युक्तियुक्त नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार ‘महान्’ विशेषणके सहित, ‘आत्मा’ शब्द भी ‘जीवात्मा’ का वाचक है, ‘महतत्त्व’ का नहीं। जीवात्मा इन सबका स्वामी है, अतः उसके लिये महान् विशेषण देना उचित ही है। यदि महतत्त्वके अर्थमें इसका प्रयोग होता तो ‘आत्मा’ शब्दके प्रयोगकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी। दूसरी बात यह भी है कि बुद्धि-तत्त्व ही महतत्त्व है। तत्त्व-विचारकालमें इनमें भेद नहीं माना जाता। इसके सिवा आगे चलकर जहाँ निरोध-(एक तत्त्वको दूसरेमें लीन करने) का प्रसङ्ग है, वहाँ भी बुद्धिका निरोध ‘महान् आत्मा’ में करनेके लिये कहा गया है। इन सब कारणोंसे तथा ब्रह्मसूत्रकारको सांख्यमतानुसार महतत्त्व और अत्यन्त प्रकृतिरूप अर्थ स्वीकार न होनेसे भी यही मानना चाहिये कि यहाँ ‘महान्’ विशेषणके सहित ‘आत्मा’ पदका अर्थ जीवात्मा ही है।* इसलिये मन्त्रका सारांश यह है कि इन्द्रियोंसे अर्थ (विषय) बलवान् हैं। वे साधककी इन्द्रियोंको बलपूर्वक अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं, अतः साधकको उचित है कि इन्द्रियोंको विषयोंसे दूर रखें। विषयोंसे बलवान् मन है। यदि मनकी विषयोंमें आसक्ति न रहे तो इन्द्रियाँ और विषय—ये दोनों साधककी कुछ भी हानि नहीं कर सकते। मनसे भी बुद्धि बलवान् है, अतः बुद्धिके द्वारा विचार करके मनको राग-द्वेषरहित बनाकर अपने वशमें कर लेना चाहिये। एवं बुद्धिसे भी इन सबका स्वामी महान् ‘आत्मा’ बलवान् है। उसकी आज्ञा माननेके लिये ये सभी बाध्य हैं। अतः मनुष्यको आत्मशक्तिका अनुभव करके उसके द्वारा बुद्धि आदि सबको नियन्त्रणमें रखना चाहिये ॥ १० ॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥
- भाष्यकार प्रातःस्मरणीय स्वामी शङ्कराचार्यजीने भी यहाँ ‘महान् आत्मा’ को जीवात्मा ही माना है, महतत्त्व नहीं (देखिये ब्रह्मसूत्र अ० १ पा० ४ सू० १ का शाङ्करभाष्य)।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
महतः=उस जीवात्मासे; परम्=बलवती है; अव्यक्तम्=भगवान्की अव्यक्त मायाशक्ति; अव्यक्तात्=अव्यक्त मायासे भी; परः=श्रेष्ठ है; पुरुषः=परमपुरुष (स्वयं परमेश्वर); पुरुषात्=परमपुरुष भगवान्से; परम्=श्रेष्ठ और बलवान्; किञ्चित्=कुछ भी; न=नहीं है; सा काष्ठा=वही सबकी परम अवधि (और); सा परा गतिः=वही परम गति है ॥ ११ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें ‘अव्यक्त’ शब्द भगवान्की उस त्रिगुणमयी दैवी मायाशक्तिके लिये प्रयुक्त हुआ है, जो गीतामें दुरत्यय (अतिदुस्तर) बतायी गयी है (गीता ७।१४) तथा जिससे मोहित हुए जीव भगवान्को नहीं जानते (गीता ७।१३)। यही जीवात्मा और परमात्माके बीचमें परदा है, जिसके कारण जीव सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वरको नित्य समीप होनेपर भी नहीं देख पाता। इसे इस प्रकारणमें जीवसे भी बलवान् बतलानेका यह भाव है कि जीव अपनी शक्तिसे इस मायाको नहीं हटा सकता, भगवान्की शरण ग्रहण करनेपर भगवान्की दयाके बलसे ही वह इससे पार हो सकता है (गीता ७।१४)। यहाँ ‘अव्यक्त’ शब्दसे सांख्यमतावलम्बियोंका ‘प्रधान तत्त्व’ नहीं ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि उनके मतमें ‘प्रधान’ स्वतन्त्र है, वह आत्मासे पर नहीं है; तथा आत्माको भोग और मुक्ति—दोनों वस्तुएँ देकर उसका प्रयोजन सिद्ध करनेवाला है। परंतु उपनिषद् और गीतामें इस अव्यक्त प्रकृतिको कहीं भी मुक्ति देनेमें समर्थ नहीं माना है। अतः इस मन्त्रका तात्पर्य यह है कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—इन सबपर आत्माका अधिकार है; अतः यह स्वयं उनको वशमें करके भगवान्की ओर बढ़ सकता है। परंतु इस आत्मासे भी बलवान् एक और तत्त्व है, जिसका नाम ‘अव्यक्त’ है। कोई उसे प्रकृति और कोई माया भी कहते हैं। इसीसे सब जीवसमुदाय मोहित होकर उसके वशमें हो रहा है। इसको हटाना जीवके अधिकारकी बात नहीं है; अतः इससे भी बलवान् जो इसके स्वामी परमपुरुष परमेश्वर हैं—जो बल, क्रिया और ज्ञान आदि सभी शक्तियोंकी अन्तिम अवधि और परम आधार हैं—उन्हींकी शरण लेनी चाहिये। जब वे दया करके इस मायारूप परदेको स्वयं हटा लेंगे, तब उसी क्षण वही भगवान्की प्राप्ति हो जायगी; क्योंकि वे तो सदासे ही सर्वत्र विद्यमान हैं ॥ ११ ॥