ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 22, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( २० )
| अनुवाक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ५ | विज्ञानात्माकी महिमा और उससे भिन्न उसके अन्तरात्मा | |
| आनन्दमय परमपुरुषका वर्णन | ..... ३८३ | |
| ६ | परब्रह्मकी सत्ता मानने और न माननेका परिणाम, ब्रह्मकी सत्ताके | |
| विषयमें अनुप्रश्न और उसके उत्तरमें ब्रह्मके स्वरूप और शक्तिका | ||
| वर्णन करते हुए सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम-निरूपण | ..... ३८६ | |
| ७ | स्वयं जगत्- रूपमें बननेवाले परमात्माकी मुक्तता तथा सबके जीवन | |
| और चेष्टाके आधारभूत उन परमात्माकी रसमयता एवं परमात्मप्राप्त | ||
| पुरुषको निर्भयपद-प्राप्ति और उन परमात्मासे विमुख पुरुषको जन्म- | ||
| मरणरूप भयकी प्राप्ति का उल्लेख | ..... ३९० | |
| ८ | परमात्माकी शासनशक्तिकी महिमामें एवं आनन्दकी मीमांसामें | |
| मानवजीवनकी अपेक्षा क्रमशः देवादिलोकोंके आनन्दकी उत्तरोत्तर | ||
| अधिकता तथा निष्काम विरक्तके लिये उस आनन्दकी स्वभाव- | ||
| सिद्धता और परमात्माके आनन्दकी निरतिशयता एवं उन आनन्द- | ||
| केन्द्र सर्वान्तर्मीया परमेश्वरके ज्ञानसे उनकी प्राप्ति का निरूपण | ..... ३९४ | |
| ९ | आनन्दमय परमात्माके ज्ञाताको निर्भयताकी प्राप्ति तथा पुण्य और | |
| पाप दोनों कर्मोंके प्रति रागद्वेषरहित उस महापुरुषकी शोकरहित | ||
| स्थितिका परिचय | ..... ४०३ |
भृगुवल्ली
१ | भृगुका अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मोपदेशके लिये प्रार्थना तथा वरुणद्वारा अन्न, प्राण, मन आदिको ब्रह्मप्राप्तिका द्वार बतलाकर 'सब कुछ ब्रह्म ही है' इस तत्त्वका उपदेश एवं भृगुका तप करना ... | ..... ४०५ ---|---|--- २ | 'अन्न ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना | ..... ४०६ ३ | 'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना | ..... ४०८ ४ | 'मन ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना | ..... ४१० ५ | 'विज्ञानस्वरूप चेतन जीवात्मा ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना | ..... ४११