ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished548 पृष्ठ
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( २१ )
| अनुवाक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ६ | भृगुका 'आनन्दमय परमात्मा ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चय करना तथा इस भार्गवी वारुणी विद्याका महत्त्व और फल | ......... ४१३ |
| ७ | अन्नकी निन्दा न करनारूप व्रतका निरूपण तथा प्राणको अन्न और शरीरको अन्नका भोक्ता कहकर उसके विज्ञानका फल बताना | ......... ४१५ |
| ८ | अन्नका दुरुपयोग न करनारूप व्रतका निरूपण तथा जलको अन्न और ज्योतिको अन्नका भोक्ता कहकर उसके विज्ञानका फल बताना | ... ४१७ |
| ९ | अन्नकी वृद्धि करनारूप ब्रह्मका निरूपण तथा पृथ्वीको अन्न और आकाशको अन्नका भोक्ता कहकर उसके विज्ञानका फल बताना | ......... ४१९ |
| १० | अतिथि-सेवाका महत्त्व और उसका श्रेष्ठ फल, वाणी आदि मानुषी और वर्षा आदि दैवी विभूतियोंके रूपमें परमात्माके सर्वत्र चिन्तनका प्रकार तथा विविध कामनाओंके भावसे की जानेवाली उपासनाका फलसहित निरूपण एवं परमात्माको सर्वत्र परिपूर्ण समझकर प्राप्त करनेका फल और भगवत्प्राप्त पुरुषकी स्थिति तथा उस महापुरुषके आनन्दमग्न मनसे निकले हुए समता और सर्वरूपताविषयक उद्गारों (सामगान)-का वर्णन | ......... ४२१ |
| शान्तिपाठ | ......... ४३० |
( ९ ) श्वेताश्वतरोपनिषद्
| शान्तिपाठ | ......... ४३१ |
|---|
( प्रथम अध्याय )
| मन्त्र | ||
|---|---|---|
| १ | जगत्के कारणकी, जीवनहेतुकी, स्थितिके कारणकी और सबके आधारकी खोज करनेवाले कुछ जिज्ञासुओंका परस्पर विचार-विमर्श | ... ४३१ |
| २ | काल, स्वभाव, प्रारब्ध आदिकी जगत्कारणताका खण्डन | ......... ४३२ |
| ३ | ऋषियोंद्वारा ध्यानयोगसे जगत्के वास्तविक कारण परमेश्वरकी अचिन्त्य आत्मशक्तिके साक्षात्कारका कथन | ......... ४३४ |
| ४-५ | विश्वका चक्र और नदीके रूपमें वर्णन | ......... ४३५ |
| ६-७ | परमात्माद्वारा जीवात्माके कर्मानुसार संसार-चक्रमें घुमाये जानेका तथा अपनेको और सर्वप्रेरक परमात्माको पृथक्-पृथक् समझने और उनकी कृपाका अनुभव करनेसे अमृतत्व पाकर ब्रह्ममें लीन होनेका निरूपण | ......... ४३८ |