भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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( २२ )

मन्त्रविषयपृष्ठ
परमात्माका स्वरूप न जाननेसे जीवात्माके बन्धन होने और जाननेसे मोक्ष होनेका वर्णन......... ४४०
९-११जीवात्मा, प्रकृति और इन दोनोंके शासक परमात्माके स्वरूपका प्रतिपादन तथा तीनोंके तत्त्वको जानकर परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे कैवल्यपदकी प्राप्तिका उल्लेख......... ४४१
१२जाननेयोग्य प्रेरक परमात्मा, भोक्ता जीव और भोग्य जडवर्गको जान लेनेसे सब कुछ जान लेनेका कथन......... ४४४
१३-१४ॐकारकी उपासनाद्वारा जीवात्मा और परमात्माके स्वरूपकी उपलब्धिका निरूपण एवं अरणि-मन्थनके दृष्टान्तद्वारा वाणीसे नाम-जप और मनसे स्वरूप-चिन्तन करके परब्रह्मका साक्षात्कार करनेका आदेश......... ४४४
१५-१६तिलोंमें तेल, दहीमें घी आदिकी भाँति हृदय-गुहामें छिपे हुए और सर्वत्र परिपूर्ण परमात्माको सत्य और तपके द्वारा प्राप्त करनेके लिये प्रेरणा......... ४४६

( द्वितीय अध्याय )

मन्त्रविषयपृष्ठ
१-५प्रथमाध्यायमें वर्णित ध्यानकी सिद्धिके लिये परमेश्वरसे स्तुति-प्रार्थना करनेका निरूपण......... ४४७
६-७ध्यान-साधनसे मनके विशुद्ध होनेका कथन एवं साधकको परमात्माकी शरण लेनेकी प्रेरणा......... ४५०
ध्यानयोगकी विधि और बैठनेके प्रकार-वर्णन......... ४५१
प्राणायामका क्रम और उसकी महत्ता......... ४५२
१०ध्यानके लिये उपयुक्त स्थान और भूमिका वर्णन......... ४५३
११योगसाधनकी उन्नतिके द्योतक लक्षणोंका दिग्दर्शन......... ४५४
१२-१३योगसाधनसे भूतसम्बन्धी पाँच सिद्धियोंके तथा लघुता, नीरोगता प्रभृति अन्य सिद्धियोंके भी प्राकट्यका निरूपण......... ४५५
१४-१५योगसाधन करके आत्मतत्त्वसे ब्रह्मतत्त्वको जाननेका फल, कृत-कृत्यता और समस्त बन्धनोंसे मुक्तिकी प्राप्ति......... ४५६
१६-१७सर्वस्वरूप और सर्वत्र परिपूर्ण परमदेव परमात्माकी जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थिति बताकर उन्हें नमस्कार करना......... ४५८