ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished548 पृष्ठ
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( २३ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| तृतीय अध्याय | ||
| १-२ | समस्त जगत्की उत्पत्ति, स्थिति, संचालन और विलयन करनेवाले परमेश्वरके ज्ञानसे अमृतत्व-प्राप्तिका कथन | ४५९ |
| ३ | परमेश्वरके नेत्र, मुख, हाथ और पैरोंकी सर्वत्र विद्यमानता और भक्तके द्वारा उनकी अनुभूतिका प्रकार-निरूपण एवं परमेश्वरद्वारा ही सबको शक्ति दिये जानेका उल्लेख | ४६१ |
| ४—६ | रुद्ररूप सर्वकारण सर्वज्ञ परमेश्वरसे शुभ बुद्धि और कल्याण-दानके लिये प्रार्थना | ४६२ |
| ७-८ | सर्वश्रेष्ठ सर्वव्यापी महान् परमेश्वरके ज्ञानसे जन्म-मरणनाश तथा उस ज्ञानी महापुरुषके अनुभव और परमात्मज्ञानके फलकी दृढ़ताका प्रतिपादन | ४६४ |
| ९-१० | परमेश्वरकी सर्वश्रेष्ठता, महत्ता और सर्वत्र परिपूर्णताका तथा उन परमात्माके ज्ञानद्वारा दुःखोंसे छूटनेका कथन | ४६५ |
| ११—१७ | सर्वव्यापी, सर्वप्रेरक, सर्वरूप, सर्वत्र हाथ, पैर आदि समस्त इन्द्रियोंसे युक्त, सब इन्द्रियोंसे रहित, सबके स्वामी और एकमात्र शरण्य भगवान्के सविशेष और निर्विशेष स्वरूपके तात्त्विक वर्णनमें उन परमात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिणामवाला बताकर उनके ज्ञानसे अमृतस्वरूप हो जानेका निरूपण करना | ४६६ |
| १८ | नौ द्वारवाले पुरमें अन्तर्यामीरूपसे परमेश्वरकी स्थितिका वर्णन | ४७० |
| १९ | ‘वे सर्वज्ञ परमात्मा समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सब इन्द्रियोंका कार्य करनेमें समर्थ हैं’ इसका स्पष्टीकरण और उनकी महिमाका वर्णन | ४७१ |
| २० | परमेश्वरको अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् बताना और उनकी कृपासे ही उनकी महिमाके ज्ञान होनेका निरूपण करना | ४७१ |
| २१ | परमात्माको प्राप्त महात्माके स्वानुभव-वर्णन | ४७२ |
| चतुर्थ अध्याय | ||
| १ | शुभ बुद्धिके लिये परमेश्वरसे अभ्यर्थना | ४७३ |
| २—४ | परमेश्वरका जगत्के रूपमें चिन्तन करते हुए उनकी स्तुतिका प्रकार तथा अव्यक्त और जीवरूप दोनों प्रकृतियोंपर परमेश्वरके स्वामित्व-का निरूपण | ४७४ |