ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished548 पृष्ठ
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( २४ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ५ | उक्त दोनों अनादि प्रकृतियोंका स्पष्टीकरण | ......... ४७६ |
| ६-७ | एक वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षीके रूपकद्वारा जीवात्मा और परमेश्वरकी भिन्नताका प्रतिपादन तथा परमेश्वरकी महिमाके ज्ञानसे जीवके मोहजनित शोककी निवृत्तिका कथन | ......... ४७७ |
| ८ | दिव्य परमधाम और भगवान्के पार्षदोंका तत्त्व न जाननेवालेको वेद-शास्त्रोंसे कोई लाभ न होना तथा जाननेवालोंका परमधाममें निवास | ... ४७९ |
| ९ | परमेश्वरके रचे हुए इस जगत्में ज्ञानी पुरुषोंसे भिन्न अज्ञानी जीवोंके बन्धनका उल्लेख | ......... ४८० |
| १० | माया और मायापति परमेश्वरको जाननेकी प्रेरणा | ......... ४८१ |
| ११ | समस्त कारणोंके अधिष्ठाता स्तवनीय परमेश्वरको जान लेनेसे शान्ति प्राप्त होनेका कथन | ......... ४८१ |
| १२ | सद्बुद्धिके लिये उन सर्वकारण सर्वज्ञ परमेश्वरसे पुनः प्रार्थना | ......... ४८२ |
| १३ | समस्त देवोंके अधिपति सबके आश्रयभूत परमेश्वरको भेंट-पूजा समर्पण करनेका समर्थन | ......... ४८३ |
| १४-२० | अत्यन्त सूक्ष्म, सृष्टिकी रचना और रक्षा करनेवाले, सब मनुष्योंके हृदयमें विद्यमान, सर्वव्यापक, कल्याणमय, महान् यशस्वी और दिव्य चक्षुओंसे देखे जानेयोग्य परमदेव परमात्माके स्वरूपका उनकी प्राप्तिरूप फलसहित विस्तृत वर्णन | ......... ४८३ |
| २१-२२ | रुद्ररूप परमेश्वरसे मुक्तिके लिये तथा सांसारिक भयसे रक्षाके लिये प्रार्थना | ......... ४८९ |
पञ्चम अध्याय
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १ | विद्या और अविद्याकी परिभाषा एवं इन दोनोंपर शासन करनेवाले परमेश्वरकी विलक्षणता | ......... ४९० |
| २-४ | उपास्यदेव भगवान्के आदिकारणता, सर्वाधिपतित्व, सर्वप्रकाशता, स्वयंप्रकाशमानता प्रभृति गुणगणोंका एवं उनकी अतर्क्य लीलाके रहस्यका निरूपण | ......... ४९१ |
| ५ | विश्वके शासक परमात्माद्वारा सब पदार्थोंके नाना रूपोंमें परिवर्तन और जीवोंके साथ गुणोंका यथायोग्य सम्बन्ध किये जानेका कथन | .... ४९३ |