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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

( २३ )

मन्त्रविषयपृष्ठ
तृतीय अध्याय
१-२समस्त जगत्की उत्पत्ति, स्थिति, संचालन और विलयन करनेवाले परमेश्वरके ज्ञानसे अमृतत्व-प्राप्तिका कथन४५९
परमेश्वरके नेत्र, मुख, हाथ और पैरोंकी सर्वत्र विद्यमानता और भक्तके द्वारा उनकी अनुभूतिका प्रकार-निरूपण एवं परमेश्वरद्वारा ही सबको शक्ति दिये जानेका उल्लेख४६१
४—६रुद्ररूप सर्वकारण सर्वज्ञ परमेश्वरसे शुभ बुद्धि और कल्याण-दानके लिये प्रार्थना४६२
७-८सर्वश्रेष्ठ सर्वव्यापी महान् परमेश्वरके ज्ञानसे जन्म-मरणनाश तथा उस ज्ञानी महापुरुषके अनुभव और परमात्मज्ञानके फलकी दृढ़ताका प्रतिपादन४६४
९-१०परमेश्वरकी सर्वश्रेष्ठता, महत्ता और सर्वत्र परिपूर्णताका तथा उन परमात्माके ज्ञानद्वारा दुःखोंसे छूटनेका कथन४६५
११—१७सर्वव्यापी, सर्वप्रेरक, सर्वरूप, सर्वत्र हाथ, पैर आदि समस्त इन्द्रियोंसे युक्त, सब इन्द्रियोंसे रहित, सबके स्वामी और एकमात्र शरण्य भगवान्‌के सविशेष और निर्विशेष स्वरूपके तात्त्विक वर्णनमें उन परमात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिणामवाला बताकर उनके ज्ञानसे अमृतस्वरूप हो जानेका निरूपण करना४६६
१८नौ द्वारवाले पुरमें अन्तर्यामीरूपसे परमेश्वरकी स्थितिका वर्णन४७०
१९‘वे सर्वज्ञ परमात्मा समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सब इन्द्रियोंका कार्य करनेमें समर्थ हैं’ इसका स्पष्टीकरण और उनकी महिमाका वर्णन४७१
२०परमेश्वरको अणुसे भी अणु और महान्‌से भी महान् बताना और उनकी कृपासे ही उनकी महिमाके ज्ञान होनेका निरूपण करना४७१
२१परमात्माको प्राप्त महात्माके स्वानुभव-वर्णन४७२
चतुर्थ अध्याय
शुभ बुद्धिके लिये परमेश्वरसे अभ्यर्थना४७३
२—४परमेश्वरका जगत्‌के रूपमें चिन्तन करते हुए उनकी स्तुतिका प्रकार तथा अव्यक्त और जीवरूप दोनों प्रकृतियोंपर परमेश्वरके स्वामित्व-का निरूपण४७४

( २४ )

मन्त्रविषयपृष्ठ
उक्त दोनों अनादि प्रकृतियोंका स्पष्टीकरण......... ४७६
६-७एक वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षीके रूपकद्वारा जीवात्मा और परमेश्वरकी भिन्नताका प्रतिपादन तथा परमेश्वरकी महिमाके ज्ञानसे जीवके मोहजनित शोककी निवृत्तिका कथन......... ४७७
दिव्य परमधाम और भगवान्‌के पार्षदोंका तत्त्व न जाननेवालेको वेद-शास्त्रोंसे कोई लाभ न होना तथा जाननेवालोंका परमधाममें निवास... ४७९
परमेश्वरके रचे हुए इस जगत्‌में ज्ञानी पुरुषोंसे भिन्न अज्ञानी जीवोंके बन्धनका उल्लेख......... ४८०
१०माया और मायापति परमेश्वरको जाननेकी प्रेरणा......... ४८१
११समस्त कारणोंके अधिष्ठाता स्तवनीय परमेश्वरको जान लेनेसे शान्ति प्राप्त होनेका कथन......... ४८१
१२सद्बुद्धिके लिये उन सर्वकारण सर्वज्ञ परमेश्वरसे पुनः प्रार्थना......... ४८२
१३समस्त देवोंके अधिपति सबके आश्रयभूत परमेश्वरको भेंट-पूजा समर्पण करनेका समर्थन......... ४८३
१४-२०अत्यन्त सूक्ष्म, सृष्टिकी रचना और रक्षा करनेवाले, सब मनुष्योंके हृदयमें विद्यमान, सर्वव्यापक, कल्याणमय, महान् यशस्वी और दिव्य चक्षुओंसे देखे जानेयोग्य परमदेव परमात्माके स्वरूपका उनकी प्राप्तिरूप फलसहित विस्तृत वर्णन......... ४८३
२१-२२रुद्ररूप परमेश्वरसे मुक्तिके लिये तथा सांसारिक भयसे रक्षाके लिये प्रार्थना......... ४८९

पञ्चम अध्याय

मन्त्रविषयपृष्ठ
विद्या और अविद्याकी परिभाषा एवं इन दोनोंपर शासन करनेवाले परमेश्वरकी विलक्षणता......... ४९०
२-४उपास्यदेव भगवान्‌के आदिकारणता, सर्वाधिपतित्व, सर्वप्रकाशता, स्वयंप्रकाशमानता प्रभृति गुणगणोंका एवं उनकी अतर्क्य लीलाके रहस्यका निरूपण......... ४९१
विश्वके शासक परमात्माद्वारा सब पदार्थोंके नाना रूपोंमें परिवर्तन और जीवोंके साथ गुणोंका यथायोग्य सम्बन्ध किये जानेका कथन.... ४९३

( २५ )

मन्त्रविषयपृष्ठ
वेदोंकी रहस्यभूत उपनिषद्-विद्याको जाननेवाले ब्रह्मा तथा देवता और ऋषिगणोंके अमृतरूप हो जानेका उल्लेख.......... ४९४
जीवात्माकी स्वकर्मानुसार देवयान, पितृयान और नाना योनियोंमें जन्म-मृत्युके चक्रमें घूमणारूप तीन गतियोंका प्रकरण.......... ४९५
८—१०जीवात्माके स्वरूपका विवेचन.......... ४९६
११मनुष्ययोनिमें अथवा विभिन्न योनियोंमें पृथक्-पृथक् संकल्प, स्पर्श, दृष्टि, मोह, भोजन, जलपान और वृष्टिसे सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होनेका उल्लेख.......... ४९९
१२जीवके आवागमनका कारण.......... ५००
१३अनादिकालसे चले आते हुए जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटनेका उपाय.......... ५०१
१४अध्यायके उपसंहारमें परमात्माकी प्राप्तिके उपायका संकेत.......... ५०२

षष्ठ अध्याय

मन्त्रविषयपृष्ठ
पुनः स्वभाव और कालकी जगत्कारणताका खण्डन तथा परमेश्वरकी महिमासे सृष्टिचक्रके संचालनका समर्थन.......... ५०३
उन सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, कालके भी काल, सर्वगुण-सम्पन्न, सर्व-शासक परके चिन्तनका आदेश.......... ५०४
परमात्माके द्वारा जीवात्माका गुण आदिके साथ सम्बन्ध कराये जानेका वर्णन.......... ५०४
भगवदर्पणरूप कर्मयोगके अनुष्ठानसे कर्मबन्धनके नाशका कथन.......... ५०५
भगवत्प्राप्तिके लिये उपासनारूप दूसरे साधनका वर्णन.......... ५०६
ज्ञानयोगरूप तीसरे साधनका फलसहित निरूपण.......... ५०७
प्रथम अध्यायमें कथित ध्यानके द्वारा परमेश्वरका साक्षात्कार करनेवाले महात्मा पुरुषोंके मुखसे जगत्के सर्वश्रेष्ठ कारणरूप परमात्माकी महिमाका कथन.......... ५०८
८-९परमेश्वरकी असीम ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक विविध शक्तियोंका वर्णन तथा उनकी अतुलनीय महत्ताका प्रतिपादन.......... ५०९

( २६ )

१० जगत्के अभिन्न निमित्तोपादानस्वरूप परमात्माकी स्तुति करते हुए उनसे अपने ब्रह्मस्वरूपमें आश्रय देनेके लिये प्रार्थना ......... ५१० ११—१३ परब्रह्म परमात्माके सर्वव्यापी, अन्तर्यामी, साक्षी, चेतन एवं कारणस्वरूपका निरूपण एवं उनको जाननेवाले महापुरुषोंके लिये मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन ......... ५११ १४ सूर्य-चन्द्रादि ज्योतियोंकी परब्रह्मको प्रकाशित करनेमें असमर्थता तथा परमात्माके प्रकाशसे ही सबको प्रकाश प्राप्त होनेका उल्लेख ...... ५१३ १५—१७ परमधामकी प्राप्तिके लिये अखिल कल्याणमय दिव्य गुणसम्पन्न सर्वेश्वरके स्वरूपका विशेषतासे वर्णन ......... ५१४ १८ परमदेव पुरुषोत्तमको जानने और पानेके लिये उनकी शरण लेनेका प्रकार ......... ५१७ १९ निर्गुण निराकार परमात्माके स्वरूपका निर्देश ......... ५१८ २० परमात्मज्ञानके बिना दुःख-निवृत्तिकी असम्भवता ......... ५१८ २१ श्वेताश्वतर ऋषिको तपसे और भगवत्कृपासे ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने तथा उसके द्वारा अधिकारियोंको उपदेश दिये जानेका कथन ......... ५१९ २२ अशान्तचित्त अनधिकारीके प्रति उपदेश देनेका निषेध ......... ५२० २३ परमेश्वर और गुरुमें श्रद्धा-भक्ति रखनेवालेको दिये हुए उपदेशकी सफलताका कथन ......... ५२० शान्तिपाठ ......... ५२१

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

ईशावास्योपनिषद्

यह ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वशाखीय संहिताका चालीसवाँ अध्याय है। मन्त्र-भागका अंश होनेसे इसका विशेष महत्त्व है। इसीको सबसे पहला उपनिषद् माना जाता है। शुक्लयजुर्वेदके प्रथम उनतालीस अध्यायोंमें कर्मकाण्डका निरूपण हुआ है। यह उस काण्डका अन्तिम अध्याय है और इसमें भगवत्तत्त्वरूप ज्ञानकाण्डका निरूपण किया गया है। इसके पहले मन्त्रमें ‘ईशा-वास्यम्’ वाक्य आनेसे इसका नाम ‘ईशावास्य’ माना गया है।

शान्तिपाठ

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥*
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

=सच्चिदानन्दघन; अदः=वह परब्रह्म; पूर्णम्=सब प्रकारसे पूर्ण है; इदम्=यह (जगत् भी); पूर्णम्=पूर्ण (ही) है; (क्योंकि) पूर्णात्=उस पूर्ण (परब्रह्म)-से ही; पूर्णम्=यह पूर्ण; उदच्यते=उत्पन्न हुआ है; पूर्णस्य=पूर्णके; पूर्णम्=पूर्णको; आदाय=निकाल लेनेपर (भी); पूर्णम्=पूर्ण; एव=ही; अवशिष्यते=बच रहता है।

व्याख्या— वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पुरुषोत्तम सब प्रकारसे सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत् भी उस परब्रह्मसे ही पूर्ण है; क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तमसे ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्मकी पूर्णतासे जगत् पूर्ण है, इसलिये भी वह परिपूर्ण है। उस पूर्ण ब्रह्ममेंसे पूर्णको निकाल लेनेपर भी वह पूर्ण ही बच रहता है।

त्रिविध तापकी शान्ति हो।


* यह मन्त्र बृहदारण्यक-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके प्रथम ब्राह्मणकी प्रथम कण्डिकाका पूर्वार्द्धरूप है।

२८ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १-२

ॐ ईशा वास्यमिदꣳ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्॥ १॥

जगत्याम्=अखिल ब्रह्माण्डमें; यत् किं च=जो कुछ भी; जगत्=जड-चेतनस्वरूप जगत् है; इदम्=यह; सर्वम्=समस्त; ईशा=ईश्वरसे; वास्यम्=व्याप्त है; तेन=उस ईश्वरको साथ रखते हुए; त्यक्तेन=त्यागपूर्वक; भुञ्जीथाः=(इसे) भोगते रहो; मा गृधः=(इसमें) आसक्त मत होओ; (क्योंकि) धनम्=धन-भोग्य-पदार्थ; कस्य स्वित्=किसका है अर्थात् किसीका भी नहीं है॥ १॥

व्याख्या—मनुष्योंके प्रति वेदभगवान्‌का पवित्र आदेश है कि अखिल विश्व-ब्रह्माण्डमें जो कुछ भी यह चराचरात्मक जगत् तुम्हारे देखने-सुननेमें आ रहा है, सब-का-सब सर्वाधार, सर्वनियन्ता, सर्वाधिपति, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वकल्याणगुणस्वरूप परमेश्वरसे व्याप्त है; सदा-सर्वत्र उन्हींसे परिपूर्ण है (गीता ९।४)। इसका कोई भी अंश उनसे रहित नहीं है (गीता १०। ३९, ४२)। यों समझकर उन ईश्वरको निरन्तर अपने साथ रखते हुए—सदा-सर्वदा उनका स्मरण करते हुए ही तुम इस जगत्‌में ममता और आसक्तिका त्याग करके केवल कर्तव्य-पालनके लिये ही विषयोंका यथाविधि उपभोग करो अर्थात्—विश्वरूप ईश्वरकी पूजाके लिये ही कर्मोंका आचरण करो। विषयोंमें मनको मत फँसने दो, इसीमें तुम्हारा निश्चित कल्याण है (गीता २।६४; ३।९; १८।४६)। वस्तुतः ये भोग्य-पदार्थ किसीके भी नहीं हैं। मनुष्य भूलसे ही इनमें ममता और आसक्ति कर बैठता है। ये सब परमेश्वरके हैं और उन्हींकी प्रसन्नताके लिये इनका उपयोग होना चाहिये॥ १॥

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतꣳ समाः।

एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ २॥

इह=इस जगत्‌में; कर्माणि=शास्त्रनियत कर्मोंको; कुर्वन्=(ईश्वरपूजार्थ) करते हुए; एव=ही; शतम् समाः=सौ वर्षोंतक; जिजीविषेत्=जीनेकी इच्छा करनी चाहिये; एवम्=इस प्रकार (त्यागभावसे, परमेश्वरके लिये); कर्म=किये जानेवाले कर्म; त्वयि=तुझ; नरे=मनुष्यमें; न लिप्यते=लिप्त नहीं होंगे; इतः=इससे (भिन्न);

मन्त्र ३ ] ईशावास्योपनिषद् २९

अन्यथा=अन्य कोई प्रकार अर्थात् मार्ग; न अस्ति=नहीं है (जिससे कि मनुष्य कर्म-बन्धनसे मुक्त हो सके) ॥ २ ॥

व्याख्या—पूर्व मन्त्रके कथनानुसार जगत्के एकमात्र कर्ता, भर्ता, हर्ता, सर्वशक्तिमान्, सर्वमय परमेश्वरका सतत स्मरण रखते हुए सब कुछ उन्हींका समझकर उन्हींकी पूजाके लिये शास्त्रनियत कर्तव्यकर्मोंका आचरण करते हुए ही सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करो—इस प्रकार अपने पूरे जीवनको परमेश्वरके प्रति समर्पण कर दो। ऐसा समझो कि शास्त्रोक्त स्वकर्मका आचरण करते हुए जीवन-निर्वाह करना केवल परमेश्वरकी पूजाके लिये ही है, अपने लिये नहीं—भोग भोगनेके लिये नहीं। यों करनेसे वे कर्म तुझे बन्धनमें नहीं डाल सकेंगे। कर्म करते हुए कर्मोंसे लिप्त न होनेका यही एकमात्र मार्ग है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी मार्ग कर्मबन्धनसे मुक्त होनेका नहीं है (गीता २।५०,५१; ५।१०) ॥२॥

सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मफलरूप जन्मबन्धनसे मुक्त होनेके निश्चित मार्गका निर्देश करके अब इसके विपरीत मार्गपर चलनेवाले मनुष्योंकी गतिका वर्णन करते हैं—

असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥

असुर्याः=असुरोंके; (जो) नाम=प्रसिद्ध; लोकाः=नाना प्रकारकी योनियाँ एवं नरकरूप लोक हैं; ते=वे सभी; अन्धेन तमसा=अज्ञान तथा दुःख-क्लेशरूप महान् अन्धकारसे; आवृताः=आच्छादित हैं; ये के च=जो कोई भी; आत्महनः=आत्माकी हत्या करनेवाले; जनाः=मनुष्य हों; ते=वे; प्रेत्य=मरकर; तान्=उन्हीं भयंकर लोकोंको; अभिगच्छन्ति=बार-बार प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥

व्याख्या—मानव-शरीर अन्य सभी शरीरोंसे श्रेष्ठ और परम दुर्लभ है एवं वह जीवको भगवान्‌की विशेष कृपासे जन्म-मृत्युरूप संसार-समुद्रसे तरनेके लिये ही मिलता है। ऐसे शरीरको पाकर भी जो मनुष्य अपने कर्मसमूहको ईश्वर-पूजाके लिये समर्पण नहीं करते और कामोपभोगको ही जीवनका परम ध्येय मानकर विषयोंकी आसक्ति और कामनावश जिस-

३० ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ४

किसी प्रकारसे भी केवल विषयोंकी प्राप्ति और उनके यथेच्छ उपभोगमें ही लगे रहते हैं; वे वस्तुतः आत्माकी हत्या करनेवाले ही हैं; क्योंकि इस प्रकार अपना पतन करनेवाले वे लोग अपने जीवनको केवल व्यर्थ ही नहीं खो रहे हैं वरं अपनेको और भी अधिक कर्मबन्धनमें जकड़ रहे हैं। इन काम-भोग-परायण लोगोंको—चाहे वे कोई भी क्यों न हों, उन्हें चाहे संसारमें कितने ही विशाल नाम, यश, वैभव या अधिकार प्राप्त हों, मरनेके बाद कर्मोंके फलस्वरूप बार-बार उन कूकर-शूकर, कीट, पतंगादि विभिन्न शोक-संतापपूर्ण आसुरी योनियोंमें और भयानक नरकोंमें भटकना पड़ता है (गीता १६। १६, १९, २०), जो कि ऐसे आसुरी स्वभाववाले दुष्टोंके लिये निश्चित किये हुए हैं और महान् अज्ञानरूप अन्धकारसे आच्छादित हैं। इसीलिये श्रीभगवान्‌ने गीतामें कहा है कि मनुष्यको अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये, अपना पतन नहीं करना चाहिये (६। ५)॥ ३॥

सम्बन्ध— जो परमेश्वर सम्पूर्ण जगत्‌में व्याप्त हैं, जिनका सतत स्मरण करते हुए तथा जिनकी पूजाके लिये ही समस्त कर्म करने चाहिये, वे कैसे हैं—इस जिज्ञासापर कहते हैं—

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥ ४॥

( तत् )=वे परमेश्वर; अनेजत्=अचल; एकम्=एक; (और) मनसः=मनसे (भी); जवीयः=अधिक तीव्र गतियुक्त हैं; पूर्वम्=सबके आदि; अर्षत्=ज्ञानस्वरूप या सबके जाननेवाले हैं; एनत्=इन परमेश्वरको; देवाः=इन्द्रादि देवता भी; न आप्नुवन्=नहीं पा सके या जान सके हैं; तत्=वे (परब्रह्म पुरुषोत्तम); अन्यान्=दूसरे; धावतः=दौड़नेवालोंको; तिष्ठत्=(स्वयं) स्थित रहते हुए ही; अत्येति=अतिक्रमण कर जाते हैं; तस्मिन्=उनके होनेपर ही—उन्हींकी सत्ता-शक्तिसे; मातरिश्वा=वायु आदि देवता; अपः=जलवर्षा आदि क्रिया; दधाति=सम्पादन करनेमें समर्थ होते हैं॥ ४॥

व्याख्या— वे सर्वान्तर्यामी सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अचल और एक हैं,

मन्त्र ५ ] ईशावास्योपनिषद् ३१

तथापि मनसे भी अधिक तीव्र वेगयुक्त हैं। जहाँतक मनकी गति है, वे उससे भी कहीं आगे पहलेसे ही विद्यमान हैं। मन तो वहाँतक पहुँच ही नहीं पाता। वे सबके आदि और ज्ञानस्वरूप हैं अथवा सबके आदि होनेके कारण सबको पहलेसे ही जानते हैं। पर उनको देवता तथा महर्षिगण भी पूर्णरूपसे नहीं जान सकते (गीता १०।२)। जितने भी तीव्र वेगयुक्त बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ अथवा वायु आदि देवता हैं, अपनी शक्तिभर परमेश्वरके अनुसंधानमें सदा दौड़ लगाते रहते हैं; परंतु परमेश्वर नित्य अचल रहते हुए ही उन सबको पार करके आगे निकल जाते हैं। वे सब वहाँतक पहुँच ही नहीं पाते। असीमकी सीमाका पता ससीमको कैसे लग सकता है। बल्कि वायु आदि देवताओंमें जो शक्ति है, जिसके द्वारा वे जलवर्षण, प्रकाशन, प्राणिप्राणधारण आदि कर्म करनेमें समर्थ होते हैं, वह इन अचिन्त्यशक्ति परमेश्वरकी शक्तिका एक अंशमात्र ही है। उनका सहयोग मिले बिना ये सब कुछ भी नहीं कर सकते॥ ४॥

सम्बन्ध— अब परमेश्वरकी अचिन्त्यशक्तिमत्ता तथा व्यापकता प्रकारान्तरसे पुनः वर्णन करते हैं—

तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥ ५॥

तत्=वे; एजति=चलते हैं; तत्=वे; न एजति=नहीं चलते; तत्=वे; दूरे=दूरसे भी दूर हैं; तत्=वे; उ अन्तिके=अत्यन्त समीप हैं; तत्=वे; अस्य=इस; सर्वस्य=समस्त जगत्के; अन्तः=भीतर परिपूर्ण हैं; (और) तत्=वे; अस्य=इस; सर्वस्य=समस्त जगत्के; उ बाह्यतः=बाहर भी हैं॥ ५॥

व्याख्या— वे परमेश्वर चलते भी हैं और नहीं भी चलते; एक ही कालमें परस्परविरोधी भाव, गुण तथा क्रिया जिनमें रह सकती है, वे ही तो परमेश्वर हैं। यह उनकी अचिन्त्य शक्तिकी महिमा है। दूसरे प्रकारसे यह भी कहा जा सकता है कि भगवान् जो अपने दिव्य परमधाममें और लीलाधाममें अपने प्रिय भक्तोंको सुख पहुँचानेके लिये अप्राकृत सगुण-साकार रूपमें प्रकट रहकर लीला किया करते हैं, यह उनका चलना है; और निर्गुणरूपसे जो सदा-सर्वथा

३२ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ६-७

अचल स्थित हैं, यह उनका न चलना है। इसी प्रकार वे श्रद्धा-प्रेमसे रहित मनुष्योंको कभी दर्शन नहीं देते, अतः उनके लिये दूर-से-दूर हैं; और प्रेमकी पुकार सुनते ही जिन प्रेमीजनोंके सामने चाहे जहाँ उसी क्षण प्रकट हो जाते हैं, उनके लिये वे समीप-से-समीप हैं। इसके अतिरिक्त वे सदा-सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिये दूर-से-दूर भी वे ही हैं और समीप-से-समीप भी वे ही हैं; क्योंकि ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ वे न हों। सबके अन्तर्यामी होनेके कारण भी वे अत्यन्त समीप हैं; पर जो अज्ञानी लोग उन्हें इस रूपमें नहीं पहचानते, उनके लिये वे बहुत दूर हैं (गीता १३। १५)। वस्तुतः वे इस समस्त जगत्के परम आधार हैं और परम कारण वे ही हैं; इसलिये बाहर-भीतर सभी जगह वे ही परिपूर्ण हैं (गीता ७। ७) ॥ ५ ॥

सम्बन्ध— अब अगले दो मन्त्रोंमें इन परब्रह्म परमेश्वरको जाननेवाले महापुरुषकी स्थितिका वर्णन किया जाता है—

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥

**तु=**परन्तु; **यः=**जो मनुष्य; **सर्वाणि=**सम्पूर्ण; **भूतानि=**प्राणियोंको; **आत्मनि=**परमात्मामें; **एव=**ही; **अनुपश्यति=**निरन्तर देखता है; **च=**और; **सर्वभूतेषु=**सम्पूर्ण प्राणियोंमें; **आत्मानम्=**परमात्माको (देखता है); **ततः=**उसके पश्चात् (वह कभी भी); **न विजुगुप्सते=**किसीसे घृणा नहीं करता ॥ ६ ॥

व्याख्या— इस प्रकार जो मनुष्य प्राणिमात्रको सर्वाधार परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मामें देखता है और सर्वान्तर्यामी परम प्रभु परमात्माको प्राणिमात्रमें देखता है, वह कैसे किससे घृणा या द्वेष कर सकता है। वह तो सदा-सर्वत्र अपने परम प्रभुके ही दर्शन करता हुआ (गीता ६। २९-३०)। मन-ही-मन सबको प्रणाम करता रहता है तथा सबकी सब प्रकारसे सेवा करना और उन्हें सुख पहुँचाना चाहता है ॥ ६ ॥

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥

मन्त्र ८ ] ईशावास्योपनिषद् ३३

यस्मिन्=जिस स्थितिमें; विजानतः=परब्रह्म परमेश्वरको भलीभाँति जाननेवाले महापुरुषके (अनुभवमें); सर्वाणि=सम्पूर्ण; भूतानि=प्राणी; आत्मा=एकमात्र परमात्मस्वरूप; एव=ही; अभूत्=हो चुकते हैं; तत्र=उस अवस्थामें (उस); एकत्वम्=एकताका—एकमात्र परमेश्वरका; अनुपश्यतः=निरन्तर साक्षात् करनेवाले पुरुषके लिये; कः=कौन-सा; मोहः=मोह (रह जाता है और); कः=कौन-सा; शोकः=शोक। (वह शोक-मोहसे सर्वथा रहित, आनन्दपरिपूर्ण हो जाता है) ॥ ७ ॥

व्याख्या— इस प्रकार जब मनुष्य परमात्माको भलीभाँति पहचान लेता है, जब उसकी सर्वत्र भगवद्दृष्टि हो जाती है—जब वह प्राणिमात्रमें एकमात्र तत्त्व श्रीपरमात्माको ही देखता है, तब उसे सदा-सर्वत्र परमात्माके दर्शन होते रहते हैं। उस समय उसके अन्तःकरणमें शोक, मोह आदि विकार कैसे रह सकते हैं ? वह तो इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि शोक-मोहादि विकारोंकी छाया भी कहीं उसके चित्तप्रदेशमें नहीं रह जाती। लोगोंके देखनेमें वह सब कुछ करता हुआ भी वस्तुतः अपने प्रभुमें ही क्रीडा करता है (गीता ६। ३१)। उसके लिये प्रभु और प्रभुकी लीलाके अतिरिक्त अन्य कुछ रह ही नहीं जाता ॥ ७ ॥

सम्बन्ध— अब इस प्रकार परमप्रभु परमेश्वरको तत्त्वसे जाननेका तथा सर्वत्र देखनेका फल बतलाते हैं—

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण- मस्नाविरँ शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतो- ऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥

सः=वह महापुरुष; शुक्रम्=(उन) परम तेजोमय; अकायम्=सूक्ष्मशरीरसे रहित; अव्रणम्=छिद्ररहित या क्षतरहित; अस्नाविरम्=शिराओंसे रहित—स्थूल पाञ्चभौतिक शरीरसे रहित; शुद्धम्=अप्राकृत दिव्य सच्चिदानन्दस्वरूप; अपापविद्धम्=शुभाशुभकर्म-सम्पर्कशून्य परमेश्वरको; पर्यगात्=प्राप्त हो जाता है;

३४ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ९

(जो) कविः=सर्वद्रष्टा; मनीषी=सर्वज्ञ एवं ज्ञानस्वरूप; परिभूः=सर्वोपरि विद्यमान एवं सर्वनियन्ता; स्वयम्भूः=स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं (और); शाश्वतीभ्यः=अनादि; समाभ्यः=कालसे; याथातथ्यतः=सब प्राणियोंके कर्मानुसार यथायोग्य; अर्थान्=सम्पूर्ण पदार्थोंकी; व्यदधात्=रचना करते आये हैं॥ ८॥

**व्याख्या—**उपर्युक्त वर्णनके अनुसार परमेश्वरको सर्वत्र जानने-देखनेवाला महापुरुष उन परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वेश्वरको प्राप्त होता है, जो शुभाशुभ कर्मजनित प्राकृत सूक्ष्म देह तथा पाञ्चभौतिक अस्थि-शिरा-मांसादिमय षड्विकारयुक्त स्थूल देहसे रहित, छिद्ररहित, दिव्य शुद्ध सच्चिदानन्दघन हैं; एवं जो क्रान्तदर्शी—सर्वद्रष्टा हैं, सबके ज्ञाता, सबको अपने नियन्त्रणमें रखनेवाले सर्वाधिपति हैं; और कर्मपरवश नहीं वरं स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं तथा जो सनातन कालसे सब प्राणियोंके लिये उनके कर्मानुसार समस्त पदार्थोंकी यथायोग्य रचना और विभागव्यवस्था करते आये हैं॥ ८॥

सम्बन्ध— अब अगले तीन मन्त्रोंमें विद्या और अविद्याका तत्त्व समझाया जायगा। इस प्रकरणमें परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिके साधन 'ज्ञान' को विद्याके नामसे कहा गया है और स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति अथवा इस लोकके विविध भोगैश्वर्यकी प्राप्तिके साधन 'कर्म'को अविद्याके नामसे। इन ज्ञान और कर्म—दोनोंके तत्त्वको भलीभाँति समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य ही इन दोनों साधनोंके द्वारा सर्वोत्तम तथा वास्तविक फल प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं—इस रहस्यको समझानेके लिये पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं—

अन्धंतमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया ँ रताः॥ ९॥

ये=जो मनुष्य; अविद्याम्=अविद्याकी; उपासते=उपासना करते हैं, (वे); अन्धम्=अज्ञानस्वरूप; तमः=घोर अन्धकारमें; प्रविशन्ति=प्रवेश करते हैं; (और) ये=जो मनुष्य; विद्यायाम्=विद्यामें; रताः=रत हैं अर्थात् ज्ञानके मिथ्याभिमानमें मत्त हैं; ते=वे; ततः=उससे; =भी; भूयः इव=मानो अधिकतर; तमः=अन्धकारमें (प्रवेश करते हैं)॥ ९॥

मन्त्र १० ] ईशावास्योपनिषद् ३५

व्याख्या—जो मनुष्य भोगोंमें आसक्त होकर उनकी प्राप्तिके साधनरूप अविद्याका—विविध प्रकारके कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे उन कर्मोंके फलस्वरूप अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण विविध योनियों और भोगोंको ही प्राप्त होते हैं। वे मनुष्य-जन्मके चरम और परम लक्ष्य श्रीपरमेश्वरको न पाकर निरन्तर जन्म-मृत्युरूप संसारके प्रवाहमें पड़े हुए विविध तापोंसे संतप्त होते रहते हैं।

दूसरे जो मनुष्य न तो अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्तापनके अभिमानसे रहित कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और न विवेक-वैराग्यादि ज्ञानके प्राथमिक साधनोंका ही सेवन करते हैं; परंतु केवल शास्त्रोंको पढ़-सुनकर अपनेमें विद्याका—ज्ञानका मिथ्या आरोप करके ज्ञानाभिमानी बन बैठते हैं, ऐसे, मिथ्या ज्ञानी मनुष्य अपनेको ज्ञानी मानकर, ‘हमारे लिये कोई भी कर्तव्य नहीं है’ इस प्रकार कहते हुए कर्तव्यकर्मोंका त्याग कर देते हैं और इन्द्रियोंके वशमें होकर शास्त्रविधिसे विपरीत मनमाना आचरण करने लगते हैं। इससे वे लोग सकामभावसे कर्म करनेवाले विषयासक्त मनुष्योंकी अपेक्षा भी अधिकतर अन्धकारको—पशु-पक्षी, शूकर-कूकर आदि नीच योनियोंको और रौरव-कुम्भीपाकादि घोर नरकोंको प्राप्त होते हैं॥ ९॥

सम्बन्ध—शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर ज्ञान तथा कर्मका अनुष्ठान करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, उसका संकेतसे वर्णन करते हैं—

अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १०॥

विद्यया=ज्ञानके यथार्थ अनुष्ठानसे; अन्यत् एव=दूसरा ही फल; आहुः=बतलाते हैं; (और) अविद्यया=कर्मोंके यथार्थ अनुष्ठानसे; अन्यत्=दूसरा (ही) फल; आहुः=बतलाते हैं; इति=इस प्रकार; (हमने) धीराणाम्=(उन) धीर पुरुषोंके; शुश्रुम=वचन सुने हैं; ये=जिन्होंने; नः=हमें; तत्=उस विषयको; विचचक्षिरे=व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥ १०॥

व्याख्या—सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले ज्ञानका यथार्थ स्वरूप है—

३६ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ११

नित्यानित्यवस्तुका विवेक, क्षणभङ्गुर विनाशशील अनित्य ऐहलौकिक और पारलौकिक भोग-सामग्रियों और उनके साधनोंसे पूर्ण विरक्ति, संयमपूर्ण पवित्र जीवन और एकमात्र सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्मके चिन्तनमें अखण्ड संलग्नता। इस यथार्थ ज्ञानके अनुष्ठानसे प्राप्त होता है—परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता १८।४९—५५)। यथार्थ ज्ञानका यह सर्वोत्तम फल, ज्ञानाभिमानमें रत स्वेच्छाचारी मनुष्योंको जो दुर्गतिरूप फल मिलता है, उससे सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।

इसी प्रकार सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले कर्मका स्वरूप है—कर्ममें कर्तापनके अभिमानका अभाव, राग-द्वेष और फल-कामनाका अभाव एवं अपने वर्णाश्रम तथा परिस्थितिके अनुरूप केवल भगवत्सेवाके भावसे श्रद्धापूर्वक शास्त्रविहित कर्मोंका यथायोग्य सेवन। इसके अनुष्ठानसे समस्त दुर्गुण और दुराचारोंका अशेष रूपसे नाश हो जाता है और हर्ष-शोकादि समस्त विकारोंसे रहित होकर साधक मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है। सकामभावसे किये जानेवाले कर्मोंका जो पुनर्जन्मरूप फल उन कर्ताओंको मिलता है, उससे इस यथार्थ कर्म-सेवनका यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।

इस प्रकार हमने उन परम ज्ञानी महापुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक्-पृथक्-रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥ १०॥

सम्बन्ध— अब उपर्युक्त प्रकारसे ज्ञान और कर्म—दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट शब्दोंमें बतलाते हैं—

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयँसह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥

यः=जो मनुष्य; तत् उभयम्=उन दोनोंको; (अर्थात्) विद्याम्=ज्ञानके तत्त्वको; =और; अविद्याम्=कर्मके तत्त्वको; =भी; सह=साथ-साथ; वेद= यथार्थतः जान लेता है; अविद्यया=(वह) कर्मोंके अनुष्ठानसे; मृत्युम्=मृत्युको; तीर्त्वा=पार करके; विद्यया=ज्ञानके अनुष्ठानसे; अमृतम्=अमृतको; अश्नुते=

मन्त्र ११ ]

ईशावास्योपनिषद्

३७

भोगता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥

व्याख्या— कर्म और अकर्मका वास्तविक रहस्य समझनेमें बड़े-बड़े बुद्धिमान् पुरुष भी भूल कर बैठते हैं (गीता ४।१६)। इसी कारण कर्म-रहस्यसे अनभिज्ञ ज्ञानाभिमानी मनुष्य कर्मको ब्रह्मज्ञानमें बाधक समझ लेते हैं और अपने वर्णाश्रमोचित अवश्यकर्तव्य कर्मोंका त्याग कर देते हैं; परंतु इस प्रकारके त्यागसे उन्हें त्यागका यथार्थ फल—कर्मबन्धनसे छुटकारा नहीं मिलता (गीता १८।८)। इसी प्रकार ज्ञान (अकर्मवस्था—नैष्कर्म्य)—का तत्त्व न समझनेके कारण मनुष्य अपनेको ज्ञानी तथा संसारसे ऊपर उठे हुए मान लेते हैं। अतः वे या तो अपनेको पुण्य-पापसे अलिस मानकर मनमाने कर्मचरणमें प्रवृत्त हो जाते हैं, या कर्मोंको भाररूप समझकर उन्हें छोड़ देते हैं और आलस्य, निद्रा तथा प्रमादमें अपने दुर्लभ मानव-जीवनके अमूल्य समयको नष्ट कर देते हैं।

इन दोनों प्रकारके अनर्थोंसे बचनेका एकमात्र उपाय कर्म और ज्ञानके रहस्यको साथ-साथ समझकर उनका यथायोग्य अनुष्ठान करना ही है। इसीलिये इस मन्त्रमें यह कहा गया है कि जो मनुष्य इन दोनोंके तत्त्वको एक ही साथ भलीभाँति समझ लेता है, वह अपने वर्णाश्रम और परिस्थितिके अनुरूप शास्त्रविहित कर्मोंका स्वरूपतः त्याग नहीं करता, बल्कि उनमें कर्तापनके अभिमानसे तथा रागद्वेष और फलकामनासे रहित होकर उनका यथायोग्य आचरण करता है। इससे उसकी जीवनयात्रा भी सुखपूर्वक चलती है और इस भावसे कर्मानुष्ठान करनेके फलस्वरूप उसका अन्तःकरण समस्त दुर्गुणों एवं विकारोंसे रहित होकर अत्यन्त निर्मल हो जाता है और भगवत्कृपासे वह मृत्युमय संसारसे सहज ही तर जाता है। इस कर्मसाधनके साथ-ही-साथ विवेक-वैराग्यसम्पन्न होकर निरन्तर ब्रह्मविचाररूप ज्ञानाभ्यास करते रहनेसे श्रीपरमेश्वरके यथार्थ ज्ञानका उदय होनेपर वह शीघ्र ही परब्रह्म परमेश्वरको साक्षात् प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥

३८ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १२

सम्बन्ध— अब अगले तीन मन्त्रोंमें असम्भूति और सम्भूतिका तत्त्व बतलाया जायगा। इस प्रकरणमें 'असम्भूति' शब्दका अर्थ है— जिनकी पूर्णरूपसे सत्ता न हो, ऐसी विनाशशील देव, पितर और मनुष्यादि योनियाँ एवं उनकी भोग-सामग्रियाँ। इसीलिये चौदहवें मन्त्रमें 'असम्भूति' के स्थानपर स्पष्टतया 'विनाश' शब्दका प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार सम्भूति शब्दका अर्थ है—जिसकी सत्ता पूर्णरूपसे हो वह सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाला अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता ७। ६-७)।

देव, पितर और मनुष्यादिकी उपासना किस प्रकार करनी चाहिये और अविनाशी परब्रह्मकी किस प्रकार—इस तत्त्वको समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य ही उनके सर्वोत्तम फलोंको प्राप्त हो सकते हैं, अन्यथा नहीं। इस भावको समझानेके लिये पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं—

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याँरताः॥ १२॥

ये=जो मनुष्य; असम्भूतिम्=विनाशशील देव-पितर-मनुष्य आदिकी; उपासते=उपासना करते हैं; (ते)=वे; अन्धम्=अज्ञानरूप; तमः=घोर अन्धकारमें; प्रविशन्ति=प्रवेश करते हैं; (और) ये=जो; सम्भूत्याम्= अविनाशी परमेश्वरमें; रताः=रत हैं अर्थात् उनकी उपासनाके मिथ्याभिमानमें मत्त हैं; ते=वे; ततः=उनसे; =भी; भूयः इव=मानो अधिकतर; तमः=अन्धकारमें (प्रवेश करते हैं)॥ १२॥

**व्याख्या—**जो मनुष्य विनाशशील स्त्री, पुत्र, धन, मान, कीर्ति, अधिकार आदि इस लोक और परलोककी भोग-सामग्रियोंमें आसक्त होकर उन्हींको सुखका हेतु समझते हैं तथा उन्हींके अर्जन-सेवनमें सदा संलग्न रहते हैं एवं इन भोग-सामग्रियोंकी प्राप्ति, संरक्षण तथा वृद्धिके लिये उन विभिन्न देवता, पितर और मनुष्यादिकी उपासना करते हैं, जो स्वयं जन्म-मरणके चक्रमें पड़े हुए होनेके कारण अभावग्रस्त और शरीरकी दृष्टिसे विनाशशील हैं, उनके उपासक वे भोगासक्त मनुष्य अपनी उपासनाके फलस्वरूप विभिन्न देवताओंके

मन्त्र १३ ] ईशावास्योपनिषद् ३९

लोकोंको और विभिन्न भोगयोनियोंको प्राप्त होते हैं। यही उनका अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है। (गीता ७।२० से २३)

दूसरे जो मनुष्य शास्त्रके तात्पर्यको तथा भगवान्‌के दिव्य गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यको न समझनेके कारण न तो भगवान्‌का भजन-ध्यान ही करते हैं और न श्रद्धाका अभाव तथा भोगोंमें आसक्ति होनेके कारण लोकसेवा और शास्त्रविहित देवोपासनामें ही प्रवृत्त होते हैं, ऐसे वे विषयासक्त मनुष्य झूठ-मूठ ही अपनेको ईश्वरोपासक बतलाकर सरलहृदय जनतासे अपनी पूजा कराने लगते हैं। ये लोग मिथ्याभिमानके कारण देवताओंको तुच्छ बतलाते हैं और शास्त्रानुसार आवश्यकर्तव्य देवपूजा तथा गुरुजनोंका सम्मान-सत्कार करना भी छोड़ देते हैं। इतना ही नहीं, दूसरोंको भी अपने वाग्जालमें फँसाकर उनके मनोंमें भी देवोपासना आदिके प्रति अश्रद्धा उत्पन्न कर देते हैं। ये लोग अपनेको ही ईश्वरके समकक्ष मानते-मनवाते हुए मनमाने दुराचरणमें प्रवृत्त हो जाते हैं। ऐसे दम्भी मनुष्योंको अपने दुष्कर्मोंका कुफल भोगनेके लिये बाध्य होकर कूकर-शूकर आदि नीच योनियोंमें और रौरव-कुम्भीपाकादि नरकोंमें जाकर भीषण यन्त्रणाएँ भोगनी पड़ती हैं। यही उनका विनाशशील देवताओंकी उपासना करनेवालोंकी अपेक्षा भी अधिकतर घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है (गीता १६। १८-१९) ॥ १२ ॥

**सम्बन्ध—**शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर सम्भूति और असम्भूतिकी उपासना करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, अब संकेतसे उसका वर्णन करते हैं—

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३ ॥

सम्भवात्=अविनाशी ब्रह्मकी उपासनासे; अन्यत् एव=दूसरा ही फल; आहुः=बतलाते हैं; (और) असम्भवात्=विनाशशील देव-पितर-मनुष्य आदिकी उपासनासे; अन्यत्=दूसरा (ही) फल; आहुः=बतलाते हैं; इति=इस प्रकार; (हमने) धीराणाम्=(उन) धीर पुरुषोंके; शुश्रुम=वचन सुने हैं; ये=जिन्होंने; नः=हमें; तत्=उस विषयको; विचचक्षिरे=व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥ १३॥

४० ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १४

व्याख्या— अविनाशी ब्रह्मकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है—परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्‌को सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वाधार, सर्वमय, सम्पूर्ण संसारके कर्ता, धर्ता, हर्ता, नित्य अविनाशी समझना और भक्ति, श्रद्धा तथा प्रेमपरिपूरित हृदयसे नित्य-निरन्तर उनके दिव्य परम मधुर नाम, रूप, लीला, धाम तथा प्राकृत गुणरहित एवं दिव्य गुणगणमय सच्चिदानन्दघन स्वरूपका श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि करते रहना। इस प्रकारकी सच्ची उपासनासे उपासकको शीघ्र ही अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तमकी प्राप्ति हो जाती है (गीता ९।३४)। ईश्वरोपासनाका मिथ्या स्वाँग भरनेवाले दम्भियोंको जो फल मिलता है, उससे इन सच्चे उपासकोंको मिलनेवाला यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।

इसी प्रकार विनाशशील देवता, पितर, मनुष्य आदिकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है—शास्त्रों एवं श्रीभगवान्‌के आज्ञानुसार (गीता १७।१४) देवता, पितर, ब्राह्मण, माता-पिता, आचार्य और ज्ञानी महापुरुषोंकी सेवा-पूजादि अवश्य-कर्तव्य समझकर करना और उसको भगवान्‌की आज्ञाका पालन एवं उनकी परम सेवा समझना। इस प्रकार निष्कामभावसे देव-पितर-मनुष्य आदिकी सेवा-पूजा करनेवालोंके अन्तःकरणकी शुद्धि होती है तथा उनको श्रीभगवान्‌की कृपा एवं प्रसन्नता प्राप्त होती है, जिससे वे मृत्युमय संसारसागरसे तर जाते हैं। विनाशशील देवता आदिकी सकाम उपासनासे जो फल मिलता है, उससे यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।

इस प्रकार हमने उन धीर तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक्-पृथक्-रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥ १३॥

सम्बन्ध— अब उपर्युक्त प्रकारसे सम्भूति और असम्भूति दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट बतलाते हैं—

सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयँ सह। विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते॥ १४॥

यः=जो मनुष्य; तत् उभयम्=उन दोनोंको; (अर्थात्) सम्भूतिम्=अविनाशी परमेश्वरको; =और; विनाशम्=विनाशशील देवादिको; =भी; सह=साथ-साथ;

मन्त्र १५ ] ईशावास्योपनिषद् ४१


वेद=यथार्थतः जान लेता है; विनाशेन=(वह) विनाशशील देवादिकी उपासनासे; **मृत्युम्=**मृत्युको; **तीर्त्वा=**पार करके; **सम्भूत्या=**अविनाशी परमेश्वरकी उपासनासे; **अमृतम्=**अमृतको; **अश्नुते=**भोगता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है॥ १४॥

व्याख्या— जो मनुष्य यह समझ लेता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम नित्य, अविनाशी, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वाधिपति, सर्वात्मा और सर्वश्रेष्ठ हैं, वे परमेश्वर नित्य निर्गुण (प्राकृत गुणोंसे सर्वथा रहित) और नित्य सगुण (स्वरूपभूत दिव्यकल्याण-गुणगण-विभूषित) हैं और इसीके साथ जो यह भी समझ लेता है कि देवता, पितर, मनुष्य आदि जितनी भी योनियाँ तथा भोगसामग्रियाँ हैं, सभी विनाशशील, क्षणभङ्गुर और जन्म-मृत्युशील होनेके कारण महान् दुःखके कारण हैं; तथापि इनमें जो सत्ता-स्फूर्ति तथा शक्ति है, वह सभी भगवान्‌की है और भगवान्‌के जगच्चक्रके सुचारुरूपसे चलते रहनेके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ ही इनकी यथायोग्य सेवा-पूजा आदि करनेकी शास्त्रोंने आज्ञा दी है और शास्त्र भगवान्‌की ही वाणी हैं, वह मनुष्य ऐहलौकिक तथा पारलौकिक देव-पितरादि लोकोंके भोगोंमें आसक्त न होकर कामना-ममता आदि हृदयसे निकालकर इन सबकी यथायोग्य शास्त्रविहित सेवा-पूजादि करता है। इससे उसकी जीवन-यात्रा सुखपूर्वक चलती है और उसके आभ्यन्तरिक विकारोंका नाश होकर अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है एवं भगवत्कृपासे वह सहज ही मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है। विनाशशील देवता आदिकी निष्काम उपासनाके साथ-ही-साथ अविनाशी परात्पर प्रभुकी उपासनासे वह शीघ्र ही अमृतरूप परमेश्वरको प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है॥ १४॥

सम्बन्ध— श्रीपरमेश्वरकी उपासना करनेवालेको परमेश्वरकी प्राप्ति होती है, यह कहा गया। अतः भगवान्‌के भक्तको अन्तकालमें परमेश्वरसे उनकी प्राप्तिके लिये किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥ १५॥

४२ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १६

**पूषन्=**हे सबका भरण-पोषण करनेवाले परमेश्वर; **सत्यस्य=**सत्यस्वरूप आप सर्वेश्वरका; **मुखम्=**श्रीमुख; **हिरण्मयेन=**ज्योतिर्मय सूर्यमण्डलरूप; **पात्रेण=**पात्रसे; **अपिहितम्=**ढका हुआ है; **सत्यधर्माय=**आपकी भक्तिरूप सत्यधर्मका अनुष्ठान करनेवाले मुझको; **दृष्टये=**अपने दर्शन करानेके लिये; **तत्=**उस आवरणको; **त्वम्=**आप; **अपावृणु=**हटा लीजिये॥ १५॥

**व्याख्या—**भक्त इस प्रकार प्रार्थना करे कि 'हे भगवन् ! आप अखिल ब्रह्माण्डके पोषक हैं, आपसे ही सबको पुष्टि प्राप्त होती है। आपकी भक्ति ही सत्यधर्म है और मैं उसमें लगा हुआ हूँ; अतएव मेरी पुष्टि—मेरे मनोरथकी पूर्ति तो आप अवश्य ही करेंगे। आपका दिव्य श्रीमुख—सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशमय सूर्यमण्डलकी चमचमाती हुई ज्योतिर्मयी यवनिकासे आवृत्त है। मैं आपका निरावरण—प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूँ, अतएव आपके पास पहुँचकर आपका निरावरण—दर्शन करनेमें बाधा देनेवाले जितने भी, जो भी आवरण—प्रतिबन्धक हों, उन सबको मेरे लिये आप हटा लीजिये! अपने सच्चिदानन्दस्वरूपको प्रत्यक्ष प्रकट कीजिये'॥ १५॥

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजा-
पत्य व्यूह रश्मीन्समूह।
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि॥ १६॥

**पूषन्=**हे भक्तोंका पोषण करनेवाले; **एकर्षे=**हे मुख्य ज्ञानस्वरूप; **यम=**हे सबके नियन्ता; **सूर्य=**हे भक्तों या ज्ञानियों (सूरियों) के परम लक्ष्यरूप; **प्राजापत्य=**हे प्रजापतिके प्रिय; **रश्मीन्=**इन रश्मियोंको; **व्यूह=**एकत्र कीजिये या हटा लीजिये; **तेजः=**इस तेजको; **समूह=**समेट लीजिये या अपने तेजमें मिला लीजिये; **यत्=**जो; **ते=**आपका; **कल्याणतमम्=**अतिशय कल्याणमय; **रूपम्=**दिव्य स्वरूप है; **तत्=**उस; **ते=**आपके दिव्य स्वरूपको; **पश्यामि=**मैं आपकी कृपासे ध्यानके द्वारा देख रहा हूँ; **यः=**जो; **असौ=**वह (सूर्यका आत्मा) है;