ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 36, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ९
(जो) कविः=सर्वद्रष्टा; मनीषी=सर्वज्ञ एवं ज्ञानस्वरूप; परिभूः=सर्वोपरि विद्यमान एवं सर्वनियन्ता; स्वयम्भूः=स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं (और); शाश्वतीभ्यः=अनादि; समाभ्यः=कालसे; याथातथ्यतः=सब प्राणियोंके कर्मानुसार यथायोग्य; अर्थान्=सम्पूर्ण पदार्थोंकी; व्यदधात्=रचना करते आये हैं॥ ८॥
**व्याख्या—**उपर्युक्त वर्णनके अनुसार परमेश्वरको सर्वत्र जानने-देखनेवाला महापुरुष उन परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वेश्वरको प्राप्त होता है, जो शुभाशुभ कर्मजनित प्राकृत सूक्ष्म देह तथा पाञ्चभौतिक अस्थि-शिरा-मांसादिमय षड्विकारयुक्त स्थूल देहसे रहित, छिद्ररहित, दिव्य शुद्ध सच्चिदानन्दघन हैं; एवं जो क्रान्तदर्शी—सर्वद्रष्टा हैं, सबके ज्ञाता, सबको अपने नियन्त्रणमें रखनेवाले सर्वाधिपति हैं; और कर्मपरवश नहीं वरं स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं तथा जो सनातन कालसे सब प्राणियोंके लिये उनके कर्मानुसार समस्त पदार्थोंकी यथायोग्य रचना और विभागव्यवस्था करते आये हैं॥ ८॥
सम्बन्ध— अब अगले तीन मन्त्रोंमें विद्या और अविद्याका तत्त्व समझाया जायगा। इस प्रकरणमें परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिके साधन 'ज्ञान' को विद्याके नामसे कहा गया है और स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति अथवा इस लोकके विविध भोगैश्वर्यकी प्राप्तिके साधन 'कर्म'को अविद्याके नामसे। इन ज्ञान और कर्म—दोनोंके तत्त्वको भलीभाँति समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य ही इन दोनों साधनोंके द्वारा सर्वोत्तम तथा वास्तविक फल प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं—इस रहस्यको समझानेके लिये पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं—
अन्धंतमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया ँ रताः॥ ९॥
ये=जो मनुष्य; अविद्याम्=अविद्याकी; उपासते=उपासना करते हैं, (वे); अन्धम्=अज्ञानस्वरूप; तमः=घोर अन्धकारमें; प्रविशन्ति=प्रवेश करते हैं; (और) ये=जो मनुष्य; विद्यायाम्=विद्यामें; रताः=रत हैं अर्थात् ज्ञानके मिथ्याभिमानमें मत्त हैं; ते=वे; ततः=उससे; उ=भी; भूयः इव=मानो अधिकतर; तमः=अन्धकारमें (प्रवेश करते हैं)॥ ९॥