ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 35, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र ८ ] ईशावास्योपनिषद् ३३
यस्मिन्=जिस स्थितिमें; विजानतः=परब्रह्म परमेश्वरको भलीभाँति जाननेवाले महापुरुषके (अनुभवमें); सर्वाणि=सम्पूर्ण; भूतानि=प्राणी; आत्मा=एकमात्र परमात्मस्वरूप; एव=ही; अभूत्=हो चुकते हैं; तत्र=उस अवस्थामें (उस); एकत्वम्=एकताका—एकमात्र परमेश्वरका; अनुपश्यतः=निरन्तर साक्षात् करनेवाले पुरुषके लिये; कः=कौन-सा; मोहः=मोह (रह जाता है और); कः=कौन-सा; शोकः=शोक। (वह शोक-मोहसे सर्वथा रहित, आनन्दपरिपूर्ण हो जाता है) ॥ ७ ॥
व्याख्या— इस प्रकार जब मनुष्य परमात्माको भलीभाँति पहचान लेता है, जब उसकी सर्वत्र भगवद्दृष्टि हो जाती है—जब वह प्राणिमात्रमें एकमात्र तत्त्व श्रीपरमात्माको ही देखता है, तब उसे सदा-सर्वत्र परमात्माके दर्शन होते रहते हैं। उस समय उसके अन्तःकरणमें शोक, मोह आदि विकार कैसे रह सकते हैं ? वह तो इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि शोक-मोहादि विकारोंकी छाया भी कहीं उसके चित्तप्रदेशमें नहीं रह जाती। लोगोंके देखनेमें वह सब कुछ करता हुआ भी वस्तुतः अपने प्रभुमें ही क्रीडा करता है (गीता ६। ३१)। उसके लिये प्रभु और प्रभुकी लीलाके अतिरिक्त अन्य कुछ रह ही नहीं जाता ॥ ७ ॥
सम्बन्ध— अब इस प्रकार परमप्रभु परमेश्वरको तत्त्वसे जाननेका तथा सर्वत्र देखनेका फल बतलाते हैं—
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण- मस्नाविरँ शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतो- ऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥
सः=वह महापुरुष; शुक्रम्=(उन) परम तेजोमय; अकायम्=सूक्ष्मशरीरसे रहित; अव्रणम्=छिद्ररहित या क्षतरहित; अस्नाविरम्=शिराओंसे रहित—स्थूल पाञ्चभौतिक शरीरसे रहित; शुद्धम्=अप्राकृत दिव्य सच्चिदानन्दस्वरूप; अपापविद्धम्=शुभाशुभकर्म-सम्पर्कशून्य परमेश्वरको; पर्यगात्=प्राप्त हो जाता है;