ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ६-७
अचल स्थित हैं, यह उनका न चलना है। इसी प्रकार वे श्रद्धा-प्रेमसे रहित मनुष्योंको कभी दर्शन नहीं देते, अतः उनके लिये दूर-से-दूर हैं; और प्रेमकी पुकार सुनते ही जिन प्रेमीजनोंके सामने चाहे जहाँ उसी क्षण प्रकट हो जाते हैं, उनके लिये वे समीप-से-समीप हैं। इसके अतिरिक्त वे सदा-सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिये दूर-से-दूर भी वे ही हैं और समीप-से-समीप भी वे ही हैं; क्योंकि ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ वे न हों। सबके अन्तर्यामी होनेके कारण भी वे अत्यन्त समीप हैं; पर जो अज्ञानी लोग उन्हें इस रूपमें नहीं पहचानते, उनके लिये वे बहुत दूर हैं (गीता १३। १५)। वस्तुतः वे इस समस्त जगत्के परम आधार हैं और परम कारण वे ही हैं; इसलिये बाहर-भीतर सभी जगह वे ही परिपूर्ण हैं (गीता ७। ७) ॥ ५ ॥
सम्बन्ध— अब अगले दो मन्त्रोंमें इन परब्रह्म परमेश्वरको जाननेवाले महापुरुषकी स्थितिका वर्णन किया जाता है—
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥
**तु=**परन्तु; **यः=**जो मनुष्य; **सर्वाणि=**सम्पूर्ण; **भूतानि=**प्राणियोंको; **आत्मनि=**परमात्मामें; **एव=**ही; **अनुपश्यति=**निरन्तर देखता है; **च=**और; **सर्वभूतेषु=**सम्पूर्ण प्राणियोंमें; **आत्मानम्=**परमात्माको (देखता है); **ततः=**उसके पश्चात् (वह कभी भी); **न विजुगुप्सते=**किसीसे घृणा नहीं करता ॥ ६ ॥
व्याख्या— इस प्रकार जो मनुष्य प्राणिमात्रको सर्वाधार परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मामें देखता है और सर्वान्तर्यामी परम प्रभु परमात्माको प्राणिमात्रमें देखता है, वह कैसे किससे घृणा या द्वेष कर सकता है। वह तो सदा-सर्वत्र अपने परम प्रभुके ही दर्शन करता हुआ (गीता ६। २९-३०)। मन-ही-मन सबको प्रणाम करता रहता है तथा सबकी सब प्रकारसे सेवा करना और उन्हें सुख पहुँचाना चाहता है ॥ ६ ॥
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥