भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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मन्त्र १३ ] ईशावास्योपनिषद् ३९

लोकोंको और विभिन्न भोगयोनियोंको प्राप्त होते हैं। यही उनका अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है। (गीता ७।२० से २३)

दूसरे जो मनुष्य शास्त्रके तात्पर्यको तथा भगवान्‌के दिव्य गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यको न समझनेके कारण न तो भगवान्‌का भजन-ध्यान ही करते हैं और न श्रद्धाका अभाव तथा भोगोंमें आसक्ति होनेके कारण लोकसेवा और शास्त्रविहित देवोपासनामें ही प्रवृत्त होते हैं, ऐसे वे विषयासक्त मनुष्य झूठ-मूठ ही अपनेको ईश्वरोपासक बतलाकर सरलहृदय जनतासे अपनी पूजा कराने लगते हैं। ये लोग मिथ्याभिमानके कारण देवताओंको तुच्छ बतलाते हैं और शास्त्रानुसार आवश्यकर्तव्य देवपूजा तथा गुरुजनोंका सम्मान-सत्कार करना भी छोड़ देते हैं। इतना ही नहीं, दूसरोंको भी अपने वाग्जालमें फँसाकर उनके मनोंमें भी देवोपासना आदिके प्रति अश्रद्धा उत्पन्न कर देते हैं। ये लोग अपनेको ही ईश्वरके समकक्ष मानते-मनवाते हुए मनमाने दुराचरणमें प्रवृत्त हो जाते हैं। ऐसे दम्भी मनुष्योंको अपने दुष्कर्मोंका कुफल भोगनेके लिये बाध्य होकर कूकर-शूकर आदि नीच योनियोंमें और रौरव-कुम्भीपाकादि नरकोंमें जाकर भीषण यन्त्रणाएँ भोगनी पड़ती हैं। यही उनका विनाशशील देवताओंकी उपासना करनेवालोंकी अपेक्षा भी अधिकतर घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है (गीता १६। १८-१९) ॥ १२ ॥

**सम्बन्ध—**शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर सम्भूति और असम्भूतिकी उपासना करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, अब संकेतसे उसका वर्णन करते हैं—

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३ ॥

सम्भवात्=अविनाशी ब्रह्मकी उपासनासे; अन्यत् एव=दूसरा ही फल; आहुः=बतलाते हैं; (और) असम्भवात्=विनाशशील देव-पितर-मनुष्य आदिकी उपासनासे; अन्यत्=दूसरा (ही) फल; आहुः=बतलाते हैं; इति=इस प्रकार; (हमने) धीराणाम्=(उन) धीर पुरुषोंके; शुश्रुम=वचन सुने हैं; ये=जिन्होंने; नः=हमें; तत्=उस विषयको; विचचक्षिरे=व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥ १३॥