भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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३८ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १२

सम्बन्ध— अब अगले तीन मन्त्रोंमें असम्भूति और सम्भूतिका तत्त्व बतलाया जायगा। इस प्रकरणमें 'असम्भूति' शब्दका अर्थ है— जिनकी पूर्णरूपसे सत्ता न हो, ऐसी विनाशशील देव, पितर और मनुष्यादि योनियाँ एवं उनकी भोग-सामग्रियाँ। इसीलिये चौदहवें मन्त्रमें 'असम्भूति' के स्थानपर स्पष्टतया 'विनाश' शब्दका प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार सम्भूति शब्दका अर्थ है—जिसकी सत्ता पूर्णरूपसे हो वह सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाला अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता ७। ६-७)।

देव, पितर और मनुष्यादिकी उपासना किस प्रकार करनी चाहिये और अविनाशी परब्रह्मकी किस प्रकार—इस तत्त्वको समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य ही उनके सर्वोत्तम फलोंको प्राप्त हो सकते हैं, अन्यथा नहीं। इस भावको समझानेके लिये पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं—

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याँरताः॥ १२॥

ये=जो मनुष्य; असम्भूतिम्=विनाशशील देव-पितर-मनुष्य आदिकी; उपासते=उपासना करते हैं; (ते)=वे; अन्धम्=अज्ञानरूप; तमः=घोर अन्धकारमें; प्रविशन्ति=प्रवेश करते हैं; (और) ये=जो; सम्भूत्याम्= अविनाशी परमेश्वरमें; रताः=रत हैं अर्थात् उनकी उपासनाके मिथ्याभिमानमें मत्त हैं; ते=वे; ततः=उनसे; =भी; भूयः इव=मानो अधिकतर; तमः=अन्धकारमें (प्रवेश करते हैं)॥ १२॥

**व्याख्या—**जो मनुष्य विनाशशील स्त्री, पुत्र, धन, मान, कीर्ति, अधिकार आदि इस लोक और परलोककी भोग-सामग्रियोंमें आसक्त होकर उन्हींको सुखका हेतु समझते हैं तथा उन्हींके अर्जन-सेवनमें सदा संलग्न रहते हैं एवं इन भोग-सामग्रियोंकी प्राप्ति, संरक्षण तथा वृद्धिके लिये उन विभिन्न देवता, पितर और मनुष्यादिकी उपासना करते हैं, जो स्वयं जन्म-मरणके चक्रमें पड़े हुए होनेके कारण अभावग्रस्त और शरीरकी दृष्टिसे विनाशशील हैं, उनके उपासक वे भोगासक्त मनुष्य अपनी उपासनाके फलस्वरूप विभिन्न देवताओंके