ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 29, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
ईशावास्योपनिषद्
यह ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वशाखीय संहिताका चालीसवाँ अध्याय है। मन्त्र-भागका अंश होनेसे इसका विशेष महत्त्व है। इसीको सबसे पहला उपनिषद् माना जाता है। शुक्लयजुर्वेदके प्रथम उनतालीस अध्यायोंमें कर्मकाण्डका निरूपण हुआ है। यह उस काण्डका अन्तिम अध्याय है और इसमें भगवत्तत्त्वरूप ज्ञानकाण्डका निरूपण किया गया है। इसके पहले मन्त्रमें ‘ईशा-वास्यम्’ वाक्य आनेसे इसका नाम ‘ईशावास्य’ माना गया है।
शान्तिपाठ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥*
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
ॐ=सच्चिदानन्दघन; अदः=वह परब्रह्म; पूर्णम्=सब प्रकारसे पूर्ण है; इदम्=यह (जगत् भी); पूर्णम्=पूर्ण (ही) है; (क्योंकि) पूर्णात्=उस पूर्ण (परब्रह्म)-से ही; पूर्णम्=यह पूर्ण; उदच्यते=उत्पन्न हुआ है; पूर्णस्य=पूर्णके; पूर्णम्=पूर्णको; आदाय=निकाल लेनेपर (भी); पूर्णम्=पूर्ण; एव=ही; अवशिष्यते=बच रहता है।
व्याख्या— वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पुरुषोत्तम सब प्रकारसे सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत् भी उस परब्रह्मसे ही पूर्ण है; क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तमसे ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्मकी पूर्णतासे जगत् पूर्ण है, इसलिये भी वह परिपूर्ण है। उस पूर्ण ब्रह्ममेंसे पूर्णको निकाल लेनेपर भी वह पूर्ण ही बच रहता है।
त्रिविध तापकी शान्ति हो।
* यह मन्त्र बृहदारण्यक-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके प्रथम ब्राह्मणकी प्रथम कण्डिकाका पूर्वार्द्धरूप है।