ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 30, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें२८ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १-२
ॐ ईशा वास्यमिदꣳ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्॥ १॥
जगत्याम्=अखिल ब्रह्माण्डमें; यत् किं च=जो कुछ भी; जगत्=जड-चेतनस्वरूप जगत् है; इदम्=यह; सर्वम्=समस्त; ईशा=ईश्वरसे; वास्यम्=व्याप्त है; तेन=उस ईश्वरको साथ रखते हुए; त्यक्तेन=त्यागपूर्वक; भुञ्जीथाः=(इसे) भोगते रहो; मा गृधः=(इसमें) आसक्त मत होओ; (क्योंकि) धनम्=धन-भोग्य-पदार्थ; कस्य स्वित्=किसका है अर्थात् किसीका भी नहीं है॥ १॥
व्याख्या—मनुष्योंके प्रति वेदभगवान्का पवित्र आदेश है कि अखिल विश्व-ब्रह्माण्डमें जो कुछ भी यह चराचरात्मक जगत् तुम्हारे देखने-सुननेमें आ रहा है, सब-का-सब सर्वाधार, सर्वनियन्ता, सर्वाधिपति, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वकल्याणगुणस्वरूप परमेश्वरसे व्याप्त है; सदा-सर्वत्र उन्हींसे परिपूर्ण है (गीता ९।४)। इसका कोई भी अंश उनसे रहित नहीं है (गीता १०। ३९, ४२)। यों समझकर उन ईश्वरको निरन्तर अपने साथ रखते हुए—सदा-सर्वदा उनका स्मरण करते हुए ही तुम इस जगत्में ममता और आसक्तिका त्याग करके केवल कर्तव्य-पालनके लिये ही विषयोंका यथाविधि उपभोग करो अर्थात्—विश्वरूप ईश्वरकी पूजाके लिये ही कर्मोंका आचरण करो। विषयोंमें मनको मत फँसने दो, इसीमें तुम्हारा निश्चित कल्याण है (गीता २।६४; ३।९; १८।४६)। वस्तुतः ये भोग्य-पदार्थ किसीके भी नहीं हैं। मनुष्य भूलसे ही इनमें ममता और आसक्ति कर बैठता है। ये सब परमेश्वरके हैं और उन्हींकी प्रसन्नताके लिये इनका उपयोग होना चाहिये॥ १॥
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतꣳ समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ २॥
इह=इस जगत्में; कर्माणि=शास्त्रनियत कर्मोंको; कुर्वन्=(ईश्वरपूजार्थ) करते हुए; एव=ही; शतम् समाः=सौ वर्षोंतक; जिजीविषेत्=जीनेकी इच्छा करनी चाहिये; एवम्=इस प्रकार (त्यागभावसे, परमेश्वरके लिये); कर्म=किये जानेवाले कर्म; त्वयि=तुझ; नरे=मनुष्यमें; न लिप्यते=लिप्त नहीं होंगे; इतः=इससे (भिन्न);