ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 31, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र ३ ] ईशावास्योपनिषद् २९
अन्यथा=अन्य कोई प्रकार अर्थात् मार्ग; न अस्ति=नहीं है (जिससे कि मनुष्य कर्म-बन्धनसे मुक्त हो सके) ॥ २ ॥
व्याख्या—पूर्व मन्त्रके कथनानुसार जगत्के एकमात्र कर्ता, भर्ता, हर्ता, सर्वशक्तिमान्, सर्वमय परमेश्वरका सतत स्मरण रखते हुए सब कुछ उन्हींका समझकर उन्हींकी पूजाके लिये शास्त्रनियत कर्तव्यकर्मोंका आचरण करते हुए ही सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करो—इस प्रकार अपने पूरे जीवनको परमेश्वरके प्रति समर्पण कर दो। ऐसा समझो कि शास्त्रोक्त स्वकर्मका आचरण करते हुए जीवन-निर्वाह करना केवल परमेश्वरकी पूजाके लिये ही है, अपने लिये नहीं—भोग भोगनेके लिये नहीं। यों करनेसे वे कर्म तुझे बन्धनमें नहीं डाल सकेंगे। कर्म करते हुए कर्मोंसे लिप्त न होनेका यही एकमात्र मार्ग है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी मार्ग कर्मबन्धनसे मुक्त होनेका नहीं है (गीता २।५०,५१; ५।१०) ॥२॥
सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मफलरूप जन्मबन्धनसे मुक्त होनेके निश्चित मार्गका निर्देश करके अब इसके विपरीत मार्गपर चलनेवाले मनुष्योंकी गतिका वर्णन करते हैं—
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥
असुर्याः=असुरोंके; (जो) नाम=प्रसिद्ध; लोकाः=नाना प्रकारकी योनियाँ एवं नरकरूप लोक हैं; ते=वे सभी; अन्धेन तमसा=अज्ञान तथा दुःख-क्लेशरूप महान् अन्धकारसे; आवृताः=आच्छादित हैं; ये के च=जो कोई भी; आत्महनः=आत्माकी हत्या करनेवाले; जनाः=मनुष्य हों; ते=वे; प्रेत्य=मरकर; तान्=उन्हीं भयंकर लोकोंको; अभिगच्छन्ति=बार-बार प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥
व्याख्या—मानव-शरीर अन्य सभी शरीरोंसे श्रेष्ठ और परम दुर्लभ है एवं वह जीवको भगवान्की विशेष कृपासे जन्म-मृत्युरूप संसार-समुद्रसे तरनेके लिये ही मिलता है। ऐसे शरीरको पाकर भी जो मनुष्य अपने कर्मसमूहको ईश्वर-पूजाके लिये समर्पण नहीं करते और कामोपभोगको ही जीवनका परम ध्येय मानकर विषयोंकी आसक्ति और कामनावश जिस-