भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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३० ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ४

किसी प्रकारसे भी केवल विषयोंकी प्राप्ति और उनके यथेच्छ उपभोगमें ही लगे रहते हैं; वे वस्तुतः आत्माकी हत्या करनेवाले ही हैं; क्योंकि इस प्रकार अपना पतन करनेवाले वे लोग अपने जीवनको केवल व्यर्थ ही नहीं खो रहे हैं वरं अपनेको और भी अधिक कर्मबन्धनमें जकड़ रहे हैं। इन काम-भोग-परायण लोगोंको—चाहे वे कोई भी क्यों न हों, उन्हें चाहे संसारमें कितने ही विशाल नाम, यश, वैभव या अधिकार प्राप्त हों, मरनेके बाद कर्मोंके फलस्वरूप बार-बार उन कूकर-शूकर, कीट, पतंगादि विभिन्न शोक-संतापपूर्ण आसुरी योनियोंमें और भयानक नरकोंमें भटकना पड़ता है (गीता १६। १६, १९, २०), जो कि ऐसे आसुरी स्वभाववाले दुष्टोंके लिये निश्चित किये हुए हैं और महान् अज्ञानरूप अन्धकारसे आच्छादित हैं। इसीलिये श्रीभगवान्‌ने गीतामें कहा है कि मनुष्यको अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये, अपना पतन नहीं करना चाहिये (६। ५)॥ ३॥

सम्बन्ध— जो परमेश्वर सम्पूर्ण जगत्‌में व्याप्त हैं, जिनका सतत स्मरण करते हुए तथा जिनकी पूजाके लिये ही समस्त कर्म करने चाहिये, वे कैसे हैं—इस जिज्ञासापर कहते हैं—

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥ ४॥

( तत् )=वे परमेश्वर; अनेजत्=अचल; एकम्=एक; (और) मनसः=मनसे (भी); जवीयः=अधिक तीव्र गतियुक्त हैं; पूर्वम्=सबके आदि; अर्षत्=ज्ञानस्वरूप या सबके जाननेवाले हैं; एनत्=इन परमेश्वरको; देवाः=इन्द्रादि देवता भी; न आप्नुवन्=नहीं पा सके या जान सके हैं; तत्=वे (परब्रह्म पुरुषोत्तम); अन्यान्=दूसरे; धावतः=दौड़नेवालोंको; तिष्ठत्=(स्वयं) स्थित रहते हुए ही; अत्येति=अतिक्रमण कर जाते हैं; तस्मिन्=उनके होनेपर ही—उन्हींकी सत्ता-शक्तिसे; मातरिश्वा=वायु आदि देवता; अपः=जलवर्षा आदि क्रिया; दधाति=सम्पादन करनेमें समर्थ होते हैं॥ ४॥

व्याख्या— वे सर्वान्तर्यामी सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अचल और एक हैं,