ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १६
**पूषन्=**हे सबका भरण-पोषण करनेवाले परमेश्वर; **सत्यस्य=**सत्यस्वरूप आप सर्वेश्वरका; **मुखम्=**श्रीमुख; **हिरण्मयेन=**ज्योतिर्मय सूर्यमण्डलरूप; **पात्रेण=**पात्रसे; **अपिहितम्=**ढका हुआ है; **सत्यधर्माय=**आपकी भक्तिरूप सत्यधर्मका अनुष्ठान करनेवाले मुझको; **दृष्टये=**अपने दर्शन करानेके लिये; **तत्=**उस आवरणको; **त्वम्=**आप; **अपावृणु=**हटा लीजिये॥ १५॥
**व्याख्या—**भक्त इस प्रकार प्रार्थना करे कि 'हे भगवन् ! आप अखिल ब्रह्माण्डके पोषक हैं, आपसे ही सबको पुष्टि प्राप्त होती है। आपकी भक्ति ही सत्यधर्म है और मैं उसमें लगा हुआ हूँ; अतएव मेरी पुष्टि—मेरे मनोरथकी पूर्ति तो आप अवश्य ही करेंगे। आपका दिव्य श्रीमुख—सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशमय सूर्यमण्डलकी चमचमाती हुई ज्योतिर्मयी यवनिकासे आवृत्त है। मैं आपका निरावरण—प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूँ, अतएव आपके पास पहुँचकर आपका निरावरण—दर्शन करनेमें बाधा देनेवाले जितने भी, जो भी आवरण—प्रतिबन्धक हों, उन सबको मेरे लिये आप हटा लीजिये! अपने सच्चिदानन्दस्वरूपको प्रत्यक्ष प्रकट कीजिये'॥ १५॥
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजा-
पत्य व्यूह रश्मीन्समूह।
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि॥ १६॥
**पूषन्=**हे भक्तोंका पोषण करनेवाले; **एकर्षे=**हे मुख्य ज्ञानस्वरूप; **यम=**हे सबके नियन्ता; **सूर्य=**हे भक्तों या ज्ञानियों (सूरियों) के परम लक्ष्यरूप; **प्राजापत्य=**हे प्रजापतिके प्रिय; **रश्मीन्=**इन रश्मियोंको; **व्यूह=**एकत्र कीजिये या हटा लीजिये; **तेजः=**इस तेजको; **समूह=**समेट लीजिये या अपने तेजमें मिला लीजिये; **यत्=**जो; **ते=**आपका; **कल्याणतमम्=**अतिशय कल्याणमय; **रूपम्=**दिव्य स्वरूप है; **तत्=**उस; **ते=**आपके दिव्य स्वरूपको; **पश्यामि=**मैं आपकी कृपासे ध्यानके द्वारा देख रहा हूँ; **यः=**जो; **असौ=**वह (सूर्यका आत्मा) है;