भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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मन्त्र १७ ] ईशावास्योपनिषद् ४३


असौ=वह; पुरुषः=परम पुरुष (आपका ही स्वरूप है); अहम्=मैं (भी); सः अस्मि=वही हूँ॥ १६ ॥

व्याख्या—भगवन्! आप अपनी सहज कृपासे भक्तोंके भक्ति-साधनमें दृष्टि प्रदान करके उनका पोषण करनेवाले हैं; आप समस्त ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, परम ज्ञानस्वरूप तथा अपने भक्तोंको अपने स्वरूपका यथार्थ ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं (गीता १०। ११); आप सबका यथायोग्य नियमन, नियन्त्रण और शासन करनेवाले हैं; आप ही भक्तों या ज्ञानी महापुरुषोंके लक्ष्य हैं और अविज्ञेय होनेपर भी अपने भक्तवत्सल स्वभावके कारण भक्तिके द्वारा उनके जाननेमें आ जाते हैं; आप प्रजापतिके भी प्रिय हैं। हे प्रभो! इस सूर्यमण्डलकी तप्त रश्मियोंको एकत्र करके अपनेमें लुप्त कर लीजिये। इसके उग्र तेजको समेटकर अपनेमें मिला लीजिये और मुझे अपने दिव्यस्वरूपके प्रत्यक्ष दर्शन कराइये। अभी तो मैं आपकी कृपासे आपके सौन्दर्य-माधुर्य-निधि दिव्य परम कल्याणमय सच्चिदानन्दस्वरूपका ध्यान-दृष्टिसे दर्शन कर रहा हूँ; साथ ही बुद्धिके द्वारा समझ भी रहा हूँ कि जो आप परम पुरुष इस सूर्यके और समस्त विश्वके आत्मा हैं, वही मेरे भी आत्मा हैं; अतः मैं भी वही हूँ॥ १६॥

सम्बन्धध्यानके द्वारा भगवान्‌के दिव्य मङ्गलमय स्वरूपके दर्शन करता हुआ साधक अब भगवान्‌की साक्षात् सेवामें पहुँचनेके लिये व्यग्र हो रहा है और शरीरका त्याग करते समय सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरके सर्वथा विघटनकी भावना करता हुआ भगवान्‌से प्रार्थना करता है—

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त ूँ शरीरम्।

ॐक्रतो स्मर कृत ूँ स्मर क्रतो स्मर कृत ूँ स्मर ॥ १७ ॥

अथ=अब; वायुः=ये प्राण और इन्द्रियाँ; अमृतम्=अविनाशी; अनिलम्=समष्टि वायु-तत्त्वमें; (प्रविशतु)=प्रविष्ट हो जायें; इदम्=यह; शरीरम्=स्थूल शरीर; भस्मान्तम्=अग्निमें जलकर भस्मरूप; (भूयात्)=हो जाय; =हे सच्चिदानन्दघन;