ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 290, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मन्त्र ५ ]
अवस्थाकी अपेक्षा कम हो जाता है; किंतु यहाँ जिसका वर्णन तैजसके नामसे किया गया है, उस दूसरे पादरूप हिरण्यगर्भका ज्ञान जाग्रत्की अपेक्षा अधिक विकसित होता है। इसलिये इसको तैजस अर्थात् ज्ञानस्वरूप बतलाया है और दसवें मन्त्रमें ओंकारकी दूसरी मात्रा 'उ' के साथ इसकी एकता करते हुए इसको उत्कृष्ट (श्रेष्ठ) बताया है और इसके जाननेका फल ज्ञान-परम्पराकी वृद्धि और जाननेवालेकी संतानका ज्ञानी होना कहा है। स्वप्नाभिमानी जीवात्माके ज्ञानका ऐसा फल नहीं हो सकता, इसलिये भी तैजसका वाच्यार्थ सूक्ष्म जगत्के स्वामी हिरण्यगर्भको ही मानना युक्तिसंगत प्रतीत होता है ॥ ४ ॥
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम्। सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्तेतमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥
यत्र=जिस अवस्थामें; सुप्तः=सोया हुआ (मनुष्य); कञ्चन=किसी भी; कामम् न कामयते=भोगकी कामना नहीं करता; कञ्चन=कोई भी; स्वप्नम्=स्वप्न; न=नहीं; पश्यति=देखता; तत्=वह; सुषुप्तम्=सुषुप्ति-अवस्था है; सुषुप्तस्थानः=ऐसी सुषुप्तिकी भाँति जो जगत्की प्रलय-अवस्था अर्थात् कारण-अवस्था है, वही जिसका शरीर है; एकीभूतः=जो एकरूप हो रहा है; प्रज्ञानघनः एव=जो एकमात्र घनीभूत विज्ञानस्वरूप है; आनन्दमयः हि=जो एकमात्र आनन्दमय अर्थात् आनन्दस्वरूप ही है; चेतोमुखः=प्रकाश ही जिसका मुख है; आनन्दभुक्=जो एकमात्र आनन्दका ही भोक्ता है (वह); प्राज्ञः=प्राज्ञ; तृतीयः पादः=(ब्रह्मका) तीसरा पाद है ॥ ५ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें जाग्रत्की कारण और लय-अवस्थारूप सुषुप्तिके साथ प्रलयकालमें कारणरूपसे स्थित जगत्की समानता दिखानेके लिये पहले सुप्रसिद्ध सुषुप्ति-अवस्थাকে लक्षण बतलाकर उनके बाद पूर्णब्रह्म परमात्माके तीसरे पादका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि जिस अवस्थामें सोया हुआ मनुष्य किसी प्रकारके किसी भी भोगकी न तो कामना करता है और न अनुभव