भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 289

मन्त्र ४]

माण्डूक्योपनिषद्

२८७

प्रज्ञः =जिसका ज्ञान संकल्पमय सूक्ष्म जगत्में व्याप्त है; समाङ्गः =पूर्वोक्त सात अङ्गोंवाला (और); एकोनविंशतिमुखः =उन्नीस मुखोंवाला; प्रविक्त्तभुक् =सूक्ष्म जगत्का भोक्ता; तैजसः =तैजस—प्रकाशका स्वामी सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ; द्वितीयः पादः =उस परब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है॥४॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें पूर्णब्रह्म परमात्माके दूसरे पादका वर्णन है। भाव यह है कि जिस प्रकार स्वप्न-अवस्थामें सूक्ष्मशरीरका अभिमानी जीवात्मा पहले बतलाये हुए सूक्ष्म सात अङ्गोंवाला और उन्नीस मुखोंवाला होकर सूक्ष्म विषयोंका उपभोग करता है और उसीमें उसका ज्ञान फैला रहता है, उसी प्रकार जो स्थूल अवस्थासे भिन्न सूक्ष्मरूपमें परिणत हुए सात लोकरूप सात अङ्ग तथा इन्द्रिय, प्राण और अन्तःकरणरूप उन्नीस मुखोंसे युक्त सूक्ष्म जगत्-रूप शरीरमें स्थित, उसका आत्मा हिरण्यगर्भ है, वह समस्त जडचेतनात्मक सूक्ष्म जगत्के समस्त तत्त्वोंका नियन्ता, ज्ञाता और सबको अपनेमें प्रविष्ट किये हुए है, इसलिये उसका भोक्ता और जाननेवाला कहा जाता है। वह तैजस अर्थात् सूक्ष्म प्रकाशमय हिरण्यगर्भ उन पूर्णब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है।

समस्त ज्योतियोंकी ज्योति, सबको प्रकाशित करनेवाले, परम प्रकाशमय हिरण्यगर्भरूप परमेश्वरका ही वर्णन यहाँ तैजस नामसे हुआ है, ब्रह्मसूत्रके ‘ज्योतिश्चरणाभिधानात्’ (१।१।२४) इस सूत्रमें यह बात स्पष्ट की गयी है कि पुरुषके प्रकरणमें आया हुआ ‘ज्योतिः’ वा ‘तेजः’ शब्द ब्रह्मका वाचक ही समझना चाहिये। जहाँ ब्रह्मके पादोंका वर्णन हो, वहाँ तो दूसरा अर्थ—जीव या प्रकाश आदि मानना किसी तरह भी उचित नहीं है। उपनिषदोंमें बहुत जगह परमेश्वरका वर्णन ‘ज्योतिः, (अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते—छा० उ० ३।१३।७) और ‘तेजस्’ (येन सूर्यस्तपति तेजसेन्द्रः—तै० ब्रा० ३।१२।१।७) के नामसे हुआ है। इसलिये यहाँ केवल ‘स्वप्नस्थानः’ पदके बलपर स्वप्नावस्थाके अभिमानी जीवात्माको ब्रह्मका दूसरा पाद मान लेना उचित नहीं मालूम होता। इसमें तीसरे मन्त्रकी व्याख्यामें बताये हुए कारण तो हैं ही। उनके सिवा यह एक कारण और भी है कि स्वप्नावस्थामें जीवात्माका ज्ञान जाग्रत्-