ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
मन्त्र ४]
माण्डूक्योपनिषद्
२८७
प्रज्ञः =जिसका ज्ञान संकल्पमय सूक्ष्म जगत्में व्याप्त है; समाङ्गः =पूर्वोक्त सात अङ्गोंवाला (और); एकोनविंशतिमुखः =उन्नीस मुखोंवाला; प्रविक्त्तभुक् =सूक्ष्म जगत्का भोक्ता; तैजसः =तैजस—प्रकाशका स्वामी सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ; द्वितीयः पादः =उस परब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है॥४॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें पूर्णब्रह्म परमात्माके दूसरे पादका वर्णन है। भाव यह है कि जिस प्रकार स्वप्न-अवस्थामें सूक्ष्मशरीरका अभिमानी जीवात्मा पहले बतलाये हुए सूक्ष्म सात अङ्गोंवाला और उन्नीस मुखोंवाला होकर सूक्ष्म विषयोंका उपभोग करता है और उसीमें उसका ज्ञान फैला रहता है, उसी प्रकार जो स्थूल अवस्थासे भिन्न सूक्ष्मरूपमें परिणत हुए सात लोकरूप सात अङ्ग तथा इन्द्रिय, प्राण और अन्तःकरणरूप उन्नीस मुखोंसे युक्त सूक्ष्म जगत्-रूप शरीरमें स्थित, उसका आत्मा हिरण्यगर्भ है, वह समस्त जडचेतनात्मक सूक्ष्म जगत्के समस्त तत्त्वोंका नियन्ता, ज्ञाता और सबको अपनेमें प्रविष्ट किये हुए है, इसलिये उसका भोक्ता और जाननेवाला कहा जाता है। वह तैजस अर्थात् सूक्ष्म प्रकाशमय हिरण्यगर्भ उन पूर्णब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है।
समस्त ज्योतियोंकी ज्योति, सबको प्रकाशित करनेवाले, परम प्रकाशमय हिरण्यगर्भरूप परमेश्वरका ही वर्णन यहाँ तैजस नामसे हुआ है, ब्रह्मसूत्रके ‘ज्योतिश्चरणाभिधानात्’ (१।१।२४) इस सूत्रमें यह बात स्पष्ट की गयी है कि पुरुषके प्रकरणमें आया हुआ ‘ज्योतिः’ वा ‘तेजः’ शब्द ब्रह्मका वाचक ही समझना चाहिये। जहाँ ब्रह्मके पादोंका वर्णन हो, वहाँ तो दूसरा अर्थ—जीव या प्रकाश आदि मानना किसी तरह भी उचित नहीं है। उपनिषदोंमें बहुत जगह परमेश्वरका वर्णन ‘ज्योतिः, (अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते—छा० उ० ३।१३।७) और ‘तेजस्’ (येन सूर्यस्तपति तेजसेन्द्रः—तै० ब्रा० ३।१२।१।७) के नामसे हुआ है। इसलिये यहाँ केवल ‘स्वप्नस्थानः’ पदके बलपर स्वप्नावस्थाके अभिमानी जीवात्माको ब्रह्मका दूसरा पाद मान लेना उचित नहीं मालूम होता। इसमें तीसरे मन्त्रकी व्याख्यामें बताये हुए कारण तो हैं ही। उनके सिवा यह एक कारण और भी है कि स्वप्नावस्थामें जीवात्माका ज्ञान जाग्रत्-
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मन्त्र ५ ]
अवस्थाकी अपेक्षा कम हो जाता है; किंतु यहाँ जिसका वर्णन तैजसके नामसे किया गया है, उस दूसरे पादरूप हिरण्यगर्भका ज्ञान जाग्रत्की अपेक्षा अधिक विकसित होता है। इसलिये इसको तैजस अर्थात् ज्ञानस्वरूप बतलाया है और दसवें मन्त्रमें ओंकारकी दूसरी मात्रा 'उ' के साथ इसकी एकता करते हुए इसको उत्कृष्ट (श्रेष्ठ) बताया है और इसके जाननेका फल ज्ञान-परम्पराकी वृद्धि और जाननेवालेकी संतानका ज्ञानी होना कहा है। स्वप्नाभिमानी जीवात्माके ज्ञानका ऐसा फल नहीं हो सकता, इसलिये भी तैजसका वाच्यार्थ सूक्ष्म जगत्के स्वामी हिरण्यगर्भको ही मानना युक्तिसंगत प्रतीत होता है ॥ ४ ॥
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम्। सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्तेतमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥
यत्र=जिस अवस्थामें; सुप्तः=सोया हुआ (मनुष्य); कञ्चन=किसी भी; कामम् न कामयते=भोगकी कामना नहीं करता; कञ्चन=कोई भी; स्वप्नम्=स्वप्न; न=नहीं; पश्यति=देखता; तत्=वह; सुषुप्तम्=सुषुप्ति-अवस्था है; सुषुप्तस्थानः=ऐसी सुषुप्तिकी भाँति जो जगत्की प्रलय-अवस्था अर्थात् कारण-अवस्था है, वही जिसका शरीर है; एकीभूतः=जो एकरूप हो रहा है; प्रज्ञानघनः एव=जो एकमात्र घनीभूत विज्ञानस्वरूप है; आनन्दमयः हि=जो एकमात्र आनन्दमय अर्थात् आनन्दस्वरूप ही है; चेतोमुखः=प्रकाश ही जिसका मुख है; आनन्दभुक्=जो एकमात्र आनन्दका ही भोक्ता है (वह); प्राज्ञः=प्राज्ञ; तृतीयः पादः=(ब्रह्मका) तीसरा पाद है ॥ ५ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें जाग्रत्की कारण और लय-अवस्थारूप सुषुप्तिके साथ प्रलयकालमें कारणरूपसे स्थित जगत्की समानता दिखानेके लिये पहले सुप्रसिद्ध सुषुप्ति-अवस्थাকে लक्षण बतलाकर उनके बाद पूर्णब्रह्म परमात्माके तीसरे पादका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि जिस अवस्थामें सोया हुआ मनुष्य किसी प्रकारके किसी भी भोगकी न तो कामना करता है और न अनुभव
मन्त्र ५]
माण्डूक्योपनिषद्
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ही करता है तथा किसी प्रकारका स्वप्न भी नहीं देखता, ऐसी अवस्थाको सुषुप्ति कहते हैं। इस सुषुप्ति-अवस्थाके सदृश जो प्रलयकालमें जगत्की कारण-अवस्था है, जिसमें नाना 'रूपों'का प्राकट्य नहीं हुआ है—ऐसी अव्याकृत प्रकृति ही जिसका शरीर है तथा जो एक अद्वितीयरूपमें स्थित है, उपनिषदोंमें जिसका वर्णन कहीं सत्के नामसे ('सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' छा० उ० ६।२।१) और कहीं आत्माके नामसे (आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्—ऐ० उ० १।१।१) आया है, जिसका एकमात्र चेतना (प्रकाश) ही मुख है और आनन्द ही भोजन है, वह विज्ञानधन, आनन्दमय प्राज्ञ ही उन पूर्ण ब्रह्मका तीसरा पाद है।
यहाँ प्राज्ञ नामसे भी सृष्टिके कारण सर्वज्ञ परमेश्वरका ही वर्णन है। ब्रह्मसूत्र प्रथम अध्यायके चौथे पादके अन्तर्गत पाँचवें सूत्रमें 'प्राज्ञ' शब्द ईश्वरके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है, इसके सिवा और भी बहुत-से सूत्रोंमें ईश्वरके स्थानपर 'प्राज्ञ' शब्दका प्रयोग किया गया है। पूज्यपाद स्वामी शङ्कराचार्यने तो ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें स्थान-स्थानपर परमेश्वरके बदले 'प्राज्ञ' शब्दका ही प्रयोग किया है। उपनिषदोंमें भी अनेक स्थलोंपर 'प्राज्ञ' शब्दका परमेश्वरके स्थानमें प्रयोग किया गया है (बृ० उ० ४।३।२१ और ४।३।३५)। प्रस्तुत मन्त्रमें साथ-ही-साथ ईश्वरसे भिन्न शरीराभिमानी जीवात्माका भी वर्णन है। यहाँ प्रकरण भी सुषुप्तिका है; इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी दृष्टिसे 'प्राज्ञ' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है। ब्रह्मसूत्र (१।३।४२) के भाष्यमें स्वयं शङ्कराचार्यजीने लिखा है कि 'सर्वज्ञतारूप प्रज्ञासे नित्य संयुक्त होनेके कारण 'प्राज्ञ' नाम परमेश्वरका ही है, अतः उपर्युक्त उपनिषद्-मन्त्रमें परमेश्वरका ही वर्णन है। इसके सिवा प्राज्ञके विशेषणोंमें 'प्रज्ञानधन' और 'आनन्दमय' शब्दोंका प्रयोग है जो कि जीवात्माके वाचक हो ही नहीं सकते (देखिये ब्रह्मसूत्र १।१।१२ और १६-१७), इसलिये यहाँ केवल 'सुषुप्तिस्थानः' पदके बलपर सुषुप्ति-अभिमानी जीवात्माको ब्रह्मका तीसरा पाद मान लेना उचित नहीं मालूम होता; क्योंकि इसके बाद अगले मन्त्रमें यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इन तीनों अवस्थाओंमें स्थित तीन पादोंके नामसे जिनका वर्णन हुआ है, वे सर्वेश्वर, सर्वज्ञ अन्तर््यामी, सम्पूर्ण जगत्के कारण और
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मन्त्र ६-७ ]
समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। इसके सिवा ग्यारहवें मन्त्रमें ओंकारकी तीसरी मात्राके साथ तीसरे पादकी एकता करके उसे जाननेका फल सबको जानना और सम्पूर्ण जगत्को विलीन कर लेना बताया है; इसलिये भी 'प्राज्ञः' पदका वाच्यार्थ कारण-जगत्के अधिष्ठाता परमेश्वरको ही समझना चाहिये। वह प्राज्ञ ही पूर्णब्रह्म परमात्माका तीसरा पाद है ॥५॥
सम्बन्ध— ऊपर बतलाये हुए ब्रह्मके पाद वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ किसके नाम हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभावप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥
एषः =यह; सर्वेश्वरः =सबका ईश्वर है; एषः =यह; सर्वज्ञः =सर्वज्ञ है; एषः =यह; अन्तर्यामी =सबका अन्तर्यामी है; एषः =यह; सर्वस्य =सम्पूर्ण जगत्का; योनिः =कारण है; हि =क्योंकि; भूतानाम् =समस्त प्राणियोंका; प्रभावप्ययौ =उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका स्थान यही है ॥६॥
व्याख्या— जिन परमेश्वरका तीनों पादोंके रूपमें वर्णन किया गया है, वे सम्पूर्ण ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं। ये ही सर्वज्ञ और सबके अन्तर्यामी हैं। ये ही सम्पूर्ण जगत्के कारण हैं; क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्थान ये ही हैं। प्रश्नोपनिषद्में तीनों मात्राओंसे युक्त ओंकारके द्वारा परम पुरुष परमेश्वरका ध्यान करनेकी बात कहकर उसका फल समस्त पापोंसे रहित हो अविनाशी परात्पर पुरुषोत्तमको प्राप्त कर लेना बताया गया है (५।५)। अतः पूर्ववर्णित वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ परमेश्वरके ही नाम हैं। अलग-अलग स्थितिमें उन्हींका वर्णन भिन्न-भिन्न नामोंसे किया गया है ॥६॥
सम्बन्ध— अब पूर्णब्रह्म परमात्माके चौथे पादका वर्णन करते हैं—
नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७ ॥
मन्त्र ७ ]
माण्डूक्योपनिषद्
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न अन्तःप्रज्ञम्=जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है; न बहिष्प्रज्ञम्=न बाहरकी ओर प्रज्ञावाला है; न उभयतःप्रज्ञम्=न दोनों ओर प्रज्ञावाला है; न प्रज्ञानघनम्=न प्रज्ञानघन है; न प्रज्ञम्=न जाननेवाला है; न अप्रज्ञम्=न नहीं जाननेवाला है; अदृष्टम्=जो देखा नहीं गया है; अव्यवहार्यम्=जो व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता; अग्राह्यम्=जो पकड़नेमें नहीं आ सकता; अलक्षणम्=जिसका कोई लक्षण (चिह्न) नहीं है; अचिन्त्यम्=जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता; अव्यपदेश्यम्=जो बतलानेमें नहीं आ सकता; एकात्मप्रत्ययसारम्=एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसका सार (प्रमाण) है; प्रपञ्चोपशमम्=जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसा; शान्तम्=सर्वथा शान्त; शिवम्=कल्याणमय; अद्वैतम्=अद्वितीय तत्त्व; चतुर्थम्=(परब्रह्म परमात्माका) चौथा पाद है; मन्यन्ते=(इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी) मानते हैं; सः आत्मा=वह परमात्मा (है); सः विज्ञेयः=वह जाननेयोग्य (है) ॥ ७ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें निर्गुण-निराकार निर्विशेष स्वरूपको पूर्णब्रह्म परमात्माका चौथा पाद बताया गया है। भाव यह है कि जिसका ज्ञान न तो बाहरकी ओर है, न भीतरकी ओर है और न दोनों ही ओर है; जो न ज्ञानस्वरूप है, न जाननेवाला है और न नहीं जाननेवाला ही है; जो न देखनेमें आ सकता है, न व्यवहारमें लाया जा सकता है, न ग्रहण करनेमें आ सकता है, न चिन्तन करनेमें, न बतलानेमें आ सकता है और न जिसका कोई लक्षण ही है, जिसमें समस्त प्रपञ्चका अभाव है, एकमात्र परमात्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसमें सार (प्रमाण) है—ऐसा सर्वथा, शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व पूर्णब्रह्मका चौथा पाद माना जाता है। इस प्रकार जिनका चार पादोंमें विभाग करके वर्णन किया गया, वे ही पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं, उन्हींको जानना चाहिये।
इस मन्त्रमें 'चतुर्थम् मन्यते' पदके प्रयोगसे यह स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ परब्रह्म परमात्माके चार पादोंकी कल्पना केवल उनका तत्त्व समझानेके लिये ही की गयी है; वास्तवमें अवयवरहित परमात्माके कोई भाग नहीं है। जो पूर्णब्रह्म परमात्मा स्थूल जगत्में परिपूर्ण हैं, वे ही सूक्ष्म और कारण जगत्के
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मन्त्र ८-९ ]
अन्तर्यामी और अधिष्ठाता भी हैं; तथा वे ही इन सबसे अलग निर्विशेष परमात्मा हैं। वे सर्वशक्तिमान् भी हैं और सब शक्तियोंसे रहित भी हैं। वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी। वे साकार भी हैं और निराकार भी। वास्तवमें वे हमारी बुद्धि और तर्कसे सर्वथा अतीत हैं ॥७॥
सम्बन्ध— उक्त परब्रह्म परमात्माकी उनके वाचक प्रणवके साथ एकता करते हुए कहते हैं—
सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥८॥
सः =वह (जिसको चार पादवाला बताया गया है); अयम् =यह; आत्मा =परमात्मा; अध्यक्षरम् =(उसके वाचक) प्रणवके अधिकारमें (प्रकरणमें) वर्णित होनेके कारण; अधिमात्रम् =तीन मात्राओंसे युक्त; ओंकारः =ओंकार है; अकारः =‘अ’; उकारः =‘उ’ (और); मकारः =‘म’; इति =ये (तीनों); मात्राः =मात्राएँ ही; पादाः =(तीन) पाद हैं; च =और; पादाः =(उस ब्रह्मके तीन) पाद ही; मात्राः =(तीन) मात्राएँ हैं ॥८॥
व्याख्या— वे परब्रह्म परमात्मा, जिनके चार पादोंका वर्णन किया गया है, यहाँ अक्षरके प्रकरणमें अपने नामसे अभिन्न होनेके कारण तीन मात्राओंवाला ओंकार हैं। ‘अ’, ‘उ’ और ‘म’—ये तीनों मात्राएँ ही उनके उपर्युक्त तीन पाद हैं और उनके तीनों पाद ही ओंकारकी तीन मात्राएँ हैं। जिस प्रकार ओंकार अपनी मात्राओंसे अलग नहीं है, उसी प्रकार अपने पादोंसे परमात्मा अलग नहीं हैं। यहाँ पाद और मात्राकी एकता ओंकारके द्वारा परब्रह्म परमात्माकी उपासनाके लिये की गयी है—ऐसा मालूम होता है ॥८॥
सम्बन्ध— ओंकारकी किस मात्रासे ब्रह्मके किस पादकी एकता है और वह क्यों है? इस जिज्ञासापर तीन मात्राओंका रहस्य समझानेके लिये प्रथम पहले पाद और पहली मात्राकी एकताका प्रतिपादन करते हैं—
जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽऽसे- रादिमत्त्वाद्वाऽऽज्जोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९ ॥
मन्त्र १० ]
माण्डूक्योपनिषद्
२९३
प्रथमाः=(औंकारकी) पहली; मात्रा=मात्रा; अकारः=अकार ही; आसेः=(समस्त जगत्के नामोंमें अर्थात् शब्दमात्रमें) व्यास होनेके कारण; वा=और; आदिमत्त्वात्=आदिवाला होनेके कारण; जागरितस्थानः=जगत्की भाँति स्थूल जगत्-रूप शरीरवाला; वैश्वानरः=वैश्वानर नामक पहला पाद है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=जानता है; [ सः ] ह वै=वह अवश्य ही; सर्वान्=सम्पूर्ण; कामान्=भोगोंको; आप्नोति=प्राप्त कर लेता है; च=और; आदिः=सबका आदि (प्रधान); भवति=बन जाता है ॥ ९ ॥
व्याख्या —परब्रह्म परमात्माके नामात्मक औंकारकी जो पहली मात्रा ‘अ’ है, यह समस्त जगत्के नामोंमें अर्थात् किसी भी अर्थको बतलानेवाले जितने भी शब्द हैं, उन सबमें व्यास है। स्वर अथवा व्यञ्जन—कोई भी वर्ण अकारसे रहित नहीं है। श्रुति भी कहती है—‘अकारो वै सर्वा वाक्’ (ऐतरेय आरण्यक० २।३।६)। गीतामें भी भगवान्ने कहा है कि अक्षरोंमें (वर्णोंमें) मैं ‘अ’ हूँ (१०।३३) तथा समस्त वर्णोंमें ‘अ’ ही पहला वर्ण है। इसी प्रकार इस स्थूल जगत्-रूप विराट् शरीरमें वे वैश्वानररूप अन्तर््यामी परमेश्वर व्यास हैं और विराट्-रूपसे सबके पहले स्वयं प्रकट होनेके कारण इस जगत्के आदि भी वे ही हैं। इस प्रकार ‘अ’ की और जगत्की भाँति प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले इस स्थूल जगत्-रूप शरीरमें व्यास वैश्वानर नामक प्रथम पादकी एकता होनेके कारण ‘अ’ ही पूर्णब्रह्म परमेश्वरका पहला पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार अकार और विराट् शरीरके आत्मा परमेश्वरकी एकताको जानता है और उनकी उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको अर्थात् इच्छित पदार्थोंको पा लेता है और जगत्में प्रधान—सर्वमान्य हो जाता है ॥ ९ ॥
सम्बन्ध —अब दूसरे पादकी और दूसरी मात्राकी एकताका प्रतिपादन करते हैं—
स्वजस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्दोत्कर्षति ह वै ज्ञानसंततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १० ॥
२१४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ मन्त्र १० ]
द्वितीया=(औंकारकी) दूसरी; मात्रा=मात्रा; उकारः='उ'; उत्कर्षात्=(‘अ’ से) उत्कृष्ट होनेके कारण; वा=और; उभयत्वात्=दोनों भाववाला होनेके कारण; स्वप्नस्थानः=स्वप्नकी भाँति सूक्ष्म जगत्-रूप शरीरवाला; तैजसः=तैजस नामक (दूसरा पाद) है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=जानता है; [ सः ] ह वै=वह अवश्य ही; ज्ञानसंततिम्=ज्ञानकी परम्पराको; उत्कर्षति=उन्नत करता है; च=और; समानः=समान भाववाला; भवति=हो जाता है; अस्य=इसके; कुले=कुलमें; अब्रह्मवित्=हिरण्यगर्भरूप परमेश्वरको न जाननेवाला; न=नहीं; भवति=होता ॥ १० ॥
व्याख्या —परब्रह्म परमात्माके नामात्मक औंकारकी दूसरी मात्रा जो ‘उ’ है, यह ‘अ’से उत्कृष्ट (ऊपर उठा हुआ) होनेके कारण श्रेष्ठ है तथा ‘अ’ और ‘म’ इन दोनोंके बीचमें होनेके कारण उन दोनोंके साथ इसका घनिष्ठ सम्बन्ध है; अतः यह उभयस्वरूप है। इसी प्रकार वैश्वानरसे तैजस (हिरण्यगर्भ) उत्कृष्ट है तथा वैश्वानर और प्राज्ञके मध्यगत होनेसे वह उभयसम्बन्धी भी है। इस समानताके कारण ही ‘उ’ को ‘तैजस’ नामक द्वितीय पाद कहा गया है। भाव यह है कि इस स्थूल जगत्के प्राकट्यसे पहले परमेश्वरके आदि संकल्पद्वारा जो सूक्ष्म सृष्टि उत्पन्न होती है, जिसका वर्णन मानस-सृष्टिके नामसे आता है, जिसमें समस्त तत्त्व तन्मात्राओंके रूपमें रहते हैं, स्थूलरूपमें परिणत नहीं होते, उस सूक्ष्म जगत्-रूप शरीरमें चेतन प्रकाशस्वरूप हिरण्यगर्भ परमेश्वर इसके अधिष्ठाता होकर रहते हैं तथा कारण-जगत् और स्थूल-जगत्—इन दोनोंसे ही सूक्ष्म जगत्का घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसलिये वे कारण और स्थूल दोनों रूपवाले हैं। इस तरह ‘उ’की और मानसिक सृष्टिके अधिष्ठाता तैजसरूप दूसरे पादकी समानता होनेके कारण ‘उ’ ही पूर्णब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार ‘उ’ और तेजोमय हिरण्यगर्भरूपकी एकताके रहस्यको समझ लेता है, वह स्वयं इस जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंको भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेता है, इस कारण इस ज्ञानकी परम्पराको उन्नत करता है—उसे बढ़ाता है तथा सर्वत्र समभाववाला हो जाता है; क्योंकि जगत्के सूक्ष्म-तत्त्वोंको समझ लेनेके कारण उसका वास्तविक रहस्य समझमें आ जानेसे उसकी विषमताका नाश हो जाता
मन्त्र ११ ]
माण्डूक्योपनिषद्
२९५
है। इसलिये उससे उत्पन्न हुई संतान भी कोई ऐसी नहीं होती, जिसको हिरण्यगर्भरूप परमेश्वरके उपर्युक्त रहस्यका ज्ञान न हो जाय॥१०॥
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद॥११॥
तृतीया=(ओंकारकी) तीसरी; मात्रा=मात्रा; मकारः='म' ही; मितेः=माप करनेवाला (जाननेवाला) होनेके कारण; वा=और; अपीतेः=विलीन करनेवाला होनेसे; सुषुप्तस्थानः=सुषुप्तिकी भाँति कारणमें विलीन जगत् ही जिसका शरीर है; प्राज्ञः=प्राज्ञ नामक तीसरा पाद है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=जानता है, [ सः ] ह वै=वह अवश्य ही; इदम्=इस; सर्वम्=सम्पूर्ण कारण-जगत्को; मिनोति=माप लेता है अर्थात् भलीभाँति जान लेता है; च=और; अपीतिः=सबको अपनेमें विलीन करनेवाला; भवति=हो जाता है॥११॥
व्याख्या —परमात्माके नामात्मक ओंकारकी जो तीसरी मात्रा 'म' है, यह 'मा' धातुसे बना है। 'मा' धातुका अर्थ माप लेना यानी अमुक वस्तु इतनी है, यह समझ लेना है। यह 'म' ओंकारकी अन्तिम मात्रा है; 'अ' और 'उ' के पीछे उच्चरित होती है—इस कारण दोनोंका माप इसमें आ जाता है; अतः यह उनको जाननेवाला है। तथा 'म'का उच्चारण होते-होते मुख बंद हो जाता है; 'अ' और 'उ' दोनों उसमें विलीन हो जाते हैं; अतः वह उन दोनों मात्राओंको अन्तमें विलीन करनेवाला भी है। इसी प्रकार सुषुप्तस्थानीय कारण-जगत्का अधिष्ठाता प्राज्ञ भी सर्वज्ञ है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों अवस्थाओंमें स्थित जगत्को जाननेवाला है। कारण-जगत्से ही सूक्ष्म और स्थूल जगत्की उत्पत्ति होती है और उसीमें उनका लय होता है। इस प्रकार 'म' की और कारण-जगत्के अधिष्ठाता प्राज्ञ नामक तीसरे पादकी समता होनेके कारण 'म' रूप तीसरी मात्रा ही पूर्ण ब्रह्मका तीसरा पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार 'म' और 'प्राज्ञ' स्वरूप परमेश्वरकी एकताको जानता है—इस रहस्यको समझकर ओंकारके स्मरणद्वारा परमेश्वरका चिन्तन करता है, वह इस मूलसहित सम्पूर्ण
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मन्त्र १२ ]
जगत्को भली प्रकार जान लेता है और सबको विलीन करनेवाला हो जाता है, अर्थात् उसकी बाह्य दृष्टि निवृत्त हो जाती है। अतः वह सर्वत्र एक परब्रह्म परमेश्वरको ही देखनेवाला बन जाता है ॥११॥
सम्बन्ध— मात्रारहित ओंकारकी चौथे पादके साथ एकताका प्रतिपादन करते हुए इस उपनिषद्का उपसंहार करते हैं—
अमात्रश्रुतुर्थाऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद य एवं वेद ॥१२॥
एवम्=इसी प्रकार; अमात्रः=मात्रारहित; ओंकारः=प्रणव ही; अव्यवहार्यः=व्यवहारमें न आनेवाला; प्रपञ्चोपशमः=प्रपञ्चसे अतीत; शिवः=कल्याणमय; अद्वैतः=अद्वितीय; चतुर्थः=पूर्ण ब्रह्मका चौथा पाद है; [ सः ] आत्मा=वह आत्मा; एव=अवश्य ही; आत्मना=आत्माके द्वारा; आत्मानम्=परात्परब्रह्म परमात्मामें; संविशति=पूर्णतया प्रविष्ट हो जाता है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=जानता है; यः एवम् वेद=जो इस प्रकार जानता है ॥१२॥
व्याख्या— परब्रह्म परमात्माके नामात्मक ओंकारका जो मात्रारहित, बोलनेमें न आनेवाला निराकार स्वरूप है, वही मन-वाणीका अविषय होनेसे व्यवहारमें न लाया जा सकेनेवाला, प्रपञ्चसे अतीत, कल्याणमय, अद्वितीय—निर्गुण-निराकाररूप चौथा पाद है, भाव यह है कि जिस प्रकार तीन मात्राओंकी पहले बताये हुए तीन पादोंके साथ समता है, उसी प्रकार ओङ्कारके निराकार स्वरूपकी परब्रह्म परमात्माके निर्गुण-निराकार निर्विशेषरूप चौथे पादके साथ समता है। जो मनुष्य इस प्रकार ओंकार और परब्रह्म परमात्माकी अर्थात् नाम और नामीकी एकताके रहस्यको समझकर परब्रह्म परमात्माको पानेके लिये उनके नाम-जपका अवलम्बन लेकर तत्परतासे साधन करता है, वह निस्संदेह आत्मासे आत्मामें अर्थात् परात्पर परब्रह्म परमात्मामें प्रविष्ट हो जाता है। ‘जो इस प्रकार जानता है’ इस वाक्यको दो बार कहकर उपनिषद्की समाप्ति सूचित की गयी है।
मन्त्र १२ ]
माण्डूक्योपनिषद्
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परब्रह्म परमात्मा और उनके नामकी महिमा अपार है, उसका कोई पार नहीं पा सकता। इस प्रकरणमें उन असीम पूर्ण ब्रह्म परमात्माके चार पादोंकी कल्पना उनके स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों सगुण रूपोंकी और निर्गुण-निराकार स्वरूपकी एकता दिखानेके लिये तथा नाम और नामीकी सब प्रकारसे एकता दिखानेके लिये एवं उनकी सर्वभवन-सामर्थ्यरूप जो अचिन्त्य शक्ति है, वह उनसे सर्वथा अभिन्न है—यह भाव दिखानेके लिये की गयी है, ऐसा अनुमान होता है ॥ १२ ॥
॥ अथर्ववेदीय माण्डूक्योपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्बिजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाः सस्तनूभिव्यंशेम देवहितं यदायुः ॥* स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यौ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥†
ॐ शान्तिः!! शान्तिः!! शान्तिः!!!
इसका अर्थ इस उपनिषद्के आदिमें दिया जा चुका है।
- यह मन्त्र ऋग्वेद (१०।८९।६) में है तथा यजुर्वेद (२५।१९) में भी है।
† यह मन्त्र ऋग्वेद (१०।८९।८) में है तथा यजुर्वेद (२५।२१) में भी है।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
ऐतरेयोपनिषद्
ऋग्वेदीय ऐतरेय आरण्यकमें दूसरे आरण्यकके चौथे, पाँचवें और छठे अध्यायोंको ऐतरेय-उपनिषद्के नामसे कहा गया है। इन तीन अध्यायोंमें ब्रह्मविद्याकी प्रधानता है। इस कारण इन्हींको 'उपनिषद्' माना है।
शान्तिपाठ
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता। मनो मे वाचि प्रतिष्ठित- माविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रासंदधाम्युतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि तन्नामवतु। तद्वाकारमवतु। अवतु मामवतु वक्कारमवतु वक्कारम्॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
ॐ=हे सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन्!; मे=मेरी; वाक्=वाक्-इन्द्रिय; मनसि=मनमें; प्रतिष्ठिता=स्थित हो जाय; मे=मेरा; मनः=मन; वाचि=वाक्-इन्द्रियमें; प्रतिष्ठितम्=स्थित हो जाय; आविः=हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर!; मे=मेरे लिये; आवीः एधि=(तू) प्रकट हो; मे=(हे मन और वाणी! तुम दोनों) मेरे लिये; वेदस्य=वेदविषयक ज्ञानको; आणीस्थः=लानेवाले बनो; मे=मेरा; श्रुतम्=सुना हुआ ज्ञान; मा प्रहासीः=(मुझे) न छोड़े; अनेन अधीतेन=इस अध्ययनके द्वारा; अहोरात्रान्=(मैं) दिन और रात्रियोंको; संदधामि=एक कर दूँ; ऋतम्=(मैं) श्रेष्ठ शब्दोंको ही; वदिष्यामि=बोलूँगा; सत्यम्=सत्य ही; वदिष्यामि=बोला करूँगा; तत्=वह (ब्रह्म); माम् अवतु=मेरी रक्षा करे; तत्=वह (ब्रह्म); वक्कारम् अवतु=आचार्यकी रक्षा करे; अवतु माम्=रक्षा करे मेरी (और); अवतु वक्कारम्=रक्षा करे (मेरे) आचार्यकी; अवतु वक्कारम्=रक्षा करे (मेरे) आचार्यकी; ओम् शान्तिः= भगवान् शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं।
ऐतरेयोपनिषद्
२९९
व्याख्या —इस शान्तिपाठमें सब प्रकारके विघ्नोंकी शान्तिके लिये परमात्मासे प्रार्थना की गयी है। प्रार्थनाका भाव यह है कि 'हे सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन्! मेरी वाणी मनमें स्थित हो जाय और मन वाणीमें स्थित हो जाय; अर्थात् मेरे मन-वाणी दोनों एक हो जायँ। ऐसा न हो कि मैं वाणीसे एक पाठ पढ़ता रहूँ और मन दूसरा ही चिन्तन करता रहे या मनमें दूसरा ही भाव रहे और वाणीद्वारा दूसरा प्रकट करूँ। मेरे संकल्प और वचन दोनों विशुद्ध होकर एक हो जायँ। हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर! आप मेरे लिये प्रकट हो जाइये—अपनी योगमायाका पर्दा मेरे सामनेसे हटा लीजिये। (इस प्रकार परमात्मासे प्रार्थना करके अब उपासक अपने मन और वाणीसे कहता है कि) हे मन और वाणी! तुम दोनों मेरे लिये वेदविषयक ज्ञानकी प्राप्ति करानेवाले बनो—तुम्हारी सहायतासे मैं वेदविषयक ज्ञान प्राप्त कर सकूँ। मेरा गुरुमुखसे सुना हुआ और अनुभवमें आया हुआ ज्ञान मेरा त्याग न करे अर्थात् वह सर्वदा मुझे स्मरण रहे—मैं उसे कभी न भूलूँ। मेरी इच्छा है कि अपने अध्ययनद्वारा मैं दिन और रात एक कर दूँ। अर्थात् रात-दिन निरन्तर ब्रह्मविद्याका पठन और चिन्तन ही करता रहूँ। मेरे समयका एक क्षण भी व्यर्थ न बीते। मैं अपनी वाणीसे सदा ऐसे ही शब्दोंका उच्चारण करूँगा; जो सर्वथा उत्तम हो, जिनमें किसी प्रकारका दोष न हो; तथा जो कुछ बोलूँगा, सर्वथा सत्य बोलूँगा—जैसा देखा, सुना और समझा हुआ भाव है, ठीक वही भाव वाणीद्वारा प्रकट करूँगा। उसमें किसी प्रकारका छल नहीं करूँगा। (इस प्रकार अपने मन और वाणीको दृढ़ बनाकर अब पुनः परमात्मासे प्रार्थना करता है—) वे परब्रह्म परमात्मा! मेरी रक्षा करें। वे परमेश्वर मुझे ब्रह्मविद्या सिखानेवाले आचार्यकी रक्षा करें। वे रक्षा करें मेरी और मेरे आचार्यकी, जिससे मेरे अध्ययनमें किसी प्रकारका विघ्न उपस्थित न हो। आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—तीनों प्रकारके विघ्नोंकी सर्वथा निवृत्तिके लिये तीन बार 'शान्तिः' पदका उच्चारण किया गया है। भगवान् शान्तिस्वरूप हैं, इसलिये उनके स्मरणसे शान्ति निश्चित है।
३००
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
प्रथम अध्याय
प्रथम खण्ड
ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत्किञ्चन मिषत्। स ईक्षत लोकात्र सृजा इति ॥ १ ॥
ॐ=ॐ इस परमात्माके नामका उच्चारण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं; इदम्=यह जगत्; अग्रे=(प्रकट होनेसे) पहले; एकः=एकमात्र; आत्मा=परमात्मा; वै=ही; आसीत्=था; अन्यत्=(उसके सिवा) दूसरा; किञ्चन एव=कोई भी; मिषत्=चेष्टा करनेवाला; न=नहीं था; सः=उस (परम पुरुष परमात्मा) ने; नु=(मैं) निश्चय ही; लोकान् सृजै=लोकोंकी रचना करूँ; इति=इस प्रकार; ईक्षत=विचार किया ॥ १ ॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें परमात्माके सृष्टि-रचनाविषयक प्रथम संकल्पका वर्णन है। भाव यह है कि देखने-सुनने और समझनेमें आनेवाले जड़-चेतनमय प्रत्यक्ष जगत्के इस रूपमें प्रकट होनेसे पहले कारण-अवस्थामें एकमात्र परमात्मा ही थे। उस समय इसमें भिन्न-भिन्न नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति नहीं थी। उस समय उन परब्रह्म परमात्माके सिवा दूसरा कोई भी चेष्टा करनेवाला नहीं था। सृष्टिके आदिमें उन परम पुरुष परमात्माने यह विचार किया कि 'मैं प्राणियोंके कर्म-फल-भोगार्थ भिन्न-भिन्न लोकोंकी रचना करूँ' ॥ १ ॥
स इमाल्लोकानसृजत। अभ्यो मरीचीर्ममापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः ॥ २ ॥
सः=उसने; अभ्यः=अम्भ (द्युलोक तथा उसके ऊपरके लोक); मरीचीः=मरीचि (अन्तरिक्ष); मरम्=मर (मर्त्यलोक) (और); आपः=जल (पृथिवीके नीचेके लोक); इमान्=इन सब; लोकान् असृजत=लोकोंकी रचना की; दिवम् परेण=द्युलोक—
खण्ड १ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३०१
स्वर्गलोकसे ऊपरके लोक; प्रतिष्ठा=(तथा) उनका आधारभूत; द्यौः=द्युलोक भी; अदः=वे सब; अभ्भः='अभ्भ'के नामसे कहे गये हैं; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्ष लोक (भुवर्लोक) ही; मरीचयः=मरीचि है (तथा); पृथिवी=यह पृथ्वी ही; मरः=मर—मृत्युलोकके नामसे कही गयी है (और); याः=जो; अधस्तात्=(पृथ्वीके) नीचे—भीतरी भागमें (स्थूल पातालादि लोक) हैं; ताः=वे; आपः=जलके नामसे कहे गये हैं ॥ २ ॥
व्याख्या —यह विचार करके परब्रह्म परमेश्वरने अभ्भ, मरीचि, मर और जल—इन लोकोंकी रचना की। इन शब्दोंको स्पष्ट करनेके लिये आगे श्रुतिमें ही कहा गया है कि स्वर्गलोकसे ऊपर जो महः, जनः, तपः और सत्यलोक हैं, वे और उनका आधार द्युलोक—इन पाँचों लोकोंको यहाँ 'अभ्भः' नामसे कहा गया है। उसके नीचे जो अन्तरिक्षलोक (भुवर्लोक) है, जिसमें सूर्य, चन्द्र और तारागण—ये सब किरणोंवाले लोकविशेष हैं, उसका वर्णन यहाँ मरीचि नामसे किया गया है। उसके नीचे जो यह पृथ्वीलोक है— जिसको मृत्युलोक भी कहते हैं, वह यहाँ 'मर' के नामसे कहा गया है और उसके नीचे अर्थात् पृथ्वीके भीतर जो पातालादि लोक हैं, वे 'आपः' के नामसे कहे गये हैं। तात्पर्य यह कि जगत्में जितने भी लोक त्रिलोकी, चतुर्दश भुवन एवं सप्त लोकोंके नामसे प्रसिद्ध हैं, उन सब लोकोंकी परमात्माने रचना की ॥ २ ॥
स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्व्यथ एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत् ॥ ३ ॥
सः =उसने; ईक्षत =फिर विचार किया; इमे =ये; नु =तो हुए; लोकाः =लोक; (अब) लोकपालान् नु सृजै =लोकपालोंकी भी रचना मुझे अवश्य करनी चाहिये; इति =यह विचार करके; सः =उसने; अद्व्यथः =जलसे; एव =ही; पुरुषम् =हिरण्यगर्भरूप पुरुषको; समुद्धृत्य =निकालकर; अमूर्छयत् =उसे मूर्तिमान् बनाया ॥ ३ ॥
व्याख्या —इस प्रकार इन समस्त लोकोंकी रचना करनेके अनन्तर परमेश्वरने फिर विचार किया कि 'ये सब लोक तो रचे गये। अब इन लोकोंकी
३०२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
रक्षा करनेवाले लोकपालोंकी रचना भी मुझे अवश्य करनी चाहिये; अन्यथा बिना रक्षकके ये सब लोक सुरक्षित नहीं रह सकेंगे। यह सोचकर उन्होंने जलमेंसे अर्थात् जल आदि सूक्ष्म महाभूतोंमेंसे हिरण्यमय पुरुषको निकालकर उसको समस्त अङ्ग-उपाङ्गोंसे युक्त करके मूर्तिमान् बनाया। यहाँ ‘पुरुष’ शब्दसे सृष्टिकालमें सबसे पहले प्रकट किये जानेवाले ब्रह्माका वर्णन किया गया है; क्योंकि ब्रह्मासे ही सब लोकपालोंकी और प्रजाको बढ़ानेवाले प्रजापतियोंकी उत्पत्ति हुई है—इस विषयका विस्तृत वर्णन शास्त्रोंमें पाया जाता है और ब्रह्माकी उत्पत्ति जलके भीतरसे कमलनालसे हुई, ऐसा भी वर्णन आता है। अतः यहाँ ‘पुरुष’ शब्दका अर्थ ब्रह्मा मान लेना उचित जान पड़ता है॥ ३ ॥
तमभ्यतपत्तस्याभिमतस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखद्वाम् वाचोऽग्निर्नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष आदित्यः कर्णैं निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्रादिशस्त्वद् निरभिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा नाभिरनिरभिद्यत नाभ्या अपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिशनाद्रेतो रेतस आपः ॥ ४ ॥
(परमात्माने) तम्=उस (हिरण्यगर्भरूप पुरुष) को लक्ष्य करके; अभ्यतपत्=संकल्परूप तप किया; अभिमतस्य=उस तपसे तपे हुए; तस्य=हिरण्यगर्भके शरीरसे; यथाण्डम्=(पहले) अण्डेकी तरह (फूटकर); मुखम्=मुख-छिद्र; निरभिद्यत=प्रकट हुआ; मुखात्=मुखसे; वाक्=वाक्-इन्द्रिय (और); वाचः=वाक्-इन्द्रियसे; अग्निः=अग्निदेवता प्रकट हुआ (फिर); नासिके=नासिकाके दोनों छिद्र; निरभिद्येताम्=प्रकट हुए; नासिकाभ्याम्=नासिका-छिद्रोंमेंसे; प्राणः=प्राण उत्पन्न हुआ (और); प्राणात्=प्राणसे; वायुः=वायुदेवता उत्पन्न हुआ (फिर); अक्षिणी=दोनों आँखोंके छिद्र; निरभिद्येताम्=प्रकट हुए; अक्षिभ्याम्=आँखोंके छिद्रोंमेंसे; चक्षुः=नेत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई (और); चक्षुषः=नेत्र-इन्द्रियसे; आदित्यः=सूर्य प्रकट हुआ
खण्ड १ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३०३
(फिर); कर्णौ=दोनों कानोंके छिद्र; निरभिद्येताम्=प्रकट हुए; कर्णाभ्याम्=कानोंसे; श्रोत्रम्=श्रोत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई (और); श्रोत्रात्=श्रोत्र-इन्द्रियसे; दिशः=दिशाएँ प्रकट हुई (फिर); त्वक्=त्वचा; निरभिद्यत=प्रकट हुई; त्वचः=त्वचासे; लोमानि=रोम उत्पन्न हुए (और); लोमभ्यः=रोमोंसे; ओषधिवनस्पतयः=ओषधि और वनस्पतियाँ प्रकट हुई (फिर); हृदयम्=हृदय; निरभिद्यत=प्रकट हुआ; हृदयात्=हृदयसे; मनः=मनका आविर्भाव हुआ (और); मनसः=मनसे; चन्द्रमाः=चन्द्रमा उत्पन्न हुआ (फिर); नाभिः=नाभि; निरभिद्यत=प्रकट हुई; नाभ्या=नाभिसे; अपानः=अपानवायु प्रकट हुआ (और); अपानात्=अपानवायुसे; मृत्युः=मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ (फिर); शिश्नम्=लिङ्ग; निरभिद्यत=प्रकट हुआ; शिशनात्=लिङ्गसे; रेतः=वीर्य (और); रेतसः=वीर्यसे; आपः=जल उत्पन्न हुआ ॥ ४ ॥
व्याख्या —इस प्रकार हिरण्यगर्भ पुरुषको उत्पन्न करके उसके अङ्ग-उपाङ्गोंके व्यक्त करनेके उद्देश्यसे जब परमात्माने संकल्परूप तप किया, तब उस तपके फलस्वरूप हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरमें सर्वप्रथम अण्डेकी भाँति फूटकर मुख-छिद्र निकला। मुखसे वाक्-इन्द्रिय उत्पन्न हुई और वाक्-इन्द्रियसे उसका अधिष्ठात्-देवता अग्नि उत्पन्न हुआ। फिर नासिकाके दोनों छिद्र हुए, उनमेंसे प्राणवायु प्रकट हुआ और प्राणोंसे वायुदेवता उत्पन्न हुआ। यहाँ प्राणेन्द्रियका अलग वर्णन नहीं है; अतः प्राण-इन्द्रिय और उसके देवता अश्विनीकुमार भी नासिकासे ही उत्पन्न हुए—यों समझ लेना चाहिये। इसी प्रकार रसना-इन्द्रिय और उसके देवताका भी अलग वर्णन नहीं है; अतः मुखसे वाक्-इन्द्रियके साथ-साथ रसना-इन्द्रिय और उसके देवताकी भी उत्पत्ति हुई—यह समझ लेना चाहिये। फिर आँखोंके दोनों छिद्र प्रकट हुए, उनमेंसे नेत्र-इन्द्रिय और नेत्र-इन्द्रियसे उसका देवता सूर्य उत्पन्न हुआ। फिर कानोंके दोनों छिद्र निकले, उनमेंसे श्रोत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई और श्रोत्र-इन्द्रियसे उसके देवता दिशाएँ उत्पन्न हुई। उसके बाद त्वचा (चर्म) प्रकट हुई, त्वचासे रोम उत्पन्न हुए, रोमोंसे ओषधियाँ और वनस्पतियाँ उत्पन्न हुई। फिर हृदय प्रकट हुआ, हृदयसे मन और मनसे उसका अधिष्ठाता चन्द्रमा उत्पन्न हुआ।
३०४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
फिर नाभि प्रकट हुई, नाभिसे अपानवायु और अपानवायुसे गुदा-इन्द्रियका अधिष्ठाता मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ। नाभिकी उत्पत्तिके साथ ही गुदा-छिद्र और गुदा-इन्द्रियकी उत्पत्ति भी समझ लेनी चाहिये। यहाँ अपानवायु मलत्यागमें हेतु होनेके कारण और उसका स्थान नाभि होनेके कारण मुख्यतासे उसीका नाम लिया गया है। परंतु मृत्यु अपानका अधिष्ठाता नहीं है, वह गुदा-इन्द्रियका अधिष्ठाता है; अतः उपलक्षणसे गुदा-इन्द्रियका वर्णन भी इसके अन्तर्गत मान लेना उचित प्रतीत होता है। फिर लिङ्ग प्रकट हुआ, उसमेंसे वीर्य और उससे जल उत्पन्न हुआ। यहाँ लिङ्गकी उत्पत्तिसे उपस्थेन्द्रिय और उसका देवता प्रजापति उत्पन्न हुआ—यह बात भी समझ लेनी चाहिये ॥४॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन् महत्पर्युवे प्रापतंस्तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एनमबुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १ ॥
ताः=वे; एताः सृष्टाः=परमात्माद्वारा रचे हुए ये सब; देवताः=अग्नि आदि देवता; अस्मिन्=इस (संसाररूप); महति अर्णवे=महान् समुद्रमें; प्रापतन्=आ पड़े; (तब परमात्माने) तम्=उस (समस्त देवताओंके समुदाय) को; अशनायापिपासाभ्याम्=भूख और प्याससे; अन्ववार्जत्=युक्त कर दिया; (तब) ताः=वे सब अग्नि आदि देवता; एनम् अबुवन्=इस परमात्मासे बोले (भगवन्!); नः=हमारे लिये; आयतनम् प्रजानीहि=एक ऐसे स्थानकी व्यवस्था कीजिये; यस्मिन्=जिसमें; प्रतिष्ठिताः=स्थित रहकर; (हमलोग) अन्नम्=अन्न; अदाम इति=भक्षण करें ॥ १ ॥
व्याख्या—परमात्माद्वारा रचे गये वे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता अग्नि आदि सब
खण्ड २ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३०५
देवता संसाररूपी इस महान् समुद्रमें आ पड़े। अर्थात् हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरसे उत्पन्न होनेके बाद उनको कोई निर्दिष्ट स्थान नहीं मिला जिससे वे उस समष्टि-शरीरमें ही रहे। तब परमात्माने उस देवताओंके समुदायको भूख और पिपासासे संयुक्त कर दिया। अतः भूख और प्याससे पीड़ित होकर वे अग्नि आदि सब देवता अपनी सृष्टि करनेवाले परमात्मासे बोले—‘भगवन्! हमारे लिये एक ऐसे स्थानकी व्यवस्था कीजिये, जिसमें रहकर हमलोग अन्न भक्षण कर सकें—अपना-अपना आहार ग्रहण कर सकें’ ॥ १ ॥
ताभ्यो गामानयत्ता अबुवन्न वै नोऽयमलमिति ताभ्योऽश्वमानयत्ता अबुवन्न वै नोऽयमलमिति ॥ २ ॥
(परमात्मा) ताभ्यः =उन देवताओंके लिये; गाम् =गौका शरीर; आनयत् =लाये (उसे देखकर); ताः =उन्होंने; अबुवन् =कहा; नः =हमारे लिये; अयम् =यह; अलम् =पर्याप्त; न वै =नहीं है; इति =इस प्रकार उनके कहनेपर (परमात्मा); ताभ्यः =उनके लिये; अश्वम् =घोड़ेका शरीर; आनयत् =लाये; (उसे देखकर भी); ताः =उन्होंने (फिर वैसे ही); अबुवन् =कहा कि; अयम् =यह भी; नः =हमारे लिये; अलम् =पर्याप्त; न वै =इति=नहीं है ॥ २ ॥
व्याख्या —इस प्रकार उनके प्रार्थना करनेपर सृष्टिकर्ता परमेश्वरने उन सबके रहनेके लिये एक गौका शरीर बनाकर उनको दिखाया। उसे देखकर उन्होंने कहा—‘भगवन्! यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है, अर्थात् इस शरीरसे हमारा कार्य अच्छी तरह नहीं चलनेका। इससे श्रेष्ठ किसी दूसरे शरीरकी रचना कीजिये।’ तब परमात्माने उनके लिये घोड़ेका शरीर रचकर उनको दिखाया। उसे देखकर वे फिर बोले—‘भगवन्! यह भी हमारे लिये यथेष्ट नहीं है, इससे भी हमारा कार्य नहीं चल सकता। आप कोई तीसरा ही शरीर बनाकर हमें दीजिये’ ॥ २ ॥
ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अबुवन् सुकृतं बतेति। पुरुषो वाव सुकृतम्। ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति ॥ ३ ॥
३०६
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
ताभ्यः=(तब परमात्मा) उनके लिये; पुरुषम्=मनुष्यका शरीर; आनयत्=लाये; (उसे देखकर) ताः=वै (अग्नि आदि सब देवता); अब्रुवन्=बोले; बत=बस; सुकृतम् इति=यह बहुत सुन्दर बन गया; वाव=सचमुच ही; पुरुषः=मनुष्य-शरीर; सुकृतम्=(परमात्माकी) सुन्दर रचना है; ताः अब्रवीत्=(फिर) उन सब देवताओंसे (परमात्माने) कहा; (तुमलोग) यथायतनम्=अपने-अपने योग्य आश्रयोंमें; प्रविशत इति=प्रविष्ट हो जाओ ॥ ३ ॥
व्याख्या—इस प्रकार जब उन्होंने गाय और घोड़ेके शरीरोंको अपने लिये यथेष्ट नहीं समझा, तब परमात्माने उनके लिये पुरुषकी अर्थात् मनुष्य-शरीरकी रचना की और वह उनको दिखाया। उसे देखते ही सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और बोले—‘यह हमारे लिये बहुत सुन्दर निवास-स्थान बन गया। इसमें हम आरामसे रह सकेंगे और हमारी सब आवश्यकताएँ भलीभाँति पूर्ण हो सकेंगी।’ सचमुच मनुष्य-शरीर परमात्माकी सुन्दर और श्रेष्ठ रचना है; इसीलिये यह देवदुर्लभ माना गया है और शास्त्रोंमें जगह-जगह इसकी महिमा गायी गयी है; क्योंकि इसी शरीरमें जीव परमात्माके आज्ञानुसार यथायोग्य साधन करके उन्हें प्राप्त कर सकता है। जब सब देवताओंने उस शरीरको पसंद किया, तब उनसे परमेश्वरने कहा—‘तुमलोग अपने-अपने योग्य स्थान देखकर इस शरीरमें प्रवेश कर जाओ’ ॥ ३ ॥
अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्राविशद्विशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिशनं प्राविशन् ॥ ४ ॥
(तब) अग्निः=अग्निदेवता; वाक्=वाक्-इन्द्रिय; भूत्वा=बनकर; मुखम् प्राविशत्=मुखमें प्रविष्ट हो गया; वायुः=वायुदेवता; प्राणः=प्राण; भूत्वा=बनकर; नासिके प्राविशत्=नासिकाके छिद्रोंमें प्रविष्ट हो गया; आदित्यः=सूर्यदेवता;